भारत खाला का देश नहीं 🚩

विश्व में भारत की पहचान उसके सनातन धर्म,मन्दिर और बौद्धिक लोगों से होती रही है। भारत अपने ज्ञान,विज्ञान,चिकित्सा पद्धति, ज्योतिष विज्ञान और निर्माण कला से प्राचीन विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया। विश्व में भारत बनने की होड़ लगी थी।

प्राचीन समय में ही भारत का सम्बन्ध बेबिलोनिया,हिब्रू, रोमन,यूनान, मिश्र आदि देश से रहा है। व्यापार अधिशेष सदा ही भारत की ओर था। रोमन,बौद्ध जैसे लोगों की कुत्सिगं चाले भारत में सनातन संस्कृति को नष्ट करने की, कभी सफल नहीं हो पायी। भारत के राजे विक्रमादित्य, पुष्यमित्र शुंग,गौतमीपुत्र शातकर्णी,वशिष्टि पुत्र पुलमाली,गुप्त सम्राट, हर्ष ,नागभट्ट ,बप्पा रावल और दक्षिण भारत के चोल- चालुक्य राजे सनातन धर्म के विद्रोहियों को भारत भूमि से खदेड़ते रहे है।

यह अनवरत संघर्ष बर्बर मुस्लिम लूटेरों के समय में भी जारी रहा। गजनवी,सैयद सालार,गोरी,

ऐबक,इल्तुतमिश, खिलजी,तुगलक से लेकर मुगल तक। यह जरूर है कि जो मुहम्मद गोरी के बाद वाले लुटेरे भारत को अपना आशियाना बनाया लेकिन बुतशिकन (मूर्ति तोड़ने वाला) की उपाधि भी धारण करते रहे। जजिया और तीर्थयात्रा कर लिया । भारत के मंदिर टूटते और लुटते गये इस्लामी सभ्यता भारत में पांव पसारती गयी।

अब आपके मन में प्रश्न होगा जब भारत में इतने बड़े बड़े योद्धा थे तब लुटेरा मुस्लिम भारत में कैसे सफल हो गया? इसको अच्छे से समझा जा सकता है जिसप्रकार आज सत्ता के गिद्ध भारत को नीचा दिखा रहे है भारत को तोड़ने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है उस समय यही घर के भेदी लंका ढाये। अपनों की मुखबिरी सत्ता पाने के लिए विदेशियों से की थी। भारत के राजे के पराजय में मुख्य कारण था गद्दारों का शत्रु खेमें में चले जाना। जिनकी तलवारें सैयद सालार को काट सकती थी
क्या वह अरबी,मुगल,पठान धड़ सर से अलग नहीं कर सकती थी।

भारत के राजाओं में एकता नहीं होने का फयदा विदेशियों द्वारा उठाया गया। बाकी का काम भारत के अंग्रेज परस्त इतिहासकारो ने कर दिखाया। अंग्रेज और बर्बर मुस्लिम लुटेरों का महिमामंडन करके दोष हिन्दू धर्म की कुरीतियों और ब्राह्मणों में खोज निकाला।

ईसाइयों को सबसे बड़ी कामयाबी तक मिली जब भारत के प्रधानमंत्री के पुत्र को एक बारबाला ने फ़सा के शादी कर ली। वह फायदा क्या था ? भावी प्रधानमंत्री और राजनीतिक का सहारा लेकर ईसाई मिशनरियों का खुला खेल फरुखाबादी चलाया जा सके। इस महिला के प्रभाव में कम से कम भारत के 5 करोड़ लोगों को ईसाई बनाया गया। एक नामचीन ईसाई धर्म परिवर्तन कराने वाली महिला को भारत रत्न भी दिया गया।

मुस्लिम शासको का उद्देश्य भारत में स्पष्ट था अवैध कब्जा और इस्लाम का प्रसार। ऐसा मत समझिये कि कोई मुस्लिम शासक किसी हिंदु से संवेदना रखता था। औरंगजेब के समय सबसे ज्यादा मनसबदार हिन्दू थे यह औरंगजेब हिंदुओं को हिन्दू से लड़कर वजीफा देकर इस्लामिक संस्कृति को बचाने के लिये किया था। हिन्दू तलवार हिन्दू के विरुद्ध मुस्लिम साम्राज्य की हिफाजत के लिए।

मुस्लिम शासक जितना हो सकता था उतना हिंदुओं का उत्पीड़न किया। अधोध्या, मथुरा,काशी,सोमनाथ,पाटन, पुरी आदि के मंदिरों को ध्वस्त किया।

दूसरा बड़ा लुटेरा ईसाई और अंग्रेज था जो भारत से व्यापार की नियत से आया और राजा बन बैठा। समाज में हिन्दू- मुस्लिम वैमनस्य का भरपूर लाभ लिया।

ब्राह्मण को सिनेमा,साहित्य के माध्यम विदूषक वही हिन्दू धर्म का बार बार मखौल उड़ाया गया। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में निरूपित किया।

न्यायालय ने हिन्दू को धर्म न मान कर एक जीवनपद्धति कहा जिसका मखौल फिल्मी भांड उड़ाते रहे है। जो आज भी अनवरत जारी है। किसी पैंगबर के कार्टून को चित्रित करने पर चित्रकार की गर्दन काट ली जाती है शोर शराबा विश्व भर में होता है मुस्लिमो की धार्मिक भावनाएं आहत हुई है इस लिए कमलेश तिवारी हो या चित्रकार उनकी गर्दन काटनी जायज है। इसका शोर भारत के टीवी डिबेट में भी सुनने को मिला है।

क्या हिंदु जब तक किसी हिन्दुधर्म के अपमान करने वाले कि गर्दन नहीं कटेगा तब तक यह फ़िल्म,साहित्य,
मुशायरे,मीडिया में हिंदू धर्म का अपमान होता रहेगा?

