☀️🌷परिवर्तन☀️🌷धनञ्जय गांगेय

हम पढ़ते है सोचते है पर कर नहीं पाते है,बदलते है बदलाव चाहते है पर कर नहीं पाते है।सच्चाई,ईमानदारी लाना चाहते है पर ला नहीं पाते है,शिक्षा,शिक्षक में परिवर्तन लाना चाहते है पर कर नहीं पाते है,जातियाँ मिटती नहीं दूरियां घटती नहीं,वे हिंसा नहीं छोड़ते हम नफरत से परे नहीं जाना चाहते है।शांति से उन्हें प्रेम नहीं ,लोभ लाभ की छाया हमें घेरे है।

सोचते है एक दुनिया बसाउ जहाँ प्रेम,शांति,अहिंसा,सौंदर्य हो एक दूसरे की पीड़ा महसूस हो।जाति धर्म की चकल्लस न हो।ज्ञान विज्ञान हो ।लोग कहते है न बाबा न बिना हिंसा द्वेष वैमनस्यता प्रतियोगिता मार काट के कौन सा समाज वह नीरस होगा उसमे कोई मजा नहीं होगा।

कुछ खेल कुछ राग कुछ संगीत कुछ अहसास कुछ अनुभूति जीने की ।बस समझने वाला कोई नहीं।जंगल में वह मोर नाच रहा है जिसे किसी ने नहीं देखा।जीवन की दौड़ किस पर रुके ।जब उसने चलना ही नहीं सीखा तो बदलना कैसे आये?कुछ उदासी कुछ विराग सा कुछ अपनापन कुछ टेढ़ापन।बस जिंदगी संसाररूपी सागर में थाह लेना चाह रही है।

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Sex की अनन्त इच्छाएं💃😍💘❤️धनञ्जय गांगेय💖

रिश्ते का आधार प्रेम और सदभाव होता है उसकी मर्यादा समाज के नियमन के अंतर्गत होती है।
मनुष्य की यात्रा और कुछ रिश्तों की ही कहानी है।कभी इश्क तो कभी जंग मानव की निशानी है।
मनुष्य की यात्रा स्त्री पुरुष के सहजीवन के साथ शुरू हुई।दोनों के रिश्ते का आधार काम को मर्यादित ढंग से शांत करना और संतान के माध्यम से सृष्टि को गति देना।

21 सदी का विश्व रिश्तों को लेकर नई अंगड़ाई ले रहा है।समलैंगिक,लेस्बियन,गे,ट्रांसजेंडर के साथ साथ पालीएमरस रिश्ते की बात हो रही है।

पालीएमरस दो शब्द पाली और एमरस से बना है लैटिन और ग्रीक शब्द जिसका अर्थ है एक समय मे एक से अधिक प्रेम का रिश्ता जैसे एक लड़की के एक समय तीन या चार पुरुष से प्रेम के साथ शारीरिक संबंध जिसका जानकारी अन्य प्रेमी को
भी रहे। विकृति को मानवाधिकार कैसे घोषित किया जा सकता है।मानवाधिकार की सीमा में स्वतंत्रता का आधार इतिहास के आधार पर ही प्राप्त होता है।

रिश्ते के दो आधार एक प्राकृतिक दूसरा नैतिक इन रिश्तों को देखे तो दोनों का उल्लंघन है।कुछ लोगों की इच्छा से न समाज चलता है न कानूनी मान्यता मिलती है।

यदि आज हम इस विकृति पर रोक नहीं लगाये तो जल्द ही कुछ लोगों की टोली सड़क और कोर्ट में पशुओं से सम्बन्ध बनाने को अपने अधिकार सीमा कहेगी।
पिछले दिनों एक महिला लोगो से पूछ रही कोई उसे देश बताये जहाँ वह अपने बेटे के साथ संबंध बना सके।

विश्व युद्ध के बाद कि पीढ़ी 70 के दशक में अमेरिका में सेक्स फ्री समाज बनाया लोग घर से भाग कर उस समाज मे पहुँच जाते कई दिन तक पेड़ पर तालाब के किनारे सड़क पर जोड़े नंगे लेते रहते लोगों से सामने सम्बन्ध बनाते ये तो अधिकार की बात है इसके बाद जब बच्चे पैदा हो गये अब जिम्मेदारी तो समुदाय छोड़ लोग भाग गये।

