मेरी दिव्य यात्राका पड़ाव_पंढ़रपुर

🌻🌻 गांगेय

पिछले वर्ष अप्रैल के लास्ट में मुझे कोरोना हुआ जो दवा से न गया आखिर हॉस्पिटल जाने से बस समझिये प्राण बच गये। कोरोना का वह 20 दिन बहुत उबाऊ था। लग रहा था मर क्यों नहीं जाते है। खैर जीवन शेष था अब तक जारी है।

कोरोना के दौरान मई के महीने में एक दिन रात स्वप्न में विट्ठल भगवान की नगरी पंढरपुर दिखाई पड़ी। उसी दिन से स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। अब एक नई यात्रा पर जाने का समय आ गया था। जुलाई महीने में भगवान विट्ठल की नगरी पंढरपुर कि यात्रा मानो जीवन का अभिन्न अंग बन गई । हम इसे ईश्वरीय प्रेरणा मानते है कि 24 जुलाई को पुणे नगरी पहुँच गये।

महाराष्ट्र का पुणे नगर महाराज शिवाजी और श्रीमंत पेशवा की राजधानी के लिए प्रसिद्ध है। इसे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कहते है। नगर बहुत खूबसूरत होने के साथ ही इसका मौसम बहुत सुहावना रहता है रात होते होते गुलाबी ठंड हो जाती है।

पुणे का प्राकृतिक नजारा बहुत मनोरम है। शनिवार वाड़ा आज भी पुराने मराठा शूरवीरों की गाथा समेटे है। सतारा के किले में श्रीमंत बाजीराव पेशवा ने छत्रपति के सन्मुख कहा था,जब छत्रपति ने पूछा था कि क्या योग्यता है आपकी और क्या कर सकते है राष्ट्र और हिंदुपाद शाही के लिए । श्रीमंत बाजीराव की उम्र उन्नीस थी बामुश्किल 5 फिट लम्बाई, एक छलांग में घोड़े पर बैठते हुए कहा कि मराठा पताका “कटक से लेकर अटक तक फहरानी है”। छत्रपति ने कहा कि आप योग्य पिता की योग्य संतान है। आप जरूर मराठा को आगे ले जायेंगे।

श्रीमंत पेशवा ने इसी शनिवार वाडे से मराठा साम्राज्य की नींव को बहुत विस्तार दिया। 37 युद्ध में उन्होंने मुगल,पुर्तगाली,निजाम आदि को पराजित किया।

पुणे नगर मराठा की छाप खासकर श्रीमंत पेशवाओं का प्रभाव दिखता है। यह नगर हिंदुपादशाही का गवाह बना। मुस्लिम शासकों और मुगलों को चुनौती भर नहीं दिया अपितु पेंशन भी दिया गया।

पुणे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी है यही संत ज्ञानदेव, तुकाराम की यह स्थली है जिनका प्रभाव महाराष्ट्र के जनमानस पर पड़ा। इसी प्रभाव के कारण महाराष्ट्र में भक्ति के साथ राष्ट्र और स्वतंत्रता स्वराज मानसपटल पर उभरे। जिसके प्रणय गीतकार शिवाजी महाराज बने। छत्रपति के पेशवाओं ने कमाल कर दिया दक्कन से लेकर दिल्ली और अटक तक चौथ और सरदेशमुखी वसूल की।

पुणे में शनिवार वाड़ा देखने पर मन में कौतूहल जागरित हुआ कि काश श्रीमंत पेशवा बाजीराव कुछ दिन और जी गये होते, भारत में अंग्रेज की बारी ही न आ पाती। मुगल से सीधा शासन हिंदुओं के पास आ जाता। इतिहास में किन्तु-परन्तु को डगर नहीं है। इतना तो तय मानिये की पूर्व में हम भी छत्रपति की सेना के दत्तोपंत, मोरोपंत न सही एक सैनिक जरूर रहे होंगे।

गणेश जी का मन्दिर दगडू सेठ के दर्शन के पश्चात भगवान विट्ठल की नगरी पंढरपुर पहुँचे। सुबह 5 बजे का समय था गुनगुनी ठंड लिए हुए ,पहला काम चंद्रभागा में स्नान किया।भीमा नदी पंढरपुर में चंद्राकार होने के कारण चंद्रभागा कही जाती है।