ईसाई -मुस्लिम जिसे आप धर्म समझ रहे हो वह धर्म होने की कोटि में नहीं है! जो धर्मावलंबी दूसरे धर्म वाले को हीन समझता । दूसरे की गर्दन काटने,अबोध जीवों को खाने का अधिकार देता है वह धर्म कैसे हो सकता है?

विचारों में विचार घुसेड़ने का षड़यंत्र

सही विचार सनातन शास्त्र वेद,उपनिषद, ब्राह्मण,आरण्यक, रामायण,महाभारत के साथ शंकराचार्य, रामानुजाचार्य,चाणक्य,भर्तहरि, विष्णुदत्त शर्मा द्वारा लेखन में झलकता है।

ज्ञान,विज्ञान,कला,व्याकरण,ज्योतिष,वैराग्य,धर्म,मर्म,
मुक्तिबोध भारतीय दर्शन से होता है । धर्म की विधियों का विधिवत पालन करने से धर्मापेक्षिक लाभ मिलता है। इसका पालक करके अनुभव प्राप्त कर सकते हो।

प्रश्न है किस विचार को सही माने.. जिसपर सदियों के अनुसंधान का अनुभव है या उसे जो स्वयं की समस्या या किसी देश के हित में रखकर किसी नये तरह की थियरी गढ़ ली गई वह ही सही है….जैसे जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त नहीं होता था उस व्यवस्था को लाभ पहुचाने के लिए जिस विचार को रोपा गया। वह साम्राज्यवादी पूँजीवादी राजतंत्रात्मक लोकशाही के आसपास विचार बुने गये।

बढ़ते यूरोपीय औद्योगिकरण में मजदूर की समस्या जब मुँह उठाने लगी तब उसे शांत करने के लिए समाजवाद,मार्क्सवाद के बीज बोने शुरू किये। लेकिन मजदूरों की समस्या अभी शांत न हुई थी कि उपनिवेशों की यूरोपीय होड़ ने दो विश्व युद्ध लेकर आया। पहले विश्व की समाप्ति की बेला पर फ्रांस द्वारा जर्मनी पर आरोपित वर्साय की संधि ने हिटलर के फाँसीवाद को पैदा कर दिया। उसे लगा इसी से वह जर्मनी को फिर से खड़ा कर सकता है। नये उभरते देश जापान और रूस ने दूसरे विश्वयुद्ध की आपदा को अवसर में बदलने की चेष्टा की।

दूसरे विश्व का माहिर और शातिर खिलाड़ी अमेरिका अपनी नई विचारधारा “व्यवहारवाद”और “देहवाद” को आधुनिकता और लोकतंत्रवाद की चपेट में लपेट लाया। सत्य को व्यक्तिपरक करार दिया। इस नई पूंजीवादी व्यवस्था को बाजारवाद और उदारवाद दो नये कपड़े लपेटे गये।
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नये नये देश नये नये विचार और उसकी पुष्टि से पुराने जांचे परखे विचारों को तोड़मोड़ कर दिया। अब पुरानी हवेली पर नये “टीन सेट” में रहने को आधुनिक और विकासवादी कहा गया। किसी अन्य व्यवस्था के पोषक नये विचार को परोसना शुरू किया। दर्शन के क्षेत्र में उत्कट अनुभववाद,अस्तित्व वाद और मानववाद की पतंग उड़ाई गयी। यह रंगविरंगी पतंग अपनी जड़ से कटे लोगों को खूब भायी।

इतिहास की साम्राज्यवादी,मार्क्सवादी लेखन ने मूल इतिहास को ही गायब कर दिया। सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर सेकुलर वामपंथ विचार ने समाज को ही बाजार बना दिया। लोग हित देख मौन मनमोहन बन गये।
★★★★★★★★★

खाद्यशास्त्र को खाद्य विशेषज्ञ ऐसा सिद्ध किया कि प्राचीन पोषक खाद्यश्रृंखला के स्थान पर मांस और बीमार करने वाले भोजन को रोपित किया…. जिससें बाजार के साथ मेडिकल उद्योग को नई उड़ान मिल सके। सबसे बड़ी बात इन सब की पुष्टि के नये प्रतिष्ठित जनरल और नोबल जैसे पुरस्कार और इनके कार्यक्रम का बड़े स्तर पर लांचिंग की गई। लांचिंग सफल हो इसके लिए मीडिया,साहित्य और सिनेमा को भी भागीदार बनाया गया।

समस्या वही है कि आखिर मूल विचार क्या था जो मनुज के अनुरूप था। अब तो इसी का रिसर्च होना है…। हिटलर कहता था झूठ को लाख बार बोल दीजिये वह सत्य पर भारी पड़ जायेगा। अर्थात सबसे बड़ा सत्य वही बन जायेगा। यह मीडिया संस्थान सबके राजदार बन गये पुलित्जर और मैग्सेसे पुरस्कारों से नवाजे गये। यह पुरस्कारों की श्रृंखला अन्य महकमे में बदस्तूर जारी है।

सही और गलत का अनुमान लगाना वैसे ही मुश्किल हो गया है कि जैसे मुर्गी पहले आई कि अण्डा। लेकिन जीभ का स्वाद दोनों को बनना है।

