मंदिर और मनुष्य •••∆∆∆∆

सनातन हिन्दू धर्म में मंदिर को देवालय,
देवतयन,देवगृह,प्रासाद आदि कहा जाता है। मन्दिर वास्तुकला की दृष्टि से मनुष्य के आकार को आधार मान कर निर्मित किया जाता है।

मंदिर के कई अंग होते है विमान ,शिखर,कलश मंडप,अर्द्धमंडप,प्रदक्षिणापथ,गोपुरम,नृत्यमण्डल और मंदिर की आत्मा गर्भगृह, जहाँ भगवान विग्रह के रूप स्थापित रहते है।

देव पूजन का विधान वैदिककाल,रामायण युग और महाभारत युग में भी हमें रामायण
,महाभारत,वेद आदि से मिलती है। राम-सीता द्वारा पूजन हो पांडवों का अपने कुल देवता का पूजन हो या भगवान कृष्ण द्वारा अपने कुलदेव की पूजा रही हो।

मंदिर ध्यान,उपासना,पूजा,अर्चना के स्थल के रूप में है। मंदिर का जीवंत सम्बन्ध भारतीय संस्कृति से है। हिन्दू धर्म के अलावा उसके पंथ बौद्ध,जैन और सिख में इसका प्रचलन है।

मुख्यतया मन्दिर की तीन शैली प्रसिद्ध है उत्तर भारत में नागर शैली,दक्षिण में द्रविण शैली और विध्य से लेकर उड़ीसा तक वेसर शैली का प्रचलन रहा है।

प्रचलित इतिहास में मूर्तिपूजा मथुरा से मानी जाती है। मंदिर का स्वर्णिम युग गुप्त काल को माना जाता है जिसमें झांसी का ईटो का दशावतार मंदिर,गाजीपुर के भीतरीगांव का मंदिर आदि-आदि।

भारत में मंदिर बहुत भव्यता के साथ बनाये जाते रहे है जिसमें लगता है पत्थर की मूर्तियां स्वयं ही बोल पड़ेंगी । मूर्ख मूर्तिपूजा का आरोप सनातनियों पर लगाते है, बिना संस्कार और विज्ञान को समझे।

हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां दक्षिण अफ्रीका से लेकर मैक्सिको,तुर्की,कंबोडिया,जापान,
कोरिया,होंडुरास,यूरोप,कंबोडिया,थाईलैंड,मलेशिया,ईरान,इराक,वियतनाम,चीन और इंडोनेशिया आदि देशों से शिव,गणेश,हनुमान,राम आदि की प्राप्त हुई है।

गुहा मंदिर अजंता,एलोरा,एलिफैंट,बाघ,उदयगिरि और अफ्रीका से लेकर होंडुरास में जो मूर्तिया मिली है,वह पुरातत्ववेत्ता के लिए आश्चर्य का विषय है।

भारत के लोगों को तोड़ने के लिए बाहर से आये बर्बर मुस्लिमों ने मंदिर पर आक्रमण करके उसे नष्ट भ्रष्ट किया। इसी तथ्य को भारत के इतिहास में इतना तोड़ा मरोड़ा गया कि हिन्दू को हो दोषी ठहरा दिया गया।

अयोध्या,काशी,मथुरा,कोणार्क,सोमनाथ,अटालामोढ़ेरा,कश्मीर,पाकिस्तान ,धार आदि के मंदिर को बार-बार तोड़ा गया। कई जगह मुस्लिम सुल्तान बार-बार कई वर्ष तक नष्ट करते रहे फिरभी नष्ट नहीं कर पाये। मुस्लिम एक बर्बर समुदाय है। वही बात ईसाई की जाय तो वह भारत भर में धर्मांतरण के साथ गिरजाघर का निर्माण करता चला आया है।

विचार करिये जिस देश की धर्म पताका पूरे विश्व में फहराई है वह आज अपने ही घर में सिकुड़ती जा रही है उसकी नई पीढ़ी अपना इतिहास नहीं जानती तो कैसे मंदिर पर कुछ कह पायेगी? वह मूर्ति पूजा के पक्ष में तर्क देगी?

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