नदी के बिल्कुल तट से लगा हुआ भक्त पुण्डरीक का मन्दिर है यहाँ मान्यता है कि पहले भक्त पुण्डरीक के, पश्चात भगवान के दर्शन होते है। यह भक्त पुण्डरीक वही है जिन्होंने अपने माता-पिता की सेवा से भगवान को प्रसन्न कर दिया भगवान भक्त के होकर यही रह गये।

भारत मे एक सबसे बड़ी समस्या रही है कि लोग भाई और सम्बन्धी के सामने नहीं झुक सकते उसमें उनका ईगो समस्या करने लगता है जैसा आज भी देख सकते कि व्यक्ति 5000 की प्राइवेट नौकरी कर लेगा किन्तु भाई या सम्बन्धी के सामने न झुकेगा। यही मराठा के साथ हुआ राजपूत,जाट और सिख का सहयोग नहीं मिला वही मुस्लिम नबाब हिन्दू राजा को हराने के लिए दीन के नाम पर एक हो जाते थे।

पुणे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी है यही संत ज्ञानदेव, तुकाराम की यह स्थली है जिनका प्रभाव महाराष्ट्र के जनमानस पर पड़ा। इसी प्रभाव के कारण महाराष्ट्र में भक्ति के साथ राष्ट्र और स्वराज मानसपटल पर उभरे। जिसके प्रणय गीतकार शिवाजी महाराज बने। छत्रपति के पेशवाओं ने कमाल कर दिया दक्कन से लेकर दिल्ली और अटक तक चौथ और सरदेशमुखी वसूल की।

पुणे में शनिवार वाड़ा देखने पर मन में कौतूहल जागरित हुआ कि काश श्रीमंत पेशवा बाजीराव कुछ दिन और जी गये होते, भारत में अंग्रेज की बारी ही न आ पाती। मुगल से सीधा शासन हिंदुओं के पास आ जाता। इतिहास में किन्तु-परन्तु को डगर नहीं है।

गणेश जी का मन्दिर दगडू सेठ के दर्शन के पश्चात भगवान विट्ठल की नगरी पंढरपुर पहुँचे। सुबह 5 बजे का समय था। पहला काम चंद्रभागा में स्नान , यह चंद्रभागा भीमा नदी ही यहाँ पंढरपुर में चंद्राकार होने के कारण चंद्रभागा कही जाती है।

नदी के बिल्कुल तट से लगा हुआ भक्त पुण्डरीक का मन्दिर है यहाँ मान्यता है कि पहले भक्त पुण्डरीक के पश्चात भगवान के दर्शन होते है। यह भक्त पुण्डरीक वही है जिन्होंने अपने माता-पिता की सेवा से भगवान को प्रसन्न कर दिया भगवान भक्त के होकर यही रह गये।

यहाँ चंद्रभागा का तट बिल्कुल काशी के जैसे मनोरम दिखता है अंतर इतना है कि काशी के सभी घाट पक्के है यहाँ एक ही घाट ही पक्का है किंतु तट उसी तरह लम्बा है। एक चीज गौर करने लायक है भारत में एकरूपता सनातन हिन्दू धर्म के तीर्थो में दिखाई पड़ती है। यही वह तत्व है जो सांस्कृतिक समरूप्य प्रदान करते है। यही नदी तट से लगा रुक्मिणी माता का स्वयंभू मन्दिर है जब भगवान वापस नहीं लौटे ,माता उन्हें देखने के लिए यहाँ आयी। वैसे विट्ठल मन्दिर में माता रुक्मिणी की बहुत सुंदर विग्रह है।