विश्व की विविधता को छद्म विकासवादी विकास और सुधार के नाम नष्ट कर रहे है इतिहास में ऐसे नैरेटिव सेट किये गये की राणा,शिवाजी, बाजीराव देशद्रोही वही अकबर राष्ट्रवादी औरंगजेब सेकुकर । बर्बर विदेशी आक्रांता निर्माणकर्ता, लुटेरा अंग्रेज भारत का उद्धारकर्ता। ईसाई मिशनरियां सबसे बड़ी सेवादार।

भारतीय व्यवस्था बिल्कुल सड़ी हुई थी उसे कोई मुगल या अंग्रेज लपक सकता था। भारत की विविधता की बात हो तो वह चाहे संस्कृति, समाज,बाजार,व्यापार,
समयानुकूल खाद्यान्न,परिधान सबको गल्प इतिहासकारों ने वर्णन नहीं किया या छुटपुट इसतरह का वर्णन किया कि वह आपको भी बुरी लगे। भारत के राजे और राजगुरु को आधुनिक शासक और विचारकों का विरुद प्रदान किया गया। क्षेत्रीय सामाजिक समस्या को अखिल भारतीय सनातन धर्म की समस्या कह कर स्कूली शिक्षा में पर्दा,सती प्रथा नाम दिया लेकिन इनके पीछे के उन कारणों को नहीं बताया।

आर्यो को बाहरी मुगल को देशी बना दिया गया। अंग्रेज व्यापारी था भारत की कुव्यवस्था देख कर राजनीति में हिस्सेदारी करने लगा। वहाँ सीनेट भारत की बेहतरी के लिए काम कर रही थी।। वह तो 1857 के स्वतंत्रता समर नायक,नायिका अपने स्वार्थ के लिये जब विद्रोही से मिल गये, समाज में अव्यस्था फैल गयी तब जाके बेचारी रानी विक्टोरिया ने कम्पनी से शासन की बागडोर ले ली। ऐसा तो इतिहास हमारे स्कूल में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।

आर्य,हिब्रू,हित्ती,बिबिलोनियन,चीन,ग्रीक,रोमन, माया,नील घाटी,जापानी सभ्यता को नदी मान कर उन्हें अंग्रेज रूपी राक्षसी समुद्र में उड़ेल कर आधुनिकता का जामा पहना दिया गया। नस्लों, धर्मो की सांप सीढ़ी का खेल विश्व के मैदान पर विचारक कलम से खेल रहे है। तुम सुबह के न्यूज पेपर का इंतजार करो ,दिनभर का मसाला मिल जायेगा। यह ऐसा नशा है जो सीधे दिमाग की नशों में घुस जाता है । फिर तुम्हारें पास विचार करने का विचार कहाँ रह जाता है।
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Happy new year😑

यह किसका नववर्ष है कौन सेलिब्रेट कर रहा है?

सनातन परंपरा में मृत्यु भी एक बड़ा महोत्सव होता है उसका कारण यह है कि लोगों का मानना है जीव को जरामरण चक्र से छुटकारा मिल गया है।

मनुष्य को देखे तो उसके जीवन से एक महत्वपूर्ण वर्ष और 31564512 सांसे कम हो गयी। जिसमें मनुष्य जीवन का उद्देश्य सदकर्म किया ही नहीं । फैशन और देहवाद में हम ऐसे फंसते गये है कि बिना उद्देश्य के उत्सव माना रहे। अरे इस उत्सव के पीछे क्या विज्ञान है उस पर शायद कभी विचार नहीं किया गया।
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शराब और न्यू ईयर की पार्टी उसके बाद जोर जोर से बोलना हैप्पी न्यू ईयर….। लोग इसके लिए बड़ी तैयारी करके रखते है। प्रेमी- प्रेमिका का मिलन हो या दोस्त-यार का । नये वर्ष का उद्देश्य नये प्लान बना का उसपर काम करने का होता है। लेकिन भारत में दारू,पार्टी,गोवा टूर आदि जैसे बुरे कार्य करके ही नया साल मुबारक हो रहा है। नई पीढ़ी प्रचार में फँस कर नये साल को जोर जोर से मनाने के लिए बेताब है। शिक्षा प्रणाली,मीडिया,टीवी कह रहे सेलिब्रेट करो नया साल। साली ये जिंदगी न मिलेगी दुबारा। ●●●●●●●

सिनेमा ऐसा शसक्त माध्यम है कि इमोशन डाल के बुरी से बुरी चीज के लिए सैम्पेथी ले जाते है। सिनेमा पर मन,आंख,कान के साथ शरीर भी एकाग्र रहता है। इस बुरे चलचित्र का प्रभाव हमारे युवा पीढ़ी पर सर्वाधिक है। आज का सिनेमा,सीरियल अच्छे से ज्यादा बुरे की पैरोकारी करता दिख रहा है। “बिगबॉस” कार्यक्रम का उद्देश्य बनाने वाला और देखने वाला दोनों नहीं जानता। फिर इसके दर्शक की संख्या बहुत है।
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सनातन धर्म में नववर्ष की शुरुआत चैत्र प्रतिपदा से होती है। यह चैत्र प्रतिपदा हर वर्ष मार्च-अप्रैल के बीच पड़ती है। जिसकी शुरुआत देवी-देवता के पूजन से होती है। शराब या पार्टी की नौबत नहीं आती बल्कि नवरात्र का व्रत रखना होता है। बड़ा आसान है कुछ बुरा करना,नशा करना, पार्टी करना या नंगे-पुंगे को देखने की अभिलाषा लेकर गोवा आदि जाना। लवर बन कर किसी होटल में रूम खोजना।