एक बात हमें सदा याद रखनी है इस धरती पर जीवन प्रकृति के संतुलन का नाम है प्रकृति अपना कानून भी लगाती है।जब व्यक्ति किसी से पराजित नहीं हो पाता उसे प्रकृति पराजित कर देती है नेपोलियन और हिटलर के इतिहास से यह पता चलता है।
आज के समय को ले तो अमेरिका जैसे देश भी प्रकृति के आगे रोज बौना हो रहा है।

यदि किसी भी तरह के मनुष्य के अधिकार है तो जानवरों के अधिकारों की बात कौन करेगा जो वह मानव के भोजन बनने और प्रयोग के लिए धरती पर आये है।

कभी कभी तो पशुओं में मानव से अधिक मानवता दिखती है और मानव में पशुओं से अधिक पशुता दिखती है।जैसे पशु को जब पता चलता है उसका पार्टनर गर्भणी है तो सम्बन्ध नहीं बताता लेकिन मनुष्य जानने के कई महीने तक सम्बन्ध स्थापित करता है

लोकतांत्रिक मूल्यों की बात की जाय तो कुछ लोगों की इच्छा को
जन इच्छा पर थोपा नहीं जा सकता है।आधुनिक विज्ञान भी कहती है अप्राकृतिक सम्बन्ध मनुष्य को जल्दी बीमार करेंगे।उन पर होने वाला खर्च समाज से टैक्स के रूप लिया जाएगा।नैतिकता के बगैर भी समाज का
निर्माण हो सकता है अब उदारवाद के नाम पर इसकी कवायद है बीमारियों को भी उच्च
बौद्धिक वर्ग जस्टिफाई करने लगे है इसका भी चलन हो।

शैडो लोकतंत्र 🌐धनञ्जय गांगेय

लोकतंत्र की जो सबसे बड़ी परिभाषा है लोगो का शासन लोगोंके द्वारा लोगों के लिये।विश्व के लोकतांत्रिक देशों पर नजर डाले बमुश्किलन एक या दो देश इस खांचे में फिट बैठते है जिसमे स्विट्जरलैंड एक है।

लोकतंत्र में लोगों की आदर्श स्थिति अरस्तू ने 2040लोगों को बताया।लोकतंत्र वह विचारधारा है जो पूंजीवाद और उदारवाद को प्रश्रय देती है।जिससे व्यापार तंत्र को व्यापक बढ़ावा मिलता है।
भारत के संदर्भ देखे तो यहाँ लोकतंत्र का मतलब सत्ता के शांतिपूर्ण परिवर्तन और वोट देने तक ही सीमित रहा। यहाँ लोकतंत्र का आधार लोक या जन कभी बन नहीं पाये।कारण जिन बुनियादी चीजों की आवश्यकता थी उसे दर किनार कर दिया है।जन भावनाओं को कुचला गया या परहेज किया।

राजनेता लोकतंत्र का आलम्बन लेकर
जातिवाद,वंशवाद,भ्रस्टाचार को बढ़ावा दिया।यहाँ तक चुनाव लड़ने के जिस धनराशि को निश्चित किया गया उससे कई गुना अधिक खर्च करके नेता जनता के सर्वांगीण उत्थान की शपथ लेता है जब सुचिता नहीं है है तो काहे का लोकतंत्र।

जमी जमाई विचारधारा जिसका आधार ब्रिटिश था जिसके माध्यम
से लभप्राप्त वर्ग शोर मचाना शुरू
किया कि लोकतंत्र खतरे में।लोक से कही ज्यादा नेताओ को अपनी सेहत पर पड़ता दिखा।

किसी भी राजनीतिक विचारधारा में सत्ता प्रमुख जनता गौण होती है शोर अधिक किया जाता है।लोकतंत्र का औजार है मीडिया,जो लोगों का माइण्ड सेटअप सुबह की पहली चाय के साथ निर्मित कर देती है।

इस राजनीति की रस्साकशी में जन पीछे छूट जाता है।ब्रिटेन में टोनी ब्लेयर चुनाव इस लिए हार गये क्योंकि उन्होंने लेबर कालोनी में लोगों से हाथ मिलाने के बाद बोल दिया।जिसके मुख न देखो उससे हाथ मिलाना पड़ता है वो यह भूल गये की इसका लाइव प्रसारण चल रहा माइक्रोफोन उनके कॉलर में ही लगा है।