अषाढ़ एकादशी को पूरे महाराष्ट्र से वारि चल कर यहाँ आती है। भक्त वारि (पालकी) पैदल लिए यहाँ पहुँचते है। ज्ञानदेव,नामदेव,एकनाथ और चोखा मेला की भक्ति, कीर्तन परम्परा आज भी जीवित है। महाराट्र के भक्त दर्शन के लिए आते है खूब कीर्तन के साथ नृत्य करते है। यहाँ भक्त भगवान के आगोश में चला जाता है। यहाँ पर “जात पात पूछे न कोई जो हरि का भजै हरि का होई”।। चरितार्थ दिखाई देती है। भक्त की अपरम्पार महिमा है वह ऐसा गुरु है जो आपके चित्त को जगत प्रपंच से जगत के स्वामी की ओर मोड़ देता है।

मन्दिर में दर्शन के पूर्व तीर्थयात्री पहले भक्त चोखामेला की समाधि के दर्शन करते है फिर वही सीढ़ियों पर भक्त नामदेव की समाधि है। विट्ठल की विग्रह अन्य मंदिरों से एक भिन्नता लिए हुए ,विट्ठल भगवान के पादस्पर्श दर्शन ,जोकि भारत के किसी बड़े मन्दिर में नहीं होता है। यह आपको बहुत अलग फील कराता है। मन्दिर के आस पास धर्मशालाओं को देख कर आप को पुनः एक बार काशी की सुधि हो जायेगी। भगवान विट्ठल को महाराष्ट्र का इष्टदेव कहा जाता है यह भारत की विष्णु के अष्ठ पीठ में पांचवें नम्बर पर आता है। कार्तिकी एकादशी, माघी एकादशी, गुड़ीपड़वा, रामनवमी, दशहरा प्रमुख उत्सव है जब मन्दिर में लाखों भक्त पहुँचते है। वारि के समय एक दिन के लिए ऑफिसियल रूप से मुख्यमंत्री भी भगवान के सेवादार बनते है।

आप पंढरपुर आये तो रात्रि विश्राम अवश्य करें जिससे इस नगरी को आप महसूस कर सके।चंद्रभागा में स्नान सुबह 5 बजे करिये यह ध्यान केंद्रित करने में सहयोग करेगा। सूर्योदय बहुत सुंदर होता है भक्ति का यह समय भी शुभ है शाम की आरती की छटा निराली है। आरती में बहुत जोर कि भक्तिभावना प्रकट होती है,मन प्रसन्न हो जाता है पादस्पर्श दर्शन अद्भुत एहसास कराता है।

महाराष्ट्र के गांवों में कुछ विशेष परम्परा दिखाई दी जैसे किसी के मर जाने पर घर परिवार के लोग उन्हें श्रद्धांजलि देते हुये गांव के बाहर पोस्टर लगवा देते है। गांव और हॉट उत्तर की तरह ही है। खाने में जरूर कुछ भिन्नता और ज्यादा तीखा और चटकारेदार है।

पंढरपुर से वापस पूणे आते समय लग रहा अभी दो तीन और रहना चहिए। भगवान जी कह दिए आप चाहेगे तो बार बार आना होगा। यहाँ से द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक “भीमाशंकर” जिन्हें “मोटेश्वर महादेव” कहते है के लिए सुबह-सुबह निकलना हुआ। भीमाशंकर का अर्थ भीम के शंकर। यही भीमा नदी का उदगम है सहराद्रि श्रेणी, यह स्वयंभू ज्योतिलिंग अपने प्राकृतिक मनोरम दृश्यों के कारण विशेष अनुभूति देता है।

कथा मिलती है कि कर्कटी नामक राक्षस के भीम नामक पुत्र ने एक समय इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था यही राजा कोपेश्वर रहते थे जो शिव भक्ति में अविचल थे उन्ही के राज्य को हड़पकर भीम उन्हें कारागर में डाल दिया राजा कोपेश्वर कारागार में शिवलिंग स्थापित करके भक्ति में लीन रहते जब भीम के अत्याचार से कारागार में भक्त की भक्ति में विघ्न पड़ने लगा तब महादेव का प्राकट्य हुआ उन्होंने भीम का वध किया और यही स्वयंभू रूप में स्थापित हो गये।