वायरल जो हो रहा है

अंग्रेजी शिक्षा तुम्हें क्या से क्या बना रही है आपके पास इस पर विचार करने का टाइम नहीं है न ही अपने बच्चों के लिये ही है की वह न्यू ईयर के नाम पर क्या कर रहा/रही है। आपका बच्चा बड़े का सम्मान भूल गया,आपसे बात-बात झगड़ पड़ता है। लेकिन समय ऐसा है जब माता-पिता ही अपने लाडले/लाडली का जीवन पंगु और नष्ट कर दे रहे है।
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बच्चे को नौकरी की शिक्षा देने से बेहतर है कि उसे भला इंसान बनने की शिक्षा दे। जिससें उसका रह-रह कर मूड न ऑफ हो। जीवन को कैसे आगे बढ़ाना है यह उसका विषय है। जिसतरह गाड़ी सीख लेने के बाद आप कही भी लेकर उसे जा सकते है। उसी प्रकार बच्चें में संस्कार डाल देने से वह अपने जीवन को कही भी लेकर जा सकता है।

दोष अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था से ज्यादा हमारा स्वयं का है जो अपने सनातनी संस्कार ,सनातन धर्म को भूल कर खिचड़ी सेकुलिरिज्म में फँस गया है। कैलेंडर की जगह कब संस्कृति बदल दी पता ही नहीं चला।हमें अपने मूल को जानना होगा जिसके जानने में विश्व का कल्याण छुपा है।

@धनञ्जय गांगेय

विरोध के पीछे का विरोध

पेप्सी,कोक,बेसलेरी,एक्वाफिना,नैस्ले,कैडबरी जहर खिलाये-पिलाये क्या मजाल कोई विरोध कर दे।
इंग्लिश मीडियम के स्कूल का विरोध नहीं क्योंकि आधुनिक बनाया जा रहा है। भले बच्चे आधुनिक शिक्षा लेकर माता-पिता से मारपीट करें।

विरोध वैदिक बोर्ड का करेंगे,अम्बानी,अडानी,पतंजलि
,टाटा और संस्कृत शिक्षा पद्धति का होगा। गीता विश्व के स्कूलों में पढ़ाई जा सकती है लेकिन भारत में सेकुलिरिज्म विधवा हो जाती है। वैदिक शांति पाठ से अमेरिकी सीनेट, न्यूजीलैंड और बिट्रेन के संसद सत्र की शुरुआत हो सकती है भारत में अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत हो जाती है।

वोट बैंक के नाम पर अल्पसंख्यक का अर्थ मुस्लिम से कही कही ईसाई भर से है । भारत में विरोध के नाम पर भारत का विरोध हो रहा है। भारत तोड़ने वाले के लिये कसीदाकारी होगी।

मुस्लिम,ईसाई अपने धर्म की शिक्षा सरकारी इमदाद से ले सकता है । हिन्दू शिक्षा और हिन्दू शिक्षा पद्धति का विरोध सरकारी खर्चे पर होगा। हिन्दू धर्म परिवर्तन करें तो गंगा जमुनी संस्कृति या प्रताड़ित था सम्मान नहीं था। मुस्लिम धर्म परिवर्तन करें तो संविधान खतरे में।

सती प्रथा ,देवदासी प्रथा ,बहुविवाह प्रथा और पर्दाप्रथा हिंदुओं में है ऐसा हमें पढ़ाया जाता है। बुर्का, खतना,हलाला,मुता यह मुस्लिम धर्म की जरूरी चीजें है इसे अन्य धर्मावलंबियों को नहीं जानना चाहिये।

विदेशी कम्पनी का विरोध नहीं किया जायेगा यदि स्वदेशी कम्पनियों का विरोध करना है दिल्ली नेक्सस तैयार है जिसमें कुछ मीडिया घराने भी भाग लेते है।

बड़े चाव से हिंदू धर्म पर नैरेटिव विकसित करने का कार्य, साहित्य , सिनेमा,न्यूजपेपर आदि से किया जाता है । कश्मीरित के नाम लेकर पत्थरबाजी जायज है। नशे में उड़ता पंजाब हो सकता है।

यह सारा विरोध सत्ता बनाने और पाने के लिए किया जा रहा है।

हे री सखी 🙆…

तुम कब जाग्रत होगी , मेरा इंतजार जन्मों जन्म का है इस जनम में न सही तो अगले जनम में मिलेंगे।

ये प्रेम ईश्वर को अपना बना लेता है। प्रेम की एक छोटी देन मानव है ।हम तुम एक मनुष्य ही है। जिसकी सीमा शरीर है किंतु मन और आत्मा की कोई सीमा नहीं है । मन तो सेंकड के करोड़वें हिस्से में ब्राह्मण्ड का चक्कर लगा कर आ जाता है। रही आत्मा की बात तो यह न मरती है न नष्ट होती है।

शरीर पंचभूतों का संघात है यही का है यही रह जायेगा। अमरत्व शरीर को बरदान में नहीं मिलता है।
सखी मैं सोचता हूँ कि तुम अचेतन अवस्था में ही मुझसे बात करती होगी। मैं जरूर तुमसे कहता हूंगा मेरे लिए जियो तुम। तुम्हारे बिना मेरे जीवन की कल्पना कैसे होगी?मैं बुढौती में किससे झगडुगा।
तुम जीना चाहती हो तो मौत को मारकर आ सकती हूं।

मेरे जगने के साथ लगता है कि तुम आज बोलोगी फिर शाम के बाद नई सुबह की वही आस…

प्रेम आसान होते हुये भी कठिन है यह एक साधना है जो नित्य जीवन में साधना पड़ता है।

सखी मुझे लगता है कि मेरी बात तुम तक जाती है। तुम सुनती हो..