भारतीय लोकतंत्र छुपा राजतंत्र है जो सत्ता को पुत्र में तिरोहित करता है नहीं तो तीन-चार पीढ़ियों से राजनीति न फलती।लोकतंत्र समस्या सुलझा नहीं पाता उसे उलझा जरूर देता है क्योंकि यहाँ किसी भी वोटर को नेता नाराज नहीं करना चाहता है।

नेता से लेकर जनता को खूब बोलने का लोकतंत्र कहे तो इस मामले में यह सफल भी है।देशहित के फैसले पर वोटप्रियता हावी हो जाती है।संवेदना उभार के सत्ता प्राप्त किया जाता है।

चुनाव के पश्चात नई सरकार को एक साल समझने में आखिर का एक साल चुनाव की तैयारी की भेंट चढ़ जाता है।चुनाव का भारी भरकम बजट लोगो की जेब पर ही अंततः प्रभाव डालता है।

लोकतंत्र वह विचार है न छोड़ते बनता है न पकड़ते।किसी विचार को तब बदला जा सकता है जब उसका विकल्प और परिस्थितिया हो।लोकतंत्र का विचार युद्ध से जन्मा था और युध्द से ही खत्म होगा।

राजतंत्र के विरोध में लोकतंत्र विश्वभर में कमोवेश खूब फला फूला है अंततः इस विचार की लोप राजतंत्र में फिर से हो जायेगा।क्योंकि जिस वादे और जिसका केंद्र लोग थे वह संतुष्ट नहीं हुये है।विकल्प परिवर्तन की ओर ले कर चला ही जाता है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आईएएस अधिकारी,व्यापारी,फ़िल्म अभिनेता राजनीति में क्यों आना चाहता है कारण कम समय मे पैसा और रुतबा मिल जाता है।

*नारी का शास्त्र*धनञ्जय गांगेय*

*धर्म के नाम पर विश्व मे बहुत खून बहे।स्त्री के लिए अलग कानून बनाया गया।उन पर चुड़ैल का आरोप लगा फाँसी पर टांग दिया गया या जला दिया गया।

भारतीय संस्कृति इनसे भिन्न है गो,ब्राह्मण,और कन्या को भोजन करा के उसे नारायण तक पहुँचा दिया जाता है।कन्या के पैर धोये और छुये जाते है।पिता जिसे जन्म दिया उससे आशीर्वाद लेता है बड़ा भाई छोटी बहन के पैर छूता।
धर्म के लिये विश्वभर में कत्लेआम हुआ।जिस चीज को लेकर नारियां आलोचना करती है वही नारी के सम्मान के लिए रामायण और महाभारत कर दी।वही जिन्हें हम राम और कृष्ण के रूप में पूजते है।

यदि आप हिन्दू धर्म मानते है तो हिन्दू विधियों का पालन करना होगा।स्वैच्छाचारिता नहीं चलेगी।
कभी कभी स्त्री के सती होने का साक्ष्य मिलता है पहला महाभारत में पांडु की पत्नी माद्री का दूसरा गुप्त वंश के ऐरण अभिलेख से भी सती का साक्ष्य मिलता है बाद में कुछ छुटपुट घटनाएं देखने को भी मिलती है।

सती जिसे प्रथा का नाम दिया गया जिसके लिए राजा राममोहन राय को अंग्रेजो ने मोहरा बना कर भारतीय संस्कृति पर हमला किया।संस्कृति पर प्रहार इस लिए किया जाता है जिससे आपकी प्रेरणा को तोड़ कर दिग्भ्रमित कर अपने को श्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके।

सती होना स्त्री की स्वेच्छा थी जोर जबरदस्ती नहीं।सुलोचना के सती होने का साक्ष्य मिलता है तो कौशल्या,कैकेई,सुमित्रा और मंदोदरी के जीवित रहने का साक्ष्य है।जो यह समझती है कि ये जो मेरे पति है जो मृत्युशैय्या पर लेटे है इनके वैगेर तो मेरा जीवन ही नहीं हो सकता क्योंकि जीवन और मृत्यु दोनों में हम अभिन्न है।