मन्दिर का सभमण्डप मराठा नेता नाना फडणवीस द्वारा बनवाया गया है। मन्दिर के सन्मुख रोमन शैली में एक घण्टी लगी हुई है इस घण्टी में जीजस के साथ मदर मैरी की मूर्ति है। यह बाजीराव के पेशवा के भाई चिमाजी अप्पा ने 16 मई 1739 को पुर्तगालियों के खिलाफ युद्ध में विजय के वसई किले पांच घण्टिया लाई। चार को कृष्णा नदी के तट पर स्थित शिवमंदिर वन,ओंकारेश्वर और समलिंग मन्दिर के सामने लगाया।

इस मंदिर पर दैवीय जीवों की जटिल नक्काशी,मानवमूर्ति के साथ प्रतिच्छेदन खम्भे मन्दिर के द्वारा सुशोभित है। पौराणिक कथाओं के दृश्य का अंकन शानदार नक्काशियों में जीवंत पाये जाते है। यही 1.30 वर्ग km आरक्षित वन क्षेत्र है। 1985 में इसे वन्य जीव अभ्यारण्य घोषित किया गया है। यह विश्व प्रसिद्ध पश्चिमी घाट का हिस्सा है इसलिए यह पुष्प और जीवविविधता से समृद्ध है। हनुमान झील,नागफनी,बॉम्बे प्वाइंट,साक्षी विनायक प्रसिद्ध स्थान है। भीमाशंकर के पास देवी कमलना मन्दिर है कमलना को माता पार्वती का अवतार कहा जाता है। यह एक आदिवासी देवी है।

यहाँ पहुँचने पर बारिश शुरू हो गयी पूरी तरह से धुंध छा गयी मौसम बहुत खुशनुमा हो गया। बादलों की गड़गड़ाहट मदहोश कर दे रही थी ऐसा लग रहा था मानो बादलों के बीच में आ गये है।

समसे महत्वपूर्ण बात कोविड के चलते मन्दिर बंद थे किंतु पुलिस भारत की है और मामला भक्त के दर्शन है कुछ भेंट देने के एवज में प्रभु के दर्शन को जाने को मिला।

मन्दिर में दर्शन करने और प्राकृतिक दृश्य देखने और मौसम बिगड़ने के कारण पता चला शाम वाली बस नहीं आयेगी। यदि बस चाहिए तो नीचे पांच किलोमीटर दूर से जायेगी। रुकना उचित इसलिए नहीं था क्योंकि कोविड की वजह से होटल सेवा बंद थी।

आरक्षित वन होकर नीचे आना था अभी कुछ दूर चले ही थी जोरों की बारिश आ गयी, रुक इसलिए नहीं सकते थे कि नीचे बस निकलने के समय से पहले पहुँचना था। एक डर मन में जंगल के जीव-जंतुओं का वारिश तेज थी कोई और आ जा भी नहीं रहा था।

प्यास लगने पर प्राकृतिक झरने से पानी पेटभर पी लिया । इस नैचुरल मिनरल वाटर की कीमत लगाई जाय तो कमसे कम 1000₹ लीटर से कुछ ज्यादा ही आयेगी। पानी का टेस्ट बहुत रीयल था अरे आपके बेसलेरी से कई सौ गुना ज्यादा टेस्टी। वारिश में ठंड लग रही थी प्रयाग के वर्षा में भीगना उतना मजेदार नहीं होता है किन्तु इसमें भीगना बहुत उद्वेलित कर रहा था पूर्णतया प्राकृतिक, इतनी दूर पहाड़ों में भीगना एक सपने से कम न था। भीगे कपड़े बस में जाकर ही बदले। कितना कुछ प्रकृति ने दिया है हम है कि अपने दुश्मन है साथ ही प्रकृति के भी शत्रु है।

पारिवारिक,सामाजिक और राजनीतिक प्रपंच में वास्विकता से दूर अपने को मिक्सअप मनुज बना लिए है। फिर एक बार पुणे लौटे अब अगले दिन महाबलेश्वर जाने की तैयारी करनी थी।