ह्रदय के रिश्ते में किसी बनावटी माध्यम की जरूरत नहीं पड़ती है। (इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मोबाइल आदि)

सखी ऐसा लगता है कि जल्द ही स्वस्थ कर मुझसे बोलोगी। यह भी कहना है तुमसे इस भौतिकता की भूल भुलैया में मानव मनुष्य होने का हक खो दिया। रिश्ते की डोर पैसे के जोर ने पकड़ ली है। अब एक दूसरे के लिए फीलिंग नहीं है बस जरूरत है।

मैं हर उस चीज में तुम्हें महसूस करता हूं जिसमें प्रकृति समाहित है। मेरे मनुष्य होने की सीमा न होती मैं ही तुम्हारा स्वास्थ्य बन जाता है। तुम्हे चेतन करता मैं रहता या न रहता 😪

हम दोनों तो उस मानसरोवर के हंस की तरह है जिसे लौटकर वही जाना है जहाँ से आया है। यदि प्रेम ईश्वर है तो हम जरूर एक होंगे। तुम आना मेरे इंतजार का कोई समय सीमा नहीं है बस तुम हो😢😢

मेरा कमरा—

मैं और मेरे कमरे की कहानी बहुत रोचक रही है जब मैं कमरे में रहने पहुँचा तब एक अल्हड़ और मूढ़ था धीरे धीरे मेरी कमरे से दोस्ती हो गयी। बहुत सी योजनाएं इसी में बनी बिगड़ी।

जब कोई साथ नहीं था तब भी यह था मुझे धैर्य धराता रहा कि तुम हो ,ठान लो तो कोई मुश्किल नहीं है। मेरा कमरा मेरे लिए एक ऋषि के तपस्थल से कम नहीं है। यह मुझें किसी और से बहुत ज्यादा दिया है। पढ़ना और लड़ना सिखाया। वेद,उपनिषद, धर्म आदि की जीवंतता में ले गया।

इसने कहा कि धनंजय तुम धार्मिक व्यक्ति हो ,धर्म के मर्म को समझो। समाजिक इच्छापूर्ति के साथ सामाजिक इकाइयों को भी जानो।

जब मैं निराश होता हूँ तब मेरे में सकारात्मकता का संचरण करता है।

कमरे ने एक अच्छा व्यक्तित्व बनाने में पूरा योगदान दिया। भारत भ्रमण,चार धाम की यात्रा,सप्तपुरियों के दर्शन जैसे संयोग बनाने में अपना सहयोग किया। मेरे अब तक के सबसे प्रिय लोगों तक भी पहुँचाया है।

ऐसे कमरे का साथ छूट गया।मैं कहीं और चल दिया। सबसे बड़ी बात कमरें ने कोई शिकायत नहीं की। बस इतना कहा कि उसके शबब याद रखो और जहाँ भी रहो प्रसन्नतापूर्वक रहो। मेरा और तुम्हारा साथ पूरा हुआ। यह जीवन है जो परिवर्तन के साथ चलता है। कुछ सपने ऐसे होते है जिन्हें जीवन में जीना होता है।

कमरा निर्जीव होता है फिर भी सजीव सा लगता है। क्योंकि जब मैं अपने साथ एकांत में था वह भी तो वही था। ऐसा दोस्त जो मेरी हाँ को हाँ ,मेरी न को न कहा। कुछ प्रेरणा ,कुछ परिवर्तन को प्रोत्साहित किया । उसने मेरे मन में उत्प्रेरण करने में सहयोग किया।

देखा जाय तो वैशेषिक दर्शन के अनुसार जिन्हें हम निर्जीव समझ रहे है वह निर्जीव न होकर उसमें चेतना का स्तर कम है। विश्व जड़ और चेतन में विभाजित है । जो जड़ है वह चेतन होने की ओर अग्रसर है।

पहले की बरात VS अब की बारात…. गांगेय

बारात का अर्थ वर यात्रा! भारतीय समाज में बारात एक सुखद पल होता है जिसमें हम दूल्हे के खर्च पर जाकर छक खाते है और मौज करते है। जितनी उत्सुकता दूल्हे को दुल्हन की नहीं होती है उससे कही ज्यादा बाराती को बारात में जाने की होती है।

पहुँच कर पहला काम बारात में बंदोबस्त कैसा है खाने की व्यवस्था बढ़िया है कि नहीं है आदि-आदि । यदि भोजन में तरह-तरह के पकवान के साथ आइसक्रीम ,दो तीन प्रकार हलुवा ,काफी, कोल्डड्रिंक लिए हो तो लड़की के घर वाले सम्पन्न और दिलदार है । यदि ठीक-ठाक खिलाया तो चिरकुट। रास्ते भर गाली तथा नाहक बारात आये।

अच्छा खाना पा जाने पर बाराती बहुत खुश😄

पहले के बारात में व्यंजन के ज्यादा प्रकार न थे लोगों का ध्यान खाने की क्वालिटी पर रहता था। आज की तरह भौंडापन और छिछोरापन नहीं होता था। आज बारात में शराब का बढ़ता प्रचलन चिंता का शबब है कभी-कभी तो दूल्हा ही नशे में मस्त रहता है।

