भारत का इतिहास @INDIAN HITORY

भारत का सम्बंध अपने पड़ोसी और अन्य विदेशी शासकों से रहा है इसका प्रमाण हमें मिलता रहा है। पश्चात में कोई बौद्ध,ईसाई और मुस्लिम बन गये। आज भी विश्व में पुरात्विक साक्ष्य मिलते है जिनमें भारतीय सम्बन्धों की पुष्टि होती है। सबसे महत्वपूर्ण है कि उन मिले प्रमाणों के विवेचन हमने कैसे किया है।

रोमन बस्ती का अरिकामेडु से मिलना ,शैलेन्द्र वंशी राजाओं की समुद्र गुप्त से अपील बोधिगया में बौद्ध मंदिर बनवाने को लेकर रही हो। दिलमुन,माकन, मेलुहा ,फारस के विषय मे वर्णन मिलता है।

एशिया माइनर (तुर्की) बोगजकोई अभिलेख से संस्कृत में इंद्र,मित्र,वरुण,नासात्स के विवरण को गलत तरीके से अंग्रेजी इतिहासकारों ने व्यख्यायित किया।

बोगजकोई का अभिलेख बताता है कि भारतीय संस्कृति का विस्तार सीरिया और तुर्की तक प्रत्यक्ष रूप से था। आज भी तुर्की में यत्र तत्र शिवलिंग प्रतिकृति दिखाई पड़ जाती है। चीन का शिजियांग प्रान्त कभी खोतान देश हुआ करता था जिस पर भारतीय वंशज कुमारजीव ने शासन किया था।

इसी प्रकार थाईलैंड,कम्बोडिया,लाओस,वियतनाम,
मलेशिया,इंडोनेशिया ,मैक्सिको,होंडुरास ,जापान और कोरिया तक में भारतीय संस्कृति और भारतीय शासन का विस्तार हुआ ।

यूरोप के रोमा समुदाय जिनका निकट का सम्बंध भारत से है। यह बताता है कि एक समय यूरोप के बड़े भू भाग पर भारत का शासन था। भारत के महान सम्राट विक्रमादित्य अपने शासनकाल 57 ईसा पूर्व में रोमन शासक जूलियस सीजर को रोम से गिरफ्तार करके दंडित किया था।

भारत का वर्णन मेगस्थनीज की इंडिका,टॉलमी की ज्योग्राफी, प्लिनी के नेचुरल हिस्टीरिका और पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रियन सी में भी मिलता है। भारत इतना कौतूहल का विषय विश्व समुदाय के लिए क्यों रहा है?
निश्चित रूप से इसका कारण भारत का व्यापार,शिक्षा प्रणाली,सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था थी।

ग्रीक,रोमन,मिश्र से हमारे सम्बन्ध प्राचीन समय में सुदृढ़ रहे है। जो भारत की विज्ञान तकनीकी को भी परिलक्षित करता है। भारत में प्राचीन काल में समुद्री जहाज और समुद्री यात्रा यंत्र विकसित किये थे। किंतु अंग्रेज इतिहासकारों ने जो भी भारत के लिए कहा उसे हमने आंख बंद कर मान लिया। बिना समुद्री जहाज के भारत का इतने दूर देशों में पहुँचना आसान कैसे होता।

अंग्रेजों के साथ एक दिक्कत थी उनका पूरा विकास ईसा के बाद संभव हुआ है और इसी चश्मे से वह विश्व को उलट-पलट के देखता है और वर्णित करता है ईसा के पूर्व धरती पर कोई विकसित सभ्यता नहीं रही है। भारत के वामपंथी इतिहासकार अंग्रेजी इतिहासकारों को चुनौती देने की जगह उनके ही कथनों की पुष्टि कर दी।

भारत की संभावनाओं को अंग्रेजी संदूक में भरकर उसे यूरोप से आयातित कह दिया गया। “आर्यन थियरी” के माध्यम से भारतीय मूल आर्य को ही विदेशी ठहराया गया बोगजकोई अभिलेख के आधार पर। स्मिथ आदि अपने इतिहास लेखन में माना कि भारत सदा से विदेशियों द्वारा शासित होते रहे है।

बागपत के सिनौली की खोज, जो इतिहासकारों और तकनीकी के माध्यम से हमें 4000 साल पूर्व ले जाती है अभी और खोजें होनी बाकी है। यहाँ से रथ, मूठ लगी तलवार,स्त्री योद्धा का प्रमाण मिला है। रथ जो घोड़े से खींचे जाने वाले है। भारत में हड़प्पा की खोज में अंग्रेजों ने घोड़े के प्रमाण को नहीं माना था जबकि सिनौली भारत में घोड़े नहीं होने के मिथकीय प्रमाण पर विराम लगाता है। यह भारत की प्राचीन सभ्यता में शुमार की जा सकती है।

एकबात जो गौरतलब है कि बागपत जिला पांडवों द्वारा दुर्योधन से मांगे गये पांच गांवों में से एक था। आगे की खोजें भारत के औपनिवेशिक इतिहास के स्वरूप को बदल देगी। क्योंकि भारत के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का कारण एक राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति कराना रहा है । योद्धाओं और वीरांगनाओं की भूमि को सत्ता की पिपासा ने नपुंसक के रूप में पेश किया।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s