महाबलेश्वर पुणे से कोई 180 km दूर सहराद्रि श्रेणी में एक प्राकृतिक धार्मिक स्थल है यह सतारा जिले में पड़ता है। यह समुद्र तल 4450 फ़ीट की ऊँचाई पर है। लगातार बारिश होती रहती है यह चेरापूंजी के बाद सबसे अधिक वर्षा वाला क्षेत्र है। महाबलेश्वर के पास में ही पंचगनी महाराष्ट्र का हिलस्टेशन है वह अपने स्कूल और फूडप्रसंस्करण के लिए प्रसिद्ध। पूर्व में यह अंग्रेजों के समय महारष्ट्र की गर्मियों की राजधानी हुआ करता था। यह आज भी गर्मियों में महराष्ट्र के राज्यपाल के लिए संरक्षित है।

महाबलेश्वर का शाब्दिक अर्थ है भगवान की महाशक्तियां। महाबलेश्वर को पंच नदियों की भूमि कहा जाता है कृष्णा ,वेन्ना,कोयना,गायत्री,सावित्री। कथा है कि सावित्री ने ब्रह्म,विष्णु और शिव को नदी होने का श्राप दिया। विष्णु कृष्ण नदी ,शिव वेन्ना और ब्रह्मा जी कोयना नदी बने।

यहाँ पर एलफिंस्टन प्वाइंट, लाडविक प्वाइंट,आर्थर सीट,मार्गोरी प्वाइंट,कैसल रॉक,फाकलैंड प्वाइंट,कारनैक प्वाइंट है। विल्सन प्वाइंट यहाँ का सबसे ऊंचा प्वाइंट है जहाँ से सर्वोदय और सूर्यास्त की अद्भुत छटा है। पर्यटक इसे दिखने अवश्य पहुँचते है।

टेबल लैंड एक ज्वालामुखी पर्वतीय पठार है जो समुद्र से लगभग 4500 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है यह तिब्बती पठार के बाद एशिया का सबसे ऊंचा पठार है। धोबी जलप्रपात का विहंगम दृश्य है इसका जल कोयना नदी में विलीन हो जाता है।

महाबलेश्वर आदि बड़े पहाड़ी धार्मिक स्थल एक समय में ऋषि मुनियों द्वारा खोजा गया था आध्यात्मिक शांति के लिए। जिससे वह सामाजिक शोर से भी बचे रहे । अंग्रेजी शासन में ऐसे बहुत से धार्मिक स्थल की जबरी खोज का टैग लगाया गया है।

सबसे मजेदार बात महाबलेश्वर के लिए यह है कि अंग्रेजों के उपनिवेश रूपी इमारतों को अभी भी उसी हाल में सुरक्षित रखा गया। क्या कारण है? कि आजादी के बाद भी अंग्रेजों के नम्बर प्लेट आज भी बिल्डिंग में लगे है जिन्हें देखकर आपको लगेगा आप भारत में नहीं ब्रिटेन के किसी हिलस्टेशन पर है।

यहाँ का वातावरण बहुत खूबसूरत लगातार बारिश का रहना आपके मन को प्रफुल्लित कर जायेगा ऐसा लगेगा कि धरती के स्वर्ग में आ गये है। प्राकृतिक झरने में नहाने आनंद बहुत अलग है । अलग-अलग जल के स्रोतों मिनरल वाटर पीना बहुत प्रसन्न करता है यह जरूर है कि यहाँ जब तक रहते है पूर्व की चिंता से मुक्त रहते है ।

मुझे लगा मैंने जितने भी तीर्थ और पर्यटन स्थल देखें है उसमें महाबलेश्वर बहुत अद्वितीय और अनुपम है।

महाबलेश्वर से कैब लेकर छत्रपति के महत्वपूर्ण किले “प्रतापगढ़” गये यह सतारा जिले में पड़ता है यह किला इस लिए विशेष है क्योंकि शिवाजी महाराज ने यही अफजल खान का वध किया था किले के पास ही अफजल खान की दरगाह है यहाँ से “जय भवानी जय शिवजी का नारा बुलंद हुआ”।

बीजापुर के आदिलशाह के प्रधानमंत्री पंडित कृष्ण जी भास्कर को शिवाजी महाराज ने हिन्दू के नाम पर गूढ़ जान लिया और उन्हें अपने साथ कर लिया , अफजल खां का मकसद क्या है जानकर उन्होंने अपने बखनख से अफजल खां का काम तमाम कर दिया।