नारी सम्मान और प्रेम की गाथा भारतीय संस्कृति है यह अलग बात है हमें अपनी संस्कृति का ज्ञान नहीं है।हम पश्चिमी सभ्यता के बहकावे में आ जाते है।

पर्दा प्रथा को ले यह भारतीय संस्कृति की देन नहीं बल्कि इस्लामिक कल्चर है भारत में स्त्री पुरुष बराबर ही नहीं बल्कि पूरक है वह कौन सा घर नहीं है जहाँ मां का अनुशासन नहीं चलता है।यह अलग बात है की शुरू की स्त्रियों की जगह आयुवृद्धि की सुनवाई ज्यादा होती है।क्योंकि उसके व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होते है।

“एको ही नारी सुंदरी या दरीवा” अर्थात नारी एक हो वह चाहे सुंदर हो या कुरूप।भारतीय संस्कृति विदुषी नारी से भरे पड़े है वह वेद की ऋचाएं रचती थी।वह शास्त्रार्थ (वाद विवाद)में भाग लेती थी ।

कैकेयी और द्रौपदी तो राजसलाहकार भी थी।समस्या वहां है जब हम अपने को जानते नहीं।वेद,उपनिषद और रामायण की आलोचना वह करता है जिसने कभी पढ़ा ही नहीं।सती के अपमान पर संकर से अपने श्वसुर प्रजापति दक्ष का सिर काट दिया था।हम व्यक्तिगत हित को सर्वहित से ऊपर रख रहे है जिससे जकड़न महसूस हो रही है।

मैं कौन हूं🤔🤔🌹धनञ्जय गांगेय

मैं वह नहीं जो लोग समझते है।मैं वह हूँ जिसे मैं समझना नहीं चाहता हूँ।आखिर मैं कौन हूँ।परिवार कहता है धन कमाओ,लोग कहते है धन के साथ पद ले आओ।रिश्तेदार कहते है हमें भी कुछ दे जाओ,राजनीति कहती है वोट बन जाओ।अपना वर्ग कहता है जाति शिरोमणि बन जाओ।

देश कहता है जिम्मेदार नागरिक बन आओ।बुद्धि कहती है थोड़ा नाम कमा आओ।धर्मग्रंथ कहते है कि सही रास्ते चलते चले जाओ।आत्मा सुख शांति लाओ कह रही है ।मांगे तो सबकी की है पर पूरी नहीं हो पाती है।”आत्मनो आत्मनः आत्मनि विद्धि” अर्थात स्वयं को स्वयं में स्वयं के द्वारा जानों।हमारा मूल स्वभाव कब खो जाता है हमे पता नहीं चलता है।
यदि आप ने सही प्रक्रिया अपनाई तो जो आपने तय किया उसे पायेगें।नहीं तो लोग आप को चला ही रहे है।किसी को किसी से कुछ नहीं पड़ी बस वो किसी को अपने से आगे जाता नहीं देखना चाहता है।प्राथमिक शिक्षा उद्देश्य से भटक गई गई है।उदर भरने वाली विद्या भी ली किन्तु उदर भरने में वह नाकाफी है। शिक्षा जो शैतान को इंसान बना तो दे परन्तु शिक्षा दे कौन?यहाँ बकबक के सिवा सब मौन है।
सब एक दूसरे पर रंग डाल रहे है और खुद बदरंग है।कबीर कहता है जो घर बारेआपने उ चले हमारे साथ।मन कहता है कि मनवा पंछी भया उड़ के चला आकाश।
हे मानव तू तो उस शक्ति की श्रेष्ठ कृति हो फिर भी फसा है दरपेस में ।एक बार बोलों न कि तुम हो,तुम हो?

