पुलिस इनकाउंटर पर कुछ न कहना🌻

न्याय का समाज में महत्वपूर्ण स्थान है किंतु भारत में न्याय बहुत घिसड़-पिसड़ के मिलता है सामान्य व्यक्ति के लिए वह भी दुरूह है। न्यायपालिका में केश इतने ज्यादा है कि न्याय मिलते-मिलते इतनी देर हो जाती है कि कितने अपराधी पहले ही सामान्य मौत मर चुके होते है।
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पुलिस के खिलाफ न्याय पाना टेढ़ी खीर है क्योंकि पुलिस की गलती पर पर्दा डालना तत्कालीन सरकार सबसे महत्वपूर्ण मानती है जिससें स्वयं की किरकिरी से बचा जा सके।
दो मामले एक IAS अधिकारी किंजल सिंह और प्रिंजल के पिता DSP KP सिंह को 1982 बलिया के मुठभेड़ में अपराधियों से मिलकर उनके पुलिस वाले ने मार दिया।

तत्कालीन सरकार इसे अपराधियों द्वारा अंजाम दी गयी हत्या बताया था। किंजल अपने पिता को न्याय इस लिए दिला पायी क्योंकि वह स्वयं जिलाधिकारी पद पर थी। सामान्यजन का सोचिये जो कंट्रोल के राशन के लिए कई दिन लाइन में लगता है और पूरा भी नहीं पाता।
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दूसरा मामला भरतपुर के राजा मानसिंह जो जाटों के नेता थे 1985 में सरकार और पुलिस की मिलीभगत से इनकाउंटर कर दिया था। जिन्हें आज न्याय मिला है, सामान्य मौत से बचे 11 पुलिस वाले को सजा दी गयी।

तत्कालीन घटना कानपुर के बिकरु गांव की है जिसमें DSP मिश्रा और उनके टीम के अन्य 9 लोगों की हत्या कर दी गयी मीडिया और पुलिस वाले ने अपराधी विकास दुबे को दोषी ठहराते हुये इनकाउंटर में मार गिराया। इन सबके बाबजूद वहाँ के पुलिस वालों की भूमिका संदिग्ध है वास्तव में वारदात के वक्त क्या हुआ था।


विकास दुबे को जिंदा न्यायपालिका के समक्ष क्यों पेश नहीं किया गया? पुलिस की कहानी पूर्व में DSP KP सिंह ,राजा मानसिंह और DSP जियाउल हक वाली ही है। 2014 में कुंडा में हुये जियाउल हक की हत्या में अपराधी कौन था पुलिस गुत्थी सुलझा नहीं पायी,फिर CBI भी नाकाम रही।

पुलिस का व्यवहार और प्रणाली शायद किसी से छुपी हो,किन्तु पुलिस रिफॉर्म पर सरकारें मौन है, क्योंकि गलत-सही काम को अंजाम देने में पुलिस सबसे अहम भूमिका में नेताओं के लिए काम करती है। SP ऑफिस से लेकर थाने-पुलिस चौकी तक घूस का जो “खुला खेल फरुखाबादी चलता है” इसमें आखिर सहमति किसकी है? सब मौन है।
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एक जिले से करोड़ो रूपये वसूल के महीने के महीने जाता है फला थानाध्यक्ष बनने के लिए इतने रुपये का चढ़ावा ऊपर के अधिकारियों को चढ़ाया जाता है जिस पर सरकारें गाँधीजी के बंदर का व्यवहार करती है।

गुंडा,पुलिस,नेता के गठजोड़ से आमजन ठगा सा रहता है उसकी आवाज ज्यादा दूर तलक नहीं जाती सिर्फ हथमल के रह जाता है। आज के UP के मुख्यमंत्री 2007 में संसद में रोते हुये लोकसभा अध्यक्ष से कहा था कि पुलिस उनका इनकाउंटर कर देगी। लेकिन आज वही पुलिस पूरी तरह सही है … क्योंकि सत्ता में वह बैठे है। गलत तो विपक्ष में नजर आता है?
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पुलिस का आलम यह है कि हर थानाध्यक्ष के पास करोड़ो की संपत्ति बन जाती है लेकिन वह टैक्स अधिकारियों की पहुँच में कभी नहीं आता। घूस का एक नियम है “लेके के घूस फंस जा देके घूस छूट जा”।

न्यायपालिका बार-बार इनकाउंटर को गलत कहती है फिर भी अंजाम दिया जाता है। अपराधी के पहले वारदात पर पुलिस उसे पैसा लेकर नहीं छोड़ती तो वह अपराधी आज बन नहीं पाता । विधायक,सांसद,नेता आदि बनना दूर की बात है। देखेगे तो पता चलेगा जहाँ सफल गुंडा नेता है वही असफल नेता गुंडा है।

समय रहते सुधार करिये क्योंकि आज लोकतंत्र,नेता,पुलिस और व्यवस्था सभी लोकतंत्र के आधार जनता को चिढ़ा रहे है।
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