मृत्यु से 🕷️मुलाकात…♨️


जीवन के महत्व को मृत्यु रेखांकित करती है एक चीज जो सोचने पर विवश किया है कि जिस प्रकृति का शोषण करके हम विकास का दावा कर रहे है वास्तव में वह विनाश है जिसमें भौतिक विकास का ढांचा खड़ा दिखता है सिवाय उस मनुष्य के जिसकी साँसे धीरे धीरे थम रही है।

हमें अपनी प्राथमिकता बदलनी पड़ेगी ,विकास प्रकृति में निहित है जिसे हमें संवहनीय तरीके से अर्जित करना है। जितनी भूमि,वायु,जल है यह सब की है। प्रकृति के साथ संतुलन बैठाने में ही मानव की भलाई है , नहीं तो ग्लेशियर,पहाड़,समुद्र की गहराई में तरह तरह के वैक्टीरिया और वायरस दफन है जो तुम्हारें कार्यो से बाहर आ रहे है ।

प्रकृति की विविधताओं को रौंदते हुए विकास की भूलभुलैया बना रहे है तरह तरह के जीव जंतु जो कि प्राकृतिक संतुलन के वाहन है,जिन्हें तुम भोजन मान है खा ले रहे है ,काश तुमने ऐसा नहीं किया होता है ये हैजा,चिकेन- स्माल पॉक्स ,फ्लू,इन्फ्लूएंजा, इबोला और कोरोना जैसे रोगाणु और विषाणु आज मानवता पर कहर बन कर न टूटते।

बुखार में मुझे कई दिन ऐसा लगा कि आज ये दवा लेकर लेट रहे है अब दुबारा नहीं उठेंगे। लेकिन जीवन में कुछ प्रियजन के प्रेम और हमारे कुछ पुण्य शेष थे जिससें यह पुर्नजन्म रूपी जीवन मिला है ईश्वर के आदेश से कि कुछ कार्य तुम्हारें शेष है पूरा करो। मेरी प्राथमिकताएं बदल गयी है । हाँ एक चीज और मेरी देवी जी का विश्वास बहुत मजबूत रहा है कि मैं अभी नहीं मर सकता हूँ।

नये जीवन का इस्तकबाल करना ही होगा ,कुछ तो करना होगा ,आगे की डगर का मांझी देखिये पतवार किधर ले जाता है।

जिंदगी की अबूझ पहेली..

जीवन और मौत के बीच बहुत महीन डोर का अंतर है अब देखना है मर कर मीले जीवन रूपी नैया को कहाँ तक ले जा पाते है।करती है वही सांसों की कीमत का एहसास कराती है। जिस सहजता से यह जीवन और प्रकृति प्राप्त हुई है उसी पर जब कोई संकट आता है हम बहुत जल्द जीवन जीना हराने लगते है सारे बने बनाये सिद्धांत रेत की ढेर की तरह दरकने लगते है। उस देव का स्मरण करते है कि मुझे इस भयंकर पीड़ा से उबारिये।

जब हमारे सारे करतब खत्म हो जाते है मुँह से बरबस निकलता है हारिये न हिम्मत विसारिये न राम।।

मैं नवरात्रि में व्रत पूरा करके कोविड के भय से दूर अपने काम पर लगा था प्रयाग से दूर दिल्ली के एक फ्लैट जिसे मैं कबूतर खाना कहता हूं। थोड़ा भी शंका न थी कि कोरोना अपनी जाल में हमें फंसा लेगा। बुखार आना शुरू हुआ।

कोविड के तहत ली जाने वाली दवा ,प्रयाग में भैया जो कोविड टीम में है हमें बता रहे थे हम एजथ्रोमाईसीन, आइवरमैक्टीन, डॉक्सी,जिंक,विटामिन सी,बी कॉम्प्लेक्स का पूरा 10 दिन का कोर्स किया। काढ़ा, भाँप, गुनगुना पानी फल,पौष्टिक भोजन और पॉजिटिव थिंकिंग के साथ ईश्वर में असीम आस्था रखा। लेकिन यह बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था। नींद आना बन्द हो गयी । घर से मैं बहुत दूर था कोई पास से मन की चिकित्सा करने वाला नहीं था। मैं घर में अपनी बीमारी भाई के अलावा किसी को नहीं बताया। घर में सभी लोग पहले से ही बुखार के चपेट में थे।

एक रात लगा कि यदि मैं पांचवी मंजिल के फ्लैट में मर गया तो मेरी लाश यही सड़ जायेगी।
मरना भला विदेश में जहाँ न अपना कोय। माटी खाय न कौवा अग्नि देय न कोय।।