भारत महाभारत🚩🚩💥धनञ्जय गांगेय

भारत न रुका है न थका है किन्तु उसका मन थका है थकना मतलब ठहराव ।देखा जा सकता है वो पिपासा वो अभिलाषा ज्ञान विज्ञान को लेकर नहीं है जो होनी चाहिए हम विचारों के आयातक पिछले कई सदियों से बने हुये है।
नूतन प्रयोग करने से कतराते है नकल की आस भरे जीवन की गुलाटी लगाने की हिमाकत करने में हमें गुरेज नहीं है हठधार्मिता तो आवरण ही बन गई ।लोग कह रहे है कि “तुमसे नय होगा बेटा” हमें भी लगता है कि हमसे नहीं होगा।सकारात्मक संभावना विज्ञान की ओर ले जाती है नकारात्मक संभावना कुछ नया करने से पहले ही उठे हुए प्रश्न का गला घोंट देती है।
भारत अपने मन के इलाज के लिये पूछ रहा था मेरी समझ में नहीं आया कौन सा भेषज बताऊ? मैने कहा निराश मत हो सब के ठीक होने का समय आता है आप का भी नये दशक के अंत तक कुछ न कुछ जरूर होगा ।सही महा दशा आने वाली है।
मैं कहा कि एक इलाज और है तुम कृष्ण से क्यों नहीं पूछते हो जब कुरुक्षेत्र में अर्जुन के हाथ से गांडीव गिर गया था अर्जुन का मन अपनों के लिये व्याकुल हो उठा था।अपने वंश की लाशों पर हस्तिनापुर का सिंहासन नहीं पाना चाहता था ।तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि धनंजय ये समस्या परिवार की नहीं रही है ।अब तो वो सभी मन कुरुक्षेत्र में आ खड़े है।
आशा भी लाये है कि न्याय मिलेगा उन नारियों को जिनके आत्मसम्मान को रोज रौंदा जा रहा है राजा कह रहा है कि मेरी तो आंखे नहीं है।ऐसा राज जो नीति विहीन है तो राजनीति कैसे करेगा।तुम वो करो जो करने आये हो लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही।उनकी कुछ समस्या भी रहेगी ।कृष्ण ने अर्जुन के मन को खड़ा किया ।यह भी कहा तू युद्ध में मन लगा परिणाम में नहीं।
ये मन की चंचलता मन को स्थिर नहीं रहने देती है
मन ही मन को जनता
मन की मन से मीत
मन ही मनमानी करें
मन ही करत फजीत
मन जोगी मन बावरा
मन की अद्भुत रीत
मन के हारे हार है
मन के जीते जीत
हम चाहे तो वो सब कर सकते है जो करना चाहते है।भारत ने कहा इलाज सही है मैं अपने घर वालों से राय मशविरा कर लूं तब देखता हूँ कि क्या हो सकता है?

