दो ध्रूवों को प्रयोगशाला🏹 To Pole Laboratory

अफ्रीका, एक ऐसा खूबसूरत महादीप जिसे प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है लेकिन यह यूरोप,एशिया और अमेरिका की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं पाया।

अफ्रीका एक सनातन परंपरा वाला महाद्वीप है जो अपनी मान्यताओं के साथ प्रकृति पर विश्वास करता था।

समय के साथ रोमन साम्राज्य का विस्तार अफीका तक पहुँचा। चौथी सदी में एक्शन साम्राज्य के समय यहाँ ईसाई धर्म और सातवीं सदी में मुस्लिम धर्म लाया गया। आज के अफ्रीकी डेमोग्राफ में 45 फीसदी मुस्लिम, 40 फीसदी ईसाई और 15 फीसदी में हिंदु सहित अन्य धर्म हैं।

लिखित इतिहास में मनुष्य की उत्पत्ति होमो सीपियंस और होमो इरेक्ट्स यही से माने जाते हैं जो बाद में विकसित हो कर मानव बन गये।

यह विकास अंग्रेजों का दिया है। वास्तविकता के धरातल पर बन्दर से मनुष्य का विकास संभव नहीं है। यही विकास क्रम रहता तो आज भी संभव होता, जैसा कि नहीं है।

अफ्रीका महाद्वीप बताने का तात्पर्य यह है कि किस प्रकार से यह ध्रुवों की प्रयोगशाला के रूप इस्तेमाल होता रहा है। वह कैसे अंधकार महादीप बन गया। उसकी मौलिकता को अपहृत किया गया।

प्राकृतिक रूप से जीने वालों को लूटने के लिये ईसाइयों और मुस्लिमों ने यहाँ अपने-अपने टेंट गाड़े और फिर यह खेमा बंदी में बदल गया। इस्लाम के पूर्व अफ्रीका की व्यापारिक चौकी यमन था किंतु इस्लाम के साथ ही अफ्रीका की सीमा सीमित कर दी गयी।

दूसरी तरफ से ईसाई पहले ही वह प्रयास शुरू कर चुके थे।विदेशी पंथ अफ्रीका की धरती पर उगाये गये। अफ्रीका को निचोड़ने का काम विदेशी सत्तायें करती रहीं।

मध्यकाल में मोरक्को का यात्री इब्नबतूता मुहम्मद बिन तुगलक के समय 14 वीं सदी में भारत आया । उसने भारत के समाज, मौसम और फलों विशेषकर आम का विशद वर्णन अपनी पुस्तक “रेहला” में किया है।

समय के साथ पुर्तगाली और डचों ने अपनी कालोनियां बना ली। फिर आया ब्रिटिश और फ्रांसीसी दौर। कार्य वही था गुलाम बनाना, प्राकृतिक संसाधनों की चोरी।

आज अफ्रीका में यूरोपीय शासन का अंत हो चुका है और सभी 53 देश स्वतंत्र है । गरीबी जारी है। दो धुवों की जगह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और रूस ने संभाल ली।

शीत युद्ध के खत्म होने के साथ सोवियत यूनियन का पराभव हो गया। अमेरिका का एक छत्र राज हो गया। वही ब्रिटिश और फ्रांसीसी प्रभाव कायम रहा। यह पूरा क्ष्रेत्र मिशनरियों के लिए सैरगाह की तरह रहा।

नयी सदी एक नये खिलाड़ी चीन को लेकर आया। चीन ने अपने आर्थिक मुनाफे को अफ्रीका में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम से प्रचारित कर प्राकृतिक संसाधनों की चोरी शुरू की। गरीब देश विरोध नहीं कर पा रहे हैं।

अफ्रीका यूरोप, अमेरिका, चीन का प्रैक्टिकल फील्ड है दवा, नशा या नया प्रयोग जैसी मर्जी हो करिये। मनुष्य जीवन की कीमत एक बकरी और दो जून की रोटी से अधिक नहीं है।

अफ्रीका में खुशहाली की कुछ गिनी-चुनी जगहें हैं जिनमें दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और अल्जीरिया को शामिल किया जा सकता है। बाकी देश में मिलीशिया, आतंकवादी,समुद्री लुटेरे, मानव तस्कर, छोटी लड़कियों के व्यापारी सक्रिय है। बाकी जो पाप बचता है उसे सैनिक तानाशाह पूरा कर देता है। आये दिन छोटे-छोटे देश के अंदर से लेकर सीमा तक हिंसात्मक टकराव होते रहते है।

अफ्रीका महादीप को लूटने की जद्दोजहद में शक्तिशाली देश रहे है। और इतना सब अफ्रीका के नाम पर करने.के बाद भी धरातल पर उनके जीवन के बेहतरी का कोई प्रयास नहीं है।

पेट की भूख के लिए अफ्रीकन हाथ बांधे खड़े है। उनकी कोई आवाज विश्व में नहीं है। उसके हिस्सें में दूसरे की सेवा लिखी है क्योंकि काले लोग है। उनका दोष अफ्रीका का मूल निवासी होना।

विश्व में एक देश भारत ही ऐसा है जो शोषण की जगह पोषण , मानवीय मूल्यों का तरज़ीह देता है। भारत विश्व की महाशक्ति और नेता बनता है। उससे सबसे बड़ा लग बेजुबान देशों को आवाज मिलेगी। उनकी बेहतरी लिए काम होगा। अफ्रीकी देशों को भारत पर पूरा भरोसा है।