रोज घर से सूचना फला रिश्तेदार पत्नी सहित आज मर गये, आज के दिन में रिश्तेदारी से चार लोग कम हुये है। न्यूज चैनल के खैर क्या कहने ,वह तो श्मशान की रूहानी कहानी बता-बता के कार्यक्रम जारी रखे है ,कोई मरे गिद्ध को लाश से मतलब है

दिल्ली में मौत का भयानक मंजर चल रहा था। ऑक्सीजन और इंजेक्शन का ऐसा खुला खेल फरुखाबादी जारी रहा है कि दलाल आपदा को अवसर में बदल कर मौत में मुनाफा निकाल रहे थे घिन आ रही थी कि इन्ही मनुष्यता के जमात के हम भी है जिसके लिए धन ही सब कुछ है तुम मरते हो , मर जाओं।

जीवन की आशा धूमिल होती जा रही थी मौत मेरे आस पास आशियाना बना चुकी थी,बार-बार कहती थी चलो तुम्हारा कार्य पूरा हुआ, मुझे भी लगने लगा था कि यह मौत सही कह रही थी।

मुझे माता-पिता और मेरी देवी का ख्याल बार-बार आता कि मेरे मरने पर यह कैसे जियेगें। परन्तु यह मौत है किसी के होने से इसके व्यवसाय पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

कोविड कैसे भी हो ,उसके विस्तार के कारण के पीछे चीन आदि कुछ भी हो सकता है फिर इसने विश्व भर की व्यवस्था की नकेल खोल दी। मानव को एकबार पुनः सोचने पर विवश किया है जिस प्रकृति का शोषण करके हम विकास का दावा कर रहे है वास्तव में वह विनाश है।

यह स्नायुतंत्र जो भौतिक विकास का ढांचा खड़ा दिखता है सिवाय उस मनुष्य के जिसकी साँसे धीरे धीरे थम रही है। हमें अपनी प्राथमिकता बदलनी पड़ेगी ,विकास प्रकृति में निहित है जिसे हमें संवहनीय तरीके से अर्जित करना है। जितनी भूमि,वायु,जल है यह सब की है।

प्रकृति के साथ संतुलन बैठाने में ही मानव की भलाई है , नहीं तो ग्लेशियर,पहाड़,समुद्र की गहराई में तरह तरह के वैक्टीरिया और वायरस दफन है जो तुम्हारें कार्यो से बाहर आ रहे है । विकास के नाम पर प्रकृति की विविधताओं को रौंदते हुए जिस विकास की भूलभुलैया बना रहे है । तरह-तरह के जीव जंतु जो कि प्राकृतिक संतुलन के वाहक है,जिन्हें तुम भोजन मान के खा रहे हो ,काश तुमने ऐसा नहीं किया होता है ये हैजा,चिकेन- स्माल पॉक्स ,फ्लू,इन्फ्लूएंजा, इबोला और कोरोना जैसे रोगाणु और विषाणु आज मानवता पर कहर बन कर न टूटते।

बुखार में मुझे कई दिन ऐसा लगा कि आज ये दवा लेकर लेट रहे है अब दुबारा नहीं उठेंगे। लेकिन जीवन में कुछ प्रियजन के प्रेम और हमारे कुछ पुण्य शेष थे जिससें यह पुर्नजन्म रूपी जीवन मिला है ईश्वर के आदेश से कि कुछ कार्य तुम्हारें शेष है पूरा करो।

मेरी प्राथमिकताएं बदल गयी है । हाँ एक चीज और मेरी देवी जी का विश्वास बहुत मजबूत रहा है कि मैं अभी नहीं मर सकता हूँ। नये जीवन का इस्तकबाल करना ही होगा ,अभी बहुत कुछ बाकी है ,आगे की डगर का मांझी पतवार ले लिया है। मौत सज-धज के आती है ,आखिर सत्य बन है । मुझे तो बहुत नीरश सी जान पड़ी। जिंदगी की जद्दोजहद में 20 दिन बाद जीवन ने फिर ताना बुना और कहा है कि आओ मिलकर एक बार फिर बगिया सजाते है।

जीवन और मौत के बीच बहुत महीन डोर का अंतर है क्या एक बीमारी इतना कमजोर कर देती है? हम मौत के मुसाफिर बनने के लिये स्वयं कहने लगते है इतना हैरान,परेशान और विवश! अब देखना है कि मर कर मिले इस जीवन रूपी नैया को कहाँ तक ले जा पाते है।

2 thoughts on “मृत्यु से 🕷️मुलाकात…♨️

  1. चिंतनीय … परंतु आप #कोरोना को हरा कर जंग जीतने में कामयाब हुए इसकी ख़ुशी भी है.!💐💐🙏🏻

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