गहरा मेकअप लिए लड़की और महिलाएं ,कानफाड़ू संगीत । खड़े खड़े भोजन लेना उसपर जरा सी चूक की आपके सूट या लहंगे पर मटर पनीर,रसगुल्ला,चाट रंग बदल सकता है।

नकल के चक्कर में संस्कार (रस्म रिवाज ) खाना पूर्ति रह गया है सबसे ज्यादा भसड़ फोटो सेशन की है। कुछ बारात में दुल्हन नया करने के चक्कर में अब तो नाचते हुये स्टेज पर आ रही है। पहले खाना बनाने का कार्य घर के लोग पड़ोसी और गांव वाले मिलकर करते थे। हाँ नाचने के लिये नाचने वाली या लौंडा अलग से ले आते थे अब तो दूल्हा-दुल्हन से लेकर पूरा घर नाचने के लिये परेशान है। खाना बनाने वाले अब हलवाई है नचनिये जरूर घर के हो गये है।

फूहड़ता ज्यादा है परम्पराओं के निर्वहन में चूक हो रही है। विवाह के महत्व में, जिस प्रकार संस्कार और घर के लोगों की भागीदारी घटी है कही न कही पति-पत्नी के रिश्तों की मिठास में कमी आयी है। अहम का टकराव आम बात है उस पर नये लोग नये समझने वाले बन कर नये बने रिश्ते में कड़वाहट घोल रहे है।

विवाह 16 संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है जिसमें दो ईकाई एक हो जाते है सृष्टि के सृजन का यज्ञ प्रारम्भ होता है एक नये का जन्म होता है। बारात का कौतूहल तो हमें शिव-पार्वती के विवाह में रामचरित मानस में भी दिखता है। गोस्वामी बाबा ने क्या रोचक वर्णन किया है।

पहले भी बारातियों का ध्यान भी भोजन पर रहता था। लोग समय लेकर जाते थे कुछ दिन लड़की वाले के घर रुकते थे रामायण के अनुसार रामजी की बारात जनकपुरी में छ: मास रुकी थी। अब तो किसी के पास समय नहीं है खाना खाते ही बाराती गायब जिस तरह से मिडडेमील भोजन के बाद प्राइमरी से बच्चे गायब हो जाते है।

अब यदि देखा जाय तो बराती की आवश्कता नहीं है.. पहले के समय में जब कैमरा,फ़िल्म आदि नहीं थे आज की तरह द्रुत वाहन नहीं थे पैदल और बैलगाड़ी ही साधन थे रास्ते में चोर आदि का डर था तब बाराती सुरक्षा और गवाह के रूप में जाया करते थे जो आज परम्परा के रूप में दिखता है।

भारत की राजनीति में विवाह से जुड़ा एक रोचक तथ्य है कि मुम्बई गवर्नर जनरल की परिषद की बैठक 1897 में अंग्रेज हिन्दू शादी को फिजूल खर्ची बता कर प्रतिबंधित करने जा रहे थे ।

उस समय के बड़े कांग्रेसी नेता फिरोजशाह मेहता जिन्हें बॉम्बे का बेताज बादशाह कहा जाता था विरोध करते हुए कहा था भारतीय हिंदुओं के जीवन में कितने उत्सव ही है शादी तो एक उत्सव जैसा है जिसमें कुछ चटक- मटक के कपड़े ,रद्दी सुपारी,मिठाईया और टमटम। विवाह समारोह आप कैसे प्रतिबंध लगा सकते है। मेहता जी गोपालकृष्ण गोखले के साथ बहिर्गमन किया यह भारतीय संसदीय इतिहास की बहिर्गमन की पहली घटना भी बनी। जिसकी गूँज अंग्रेजों के बहरे कानों तक लन्दन तक पहुँची।

विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है उसकी गरिमा और महिमा बनाये रहे उसे कानफोड़ू संगीत और शराब के हवाले न करे बल्कि उसके महत्व को समझे।

इतिहास में नैरेटिव कारोबार●●

भारत में कई तरह के एजेंडे सेट किये गये। बौद्ध,यूनानी,चीनी,मुस्लिम फिर अंग्रेजों द्वारा। स्वतंत्रता पश्चात लोकतंत्र में सेकुलिरिज्म और जातिवाद की खेती काटी गयी। जिसे संस्कृति का भान नहीं वह सेकुलिरिज्म का प्रवक्ता बना बैठा है।

लोकतंत्र में सत्ता के एजेंडे को सेट करने में स्कूली पुस्तकों, अध्यापकों से लेकर सिनेमा,मीडिया ,
साहित्यकारों ने अपनी अपनी भूमिका को अंजाम दिया।

भारत के गद्दार राजे,राय की उपाधि विदेशियों से लेकर अपने अरमानों के लिए भारत की बलि चढ़ा दी। गद्दार सत्ता सुख पाने लगे उनके बच्चें विदेशों में पढ़कर
समाज सेवा वंशवाद का सहारा लेकर लोकतंत्र को वंशानुगत और जातिवादी बना दिया ।

कभी आप को इतिहास की पुस्तक में यह पढ़ने को नहीं मिलेगा कि भारत में असभ्य मुस्लिम का आक्रमण हिंदु संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके मंदिर का विध्वंश किया। इस्लाम के नाम कितने हिन्दूओं का कत्ल कर दिया जिहाद का नारा देकर। फिर भी इल्तुतमिश और अल्लाउद्दीन खिलजी भारत को मंगोलों से बचाया। मुहम्मद तुगलक हिंदु मुस्लिम एकता का पैरोकार था मुहम्मद तुगलक और फिरोज तुगलक अन्वेषक थे। मुगल ने भारत की लक्ष्मी का उद्धार किया।