मौर्य सम्राट विन्दुसार के समय अफ्रीका से ईसा से 300 वर्ष पूर्व सम्बन्ध स्थापित किये थे। मिस्र के नरेश टॉलमी फिलाडेल्फस ने डायनोसिस को दूत बना कर भेजा।

सीरिया के शासक एण्टियोकस ने डायमेकस नामक राजदूत बिंदुसार के दरबार में भेजा। बिंदुसार ने सीरिया से मीठी मदिरा, सूखी अंजीर के बदले भारत से वहाँ दार्शनिक भेजने के लिये पत्र लिखा था।

प्राचीन अफ्रीकी लोगों ने खनन कर प्रसंस्कृत धातुओं का निर्माण किया। सोना चांदी,तांबा, कांस्य, लोहा,मिट्टी के बने सुंदर पात्र निर्मित किये।

रोमन,भारत और अरब देशों के जहाज यहाँ से गुलामों, हाथीदांत,सोने,पन्ना,जानवरों की खाल,दरियाई घोड़े और विभिन्न जानवरों का आयात करते थे।

अक्सुमाइट साम्राज्य अफ्रीका में दसरी शताब्दी में स्थापित हुआ। जिसमें अरब देशों के हिस्से भी शामिल था। एक्सुमाइट राजदूत मिश्र,अरब और भारत गये।

12 वीं सदी में माली जो पूर्व में घाना का सामन्त राज्य था, में एक बड़े साम्राज्य की स्थापना हुई जिसकी राजधानी टिम्बकटू थी। इसके सुल्तान विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति शासक मनसा मूसा थे जिनकी कुल सम्पत्ति 4 लाख मिलियन अमेरिकी डॉलर थी। भारत के संदर्भ में 40 लाख डॉलर मुकेश अम्बानी से लगभग 300 गुना ज्यादा।

अरियो और हाइलैंड्स का साम्राज्य इथियोपिया में सोंगई पूर्वी अफ्रीका में। मेडागास्कर में इमेरिन। स्वाहिली साम्राज्य युगांडा क्षेत्र में । नूबिया और कार्थेज राज्य। एक्सम शासन में 330 ईसवी में ईसाई धर्म का प्रवेश हुआ था।

पशुपालन में गाय, बकरी,भेड़ आदि का किया जाता था कृषि में बाजरा,गेंहू,कपास आदि होती थी। फल में अंजीर,जामुन,नींबू,आबनूस होते थे।

अफ्रीकी लोग प्राकृति प्रेमी और मस्त थे किंतु ईसाई और मुस्लिम की ललचाई शातिर व्यवस्था ने अंधकार दीप और कालों का देश बना दिया। नील नदी

अफ्रीका में धर्म देखें तो 85 फीसदी लोग मुस्लिम या ईसाई है फिर भी अशांति का कारण है। ये दोनों धर्म के स्तर पर असफल विचार धाराएँ हैं। इन दोनों के लिए खुशहाली का मतलब यूरोप के चंद देश और अरब है।

मध्यकाल में मुस्लिमों की लूट से ये उबर न पाये। आधुनिक काल में यूरोपीय ईसाइयों की लूट से इच्छापूर्ति नहीं हुई। ये चालाक थे और उपनिवेश के साथ वहाँ व्यापार विकसित कर दिए जिससे शोषण आज भी बना हुआ है।

धर्म का सहारा लेकर अफ्रीकी सम्पदा की लगातार चोरी होती रही और मूलवासियों को यातनाएँ मिलती रही है । भारत के देर से पहुँचने से ये लूट,बर्बरता अभी तक चालू है। भारत पूरे अफ्रीका को सनातन संस्कृति से रोशन करे। इन प्राकृतिक लोगों को खुशहाल जीवन जीने की ओर ले चले।

अफ्रीका शब्द बर्बर भाषा के इफ्री से हुआ है जिसका अर्थ है गुफा । इसीलिए इसे गुफा में रहने वालों का देश कहा गया।
डेंसमण्ड टूटू ने अंग्रेजों के लिए कहा था- उनके पास बाइबिल थी हमारे पास जमीन। जब उन्होंने बाइबिल की कहानी सुनाई तो आंख बंद हो गई। आंख खुली तो बबइबिल हाथ में थी जमीन उनके पास।

अलबरूनी गजनवी के लिए कहता है कि अल्लाह रहमत बक्से गजनवी को जिसने भारत की हँसती- खेलती संस्कृति को उजाड़ दिया।

अफ्रीका की प्राकृतिक सुंदरता मनोहर है।नदियों में नील जिसे अफ्रीका की जीवन रेखा कहा जाता है, बहुत सुंदर है। और कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ हैं– जैम्बेजी,जूना,रुबका, लिंपोपो तथा शिबेली। कुछ प्यारी बड़ी झीलें हैं- चाड,विक्टोरिया,वोल्टा आदि। पर्वतों में एटलस,किलमिंजारो, ड्रैकेन्सवर्ग,कैमरून और काला हारी महत्वपूर्ण हैं। कालाहारी,सहारा जैसे रेगिस्तान तो वहीं सवाना जैसे वन। और उष्णकटिबंधीय सदाबहार जलवायु जैसे भारत ही लगता है। कर्क, विषुवत तथा मकर तीनों रेखा यहाँ से गुजरती है।

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