प्रतापगढ प्रकृतिक रूप से एक अभेद किला है यही से शिवाजी राजे की कीर्ति पूरे भारत में फैली। यह किला अपनी ऊँचाई और साथ बनावट के कारण रोमांचित करता है। शिवाजी महाराज एक बार जीवित हो जाते है और पूछते है क्या कर सकते हो हिंदुपादशाही के लिए आप का बरबस मन अपने को टटोलने लगता है।

किले में सबसे ऊँचाई पर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू छत्रपति की मूर्ति का अनावरण 1957 में किया था। किले को मराठा राष्ट्र कहते थे इसी कारण इसका नाम महाराष्ट्र पड़ा है।

किले पर चढ़ते समय एक मराठी युवान द्वारा जय भवानी जय शिवाजी का उदघोष किया जा रहा था इतनी बुलंद आवाज थी कि लग रहा था युवान का उद्घोष बार बार होता रहे।

राजगढ़,सतारा, लोहागढ़,कोंडाणा फोर्ट देखने की अभिलाषा सिमेटनी पड़ी क्योंकि कोविड प्रोटोकॉल की वजह से बंद थे। महाबलेश्वर जितना आप देखते यह उतना अधिक खूबसूरत लगता है आप के अंर्तमन से आवाज निकलती है कम से कम इसे देखने एक बार और अवश्य आना चाहिए। लौटते समय पुणे की सीधी बस नहीं मिली। लग रहा था आज पुणे पहुँचना नहीं हो पायेगा । चिंता यह थी कि दूसरे दिन ही प्रयाग वापस आना था अभी संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम की कर्मभूमि जाना था।

इसे संयोग ही कहेंगे कि महाबलेश्वर से लेकर बस जैसे ही बीच के स्टेशन पर उतारी ही थी कि पता चला कि पुणे के लिए आखिर बस निकलने वाली है। रात 11 बजे पुणे पहुँच गये।

सुबह सुबह आलंदी गाँव के लिए निकले यही संत ज्ञानेश्वर की समाधि है इसकी दूरी पुणे से 35 km है यहाँ के विठोवा मन्दिर का शिखर एक समय में श्रीमंत के शनिवार वाड़े से दिखाई देता था।

संत ज्ञानेश्वर मराठी भाषा में ज्ञानेश्वरी की रचना कर आमजन मानस के विश्वास को ईश्वरभक्ति में दृढ़ किया इनका महाराष्ट्र में वही स्थान है जो कि उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास का है।

आलंदी इंद्राणी नदी के तट पर स्थित एक भक्तिनगरी है वह सुरम्य और रमणीक स्थल है । आलंदी का अर्थ है आनंद या भक्ति का स्थल। यहाँ पहुँच कर लगा जैसे ज्ञानदेव और ज्ञानेश्वरी दोनों साक्षात हो गये। यहाँपर अभी भी वह शिला है जिसे अघोरी चंगदेव को प्रतिउत्तर देने के लिए ज्ञानेश्वर जी ने जड़ से चेतन कर दिया। चंगदेव प्रसिद्धि सुनकर ज्ञानेश्वर से मिलने सिंह की सवारी करते आये तभी ज्ञानेश्वर जिस शिला पर बैठे थे उसे ही चलने का आदेश दिया।

विट्ठल भगवान के मन्दिर में भक्त लगातार कीर्तन और नृत्य करते रहते है।

पुणे और यहाँ के तीर्थ से मन नहीं भरा था फिर भी घर वापस लौटना पड़ता है । यहाँ कभी भक्त तो कभी शिवाजी के, कभी श्रीमंत के कभी तन्हाजी मलसुरे के सैनिक मन बन जाता है आलंदी आकर मन पूर्णतया भक्त का बन गया। मन की गति भी बड़ी अजूबी है कभी कुछ तो कभी कुछ बन जाती है।

संत तुकाराम की जन्म स्थली देहू नहीं जा सके जबकि वही पास में ही थे कारण था समयाभाव क्योंकि आज और अभी ही प्रयागराज के वापस लौटना था। तुकाराम जी प्रणाम करके पुणे से प्रस्थान लिये।

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