बाबर भारत में आक्रमण नहीं करना चाहता था वह तो भारत के राजाओं के कहने पर आया था। हुमायूँ एक ईमानदार मुस्लिम था। अकबर गंगाजमुनी संस्कृति का बीज लगाया। जंहागीर कलाप्रेमी ,शाहजहां निर्माण कला का स्वर्णयुग लेकर आया। सबसे बढ़कर हास्यास्पद औरंगजेब भी सेकुलर था वह राज्य की कुछ मजबूरी में मंदिर तोड़े थे नहीं तो हिन्दू प्रजा के लिए मथुरा,काशी आदि में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।😂

मुस्लिम का सेकुलिरिज्म यही नहीं रुका वह बढ़ कर बंगाल पहुँच गया सिराजुदौला के रूप नया हिन्दू-मुस्लिम एकता वाला इंसान जन्म लिया। दक्षिण भारत में गंगा जमुनी संस्कृति की एक बड़ी पैदाईश मैसूर के हैदरअली के घर में टीपू सुल्तान के रूप में हुई। जो इस्लामिक देश बनाने के सपने की जगह भारत की उन्नति के स्वप्न देखा करता था । उसने भी मंदिर बहुत मजबूरी में तोड़े साथही कुछ हिंदुओं को मुस्लिम बनाया। नहीं तो वह हिन्दू और मुस्लिम को समान समझता था। यह स्कूली पुस्तक में आज भी जारी है।

जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट थी भारत के वास्तविक योद्धाओं वीरांगनाओ के इतिहास गायब है जिसने देश बर्बाद किया वह गंगा जमुनी संस्कृति का प्रणेता बन गया। जिन अंग्रेजों ने भारत को 200 साल लूटा वह भारत के उद्घारक बन गये, उन्होंने ने भारत को अंधकार युग से निकाल कर आधुनिक युग में लाया। भारत के लोगों को कुप्रथा से निकाल कर उन्हें आधुनिक शिक्षा से रूबरू करवाया।

यह सब हकीकत गद्दारों के पुत्र ब्रिटेन में पढ़कर खोज की । उन्होंने अंग्रेजों की नकल आदि करके भारतीयों को परतंत्रता की जगह उपनिवेशवाद से मुक्ति दिला कर आधुनिक भारत में प्रवेश दिया। जिन्होंने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर जातिवाद का जहर घोला वह अब बड़े नेता बन चुके थे अंग्रेजों ने सभी समझौते अपनी सुविधानुसार उन्ही से कर लिया। ये अंग्रेजों का नमक खाये थे उनके गुलाम आज भी बने है भले ही पीढ़ी बदल गयी है।

इतिहास में पन्ने दर पन्ने लीपापोती की गयी। भारत का औपनिवेशिक इतिहास अंग्रेजों द्वारा लिखा गया था उसे कमेटियां बना कर मुंहर लगाना था। जो सीधा स्कूल से बच्चों के दिमांग में बिठाना था। यह सिद्ध किया गया समस्या की जड़ सनातन व्यवस्था है। देश को सेकुलर रंग में रंगा जाय। इतिहास के माध्यम से डाला गया कि बर्बर,लुटेरे,आतंकी,गद्दार उतने ही समान है जिस तरह चप्पल चोरी में जेल गया व्यक्ति भी फ्रीडम फाइटर बन गया । जिसतरह स्वतंत्रता के समय और इमरजेंसी में जेल में बंद कैदी हो गये बस उन्हें जुगाड़… की जरूरत थी।

अब आप कहेंगे कि धनंजय आप सही नहीं कह रहे हो ?आपको सिंधिया परिवार ,जयपुर नरेश और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेंदर सिंह के वंशजों को देखना चाहिए। दो बड़े परिवार जो हाईब्रिड होकर एक हो गये वह सत्ता पर जोंक की तरह चिपक गये है। लोकतंत्र को परिवारिक राजतंत्र बना दिया है ।

हम अपने वीर,वीरांगनाओं को भूल गये जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए हँसते हुये रणभेरी में स्वाहा हो गये। ऐसे ही वीर असम के अहोम राजा लाचित बारपुखन जिन्होंने मुगलों को 17 बार हराया। राजा सुहलदेव बर्बर महमूद के भतीजे सैयद सालार गाजी की 20 हजार की सेना को बहराइच की भूमि पर काट डाला जो अयोध्या को निमित्त बना कर आया था।

दुर्गावती,कर्णावती,अहिल्याबाई,सोलंकी रानी नायका देवी, सिसोदिया रानी हांडी रानी,हरियाणा के राव तुलाराम,जाट राजा राजाराम,दुर्गादास राठौर,बन्दा बहादुर,महाराष्ट्र के पेशवा इन्होंने देश को सबसे ऊपर रख कर मर-कट गये। ये हमें स्मरण नहीं है?