भारतीय राजनीति की दशा~धनञ्जय गांगेय* **

नकारात्मक राजनीति करने का रिवाज भारत में चल गया है।नेता जिस सीढ़ी से ऊपर जाता है उपर पहुँच सीढ़ी तोड़ देता है या जला देता है।उसका एक ही धर्म होता है कि हर वो जुगत की जाय जिससे सत्ता बची रहें।आरक्षण,दलित,पिछड़ा का उपयोग सत्ता की सापसीढ़ी चढ़ने के लिये किया जाता है।
लोकतंत्र भी अर्थशास्त्र के सिद्धांत डिमांड और सप्लाई पर काम करता है जिसकी जितनी मजबूत मांग उसको उतना फायदा मिलता है।भारतीय समाज की दो जातियां कमोवेश बराबरी पर थी यादव और पाल दोनों पशुपालक(अहीर और गड़ेरिया)यादव डिमांड और संख्या के बल पर राजनैतिक सुविधा ,सत्ता और समाज में मजबूत स्थिति बना ली वही पाल जाति डिमांड रख नहीं पाई संख्या बल उसके पास नहीं था ।भारतीय समाज में कही खो गया अब तो लोग भूल भी गये है कि पाल भी कोई जाति है।1957 में राममनोहर लोहिया ने कहा था जातियाँ राजनीति का बीमा है।अम्बेडकर ने कहा था आरक्षण किसी भी परिस्थिति में 10 साल से ज्यादा नहीं होना चाहिये नहीं तो राजनेता राजनैतिक रोटियां सकेंगे।समजशात्री पालकीवाला ने कहा था आने वाली पीढियां चैन से जी नहीं सकेगी और गृह युद्ध के बाद ही आरक्षण खत्म हो।
दलित उनके लिए प्रयोग होता है जो समाज मे दबाये गये है आज तो सब दलित बनने की जंग कर रहे है पिछले दिनों झारखंड में महतो (कुर्मी या पटेल) st बनने के लिये आंदोलन किया था।गुजरात मे पटेल,आंध्र में कापू,महाराष्ट्र में मराठा,हरियाणा का जाट,राजस्थान का गुर्जर भी पिछड़ों में शामिल होने के बंद का आयोजन किया था कई जगह हिंसा भी हुई।यदि ये पिछड़े है तो अगड़े पिछड़े क्यों बनना चाहते है।72 वर्षों में कोई अगड़ों में शामिल क्यों नहीं हुआ?
ओबीसी आरक्षण यादव खा जा रहा है sc आरक्षण को चमार या जाटव वही st आरक्षण मीना साफ कर दे रहा है बाकी जातियाँ को लाभ न मिले उनको इतना सकून है कि वह आरक्षित वर्ग में शामिल है।नेता सब करने को तैयार है सिवाय गरीब के पीठ से उतरने को।देश का क्या उसे अपनों ने तोड़ा है।बस मुगल और अंग्रेजों के सामने वह बिखर गया है।आज भारत कही कोने में खड़ा अपनी दुर्दशा पर खोया होगा।
यहाँ के नेताओं में मसीहा बनने की बड़ी कुलबुलाहट है।वह उद्धारक बन वंशवृक्ष लगायेगा या राजनैतिक पूजा को विवश करेगा।1989 में sc st एक्ट को लागू किया गया 27 वर्षो के बहुत सारे मुकदमे में देखा आपसी रंजिश को इसी में रंगा गया ।मायावती मुख्यमंत्री रहते हुए स्वीकारा था की इस एक्ट का दुरुपयोग हुआ है और तुरंत गिरफ्तारी पर रोक भी लगा दी थी।
जमुहुरिअत वह सिला है जहाँ सिर तौले नहीं जाते गिने जाते है यदि गिनती ज्यादा हुई तो बोली ज्यादा लगेगी। जनसंख्या नीति जब तक भयावह नही हो जाती है ,एक दूसरे को नहीं काटती तब तक नेता उस पर विचार नहीं करेगा ।मूर्तियां लगाने उसे और बड़ा करने के पीछे अपने कद को भी बढ़ाना है।एक रवायत और है की जितना दलितों और पिछड़ों की बात करोगे उतने ही बड़े नेता बनोगे ऐसा कही सुन रखा है संसद सदस्यों ने जिस पर लगातार वर्कआउट कर रहे है।
योग्य की जगह अयोग्य का चयन ये कभी नैसर्गिक न्याय नहीं हो सकता है वैगेर न्याय के कोई समाज ज़्यादा दिन तक जिंदा भी नहीं रह सकता है।टुकड़ो टुकड़ो और खंड खंड में बाट कर सत्ता की जुगत वैठाई जा सकती है किन्तु देश को कैसे बैठाओगे ।देश योग्य व्यक्ति के हाथों में सुरक्षित रहता है।
अंग्रेज चला गया इस देश से लेकिन अपना चश्मा छोड़ गया भारतीय नेताओ के लिये।जो बाटो और राज करो का खेल ,खेल रहे है।देश के लिये जातियाँ दुखदाई है तो छुटकारा पाइये, इसको राजनीतिक रूप से पोषित क्यों किया जा रहा है।संविधान में जाति ,आरक्षण के नाम पर बार बार संशोधन किया जा रहा है।किसी जाति का प्रतिनिधित्व पूरा होने में कितने सौ साल लगेगे।
सत्ता रहे देश रहे न रहे खेल चले खिलाड़ी जिये या मरे।भारत भाग्य विधाता कौन है नेता,जनता,संविधान में स्थिति स्पष्ट नहीं है।आंतरिक कलह कैसे विकास को बढ़ा पायेगी ।आरक्षण की रोज नई मांग है नेता कहता है नौकरी नहीं है बेजागिरदारी संकट है आरक्षण की सीमा बढ़ाओ नौकरी मत दो।
पुलिस सुधार न करो नित्य कानून कड़ा करो ।वसूली वाली पुलिस नेताओं के खैरमकदम से मुक्त हो जाये उसे ऊपर तक रुपया न पहुचना पड़े तो सामाजिक न्याय की कुछ स्थापना हो सकती है।