आज क्या हो रहा है… जिसने अंग्रेजों की वकालत की वह देश में पूजे जा रहे है जिसने देश,धर्म को गाली दी उनके स्टैच्यू बन रहे है ! क्योंकि इससे वोट बैंक बढ़ता है। जबतक देश अपने नायकों और गद्दारों की पहचान नहीं कर लेता तब तक उसे कोई मुगल गंगा जमुनी कोई अंग्रेज आधुनिक बनाता रहेगा।

इतिहास का आलम यह है कि देसी विदेशी हो गया विदेशियों की सेवा करने वाले अपने को मूलनिवासी कहता है। मुस्लिम और गद्दार के बोल है यह किसी के बाप का देश नहीं है। मैकाले से लेकर के स्टुवर्ट मिल , विसेंट स्मिथ और मैक्समूलर का नैरेटिव भारत में वृक्ष का आकार ले लिया। अंग्रेजों को अपने शासन के स्थायित्व के लिए सिकन्दर महान ,अकबर महान की जरूरत थी उसी तरह भारत के नेताओं को औरंजेब और टीपू सेकुलर नजर आये।

कृषि शास्त्र और किसान पुराण••

भारत प्राचीन काल से लेकर अब तक कृषि प्रधान देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था का परचम विश्व में कृषि के कारण ही हुआ था। भारत के किसान के घर “कुटीर एवं लघु” उद्योग के केंद्र रहे है। किंतु अंग्रेजी व्यवस्था के षड्यंत्र ने किसान को मजदूर और मजदूर बना दिया । भारतीय राजनीति ने उन्हें जातियों में बाँटकर उनकी मांग को कुचल दिया।
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कृषि का भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 14% योगदान है लेकिन कृषि भारत के 60% लोगों के निर्वाह का आधार है। कृषि का योगदान 1960 के दशक में जीडीपी में 53 % रहा है। कृषि अपने साथ उद्योगों को बढ़ावा देती है। कपास, गन्ना,मसाले कितने उद्योग को गति देता है।
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भारतीय कृषि उद्योग बन सकती है किंतु इसमें सरकारों की इच्छाशक्ति में बहुत कमी दिखाई देती है। आज भी कृषि का बेहतर प्रबंधन करके ,उसमें तकनीकी निवेश के साथ उन्नत बीजों का प्रयोग करके किसान की आय में वृद्धि करके सामाजिक खुशहाली में वृद्धि की जा सकती है। ◆◆◆◆◆◆◆◆◆

1991 के उदारीकरण और 1996 में WTO में हस्ताक्षर के साथ सरकारों ने निर्णय कर लिया है कि कृषि क्षेत्र को हतोत्साहित किया जायेगा। “अन्न दाता सुखी भव” की कामना अब दुःखी और हताश स्थिति में छोड़ दिया जा रहा है।

“उत्तम खेती मध्यम बान अधम चाकरी भीख निदान।”

आज उल्टा चल रहा है नौकरी उत्तम बन धन दे रही है
किसान घटिया जीवन जीने पर विवश है। विडम्बना देखिये व्यापारी अपने उत्त्पाद की कीमत कार्टेल बना कर या स्वयं तक करते है । वही किसान के उत्पाद की कीमत दलाल और सरकार द्वारा तय करती है। समस्या यह है कि इनके द्वारा तय कीमत भी किसानों को नहीं मिल पाती है। किसान औने-पौने अपना उत्पाद बेचने को विवश है।
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सरकारें नई घोषणा करती है जो कि ‘तृणमूल स्तर शून्य हो जाती है।’ व्यापारी आसानी से कम दर पर बैंक से कर्ज लेता है वही किसान बैंक की परिक्रमा में समय नष्ट करता है और सूदखोर से ऋण लेने के लिए मजबूर हो जाता है।

दूध एक कृषि उत्पाद है जिसकी किस्मत भारत में अमूल्य ने बदल दी। वही कृषि के अन्य उत्पाद बदहाल है उनका कोई अमूल्य जैसा संगठन नहीं है। किसान के संगठन सभी राजनैतिक दल के अनुषंगी संगठन है जिसका निर्णय किसान न करके नेता राजधानी से करता है।
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सरकार द्वारा जिसप्रकार की सहूलियत उद्योग को दी जाती है उस तरह किसान को नहीं मिलती है। सरकार एक ओर अपने को किसान हितैषी बताती है दूसरी ओर उर्वरक की कीमतों में निरंतर वृद्धि कर रही है।
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खाद्यान्न सुरक्षा का आधार किसान है मुफ्त आनाज वितरण किसान के आधार पर किया जा रहा है जिसकी मार भी किसानों पर पड़ रही है। धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 घोषित है फिर भी किसान 1100 रुपये में धान बेचने पर क्यों विवश है ? कारण सरकार जानने का प्रयास नहीं करती है।

किसान की खुशहाली के बिना उद्योगों को उन्नत स्तर की ओर नहीं ले जाया जा सकता है। किसान आत्मनिर्भर बने, आत्महत्या न करें । सरकारें उसे भीख न दे बल्कि तकनीकी निवेश को बढ़ावा दे। साथ ही कृषि ऋण, बीज और उर्वरक सस्ते और आसानी से मिल सके। ●●

कृषि को हतोत्साहित करके उद्योग और सेवा क्षेत्र को कैसे विकसित कर सकते है? जबकि 60% उपभोक्ता पूंजी विहीन है। भारत के अर्थशास्त्री न जाने कैसे इस पर ध्यान नहीं देते है। जब किसान के पास पूँजी होगी तब मार्केट की तरलता में वृद्धि होगी।****

किसान पर राजनीति स्वाभाविक है लेकिन उनकी समस्या पर ध्यान क्या आंदोलन होने पर ही किया जायेगा। किसान के विषय को कैसे भूल जाते है यही कृषि क्षेत्र है जब 2008 कि आर्थिक मंदी विश्व पर छायी तब यह रीढ़ बन कर भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करके विश्व का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया था।