कलयुग की प्रेमगाथा ❤️❤️

यह समय अंग्रेजी वाले लवर का चल रहा है GF, BF के बाद प्रचलन में X भी आ गया। मेरी X तेरा X,लवर का प्रचलन फैलता जा रहा है एक वायरस की तरह। चरित्र क्या होता है न BF को पता न GF को। इनका मानना है जितना दिन मन कर रहा हो रहो उसके बाद आगे का रास्ता नापो यहाँ मेरे पास तुम्हारी कहानी के लिए टाइम नहीं है।

लड़की कहती है लौंडा पांच दिन बाद दूसरी ढूढ़ने लगता है हम क्यों एक में फंसे रहे । रात-रात भर बाते,चैटिंग,Msg, vedio cal ऐसा लगेगा यही धरती का परफेक्ट जोड़ा है । कुछ दिन बीते सेटिंग चेंज ,फिर दोनों अलग टेस्ट के लिए दूसरी/ दूसरा,तीसरी/ तीसरा आगे श्रृंखला कितनी दूर जाये पता नहीं।

टूटते रिश्ते,कमजोर होता व्यतित्व ,एक दूसरे को धोखे में रखते लोग आखिर यह सीख उन्हें अंग्रेजी शिक्षा ने ही दी है। आज इतने ज्यादा स्वार्थ में अंधे हुये लोग है कि उन्हें अपने ऊपर चिंतन के लिए तनिक समय नहीं है। स्त्री की गरिमा और पुरुष की महिमा को देहसुख के लिए मलीन कर रहे है।

मेरे इस विषय पर लिखने का मकसद यह है कि लवर का बार-बार बदलाव किस लिए है? आखिर ये क्यों चल रहा है । कुछ लड़कियां घर से भाग कर अंतर्जातीय शादी कर रही है। उन्हें लगता है कि उसके बगैर मर जायेगी। इस शादी का भविष्य बहुत छोटा होता है (अपवाद छोड़ के)।

आज यह चारित्रिक पतन क्यों है! हमारा युवा मन TV और सिनेमा से प्रभावित हो गया। वह कॉकटेल बना रहा है।

सम्बन्ध प्रगाढ़ ,स्थायी और प्रेममय होता है। यह गर्मी दूर करने और वेडियों बनाने वाले, टाइम पास करने वाले नायक-नायिका भविष्य देख कर बाइंडिंग नहीं किये है बल्कि स्वार्थ देख कर । आज वाले लव में नायिका अपने नायक से तरह-तरह का उपहार चाहती है विश्वास और प्रेम से उसका कोई सर्वकार नहीं है।

वह कहती है जब तक मन हुआ हम-तुम मजे लिए अब मेरा मन तुम पर नहीं लगता। अब मैं पप्पू से प्यार करती हूँ । लड़का मुझे क्यों छोड़ा ? मैं तुम्हें वाइफ बनना चाहता था, मैं तुम पर कितना पैसा और समय बर्बाद किया । तुम ऐसा मेरे साथ कैसे कर सकती हो ? लड़की-मैं कोई तुम्हारी पहली नहीं थी मुझसे पहले और बाद रहेगी ,आजकल के लौंडो को मैं अच्छे से जानती हूं। मैं नहीं तो कोई और सही।

अब रिश्ते लिव इन रिलेशनशिप वाले हो गये। जब तक अच्छा लगे बिना विवाह किए एक घर में पति-पत्नी की तरह रहे। किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं। फिर तुम अपने रास्ते हम अपने।

प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नियों की अदला-बदली अमेरिकी-यूरो संस्कृति के प्रभाव में रिश्तों में पशुता आ जा रही है। माया नगरी के सिनेकलाकार की तरह मेरी बीबी सिर्फ मेरी नहीं है वह तब तक है जब तक वह चाहे।

भारतीय संस्कृति में प्रेम में ,रिश्तों में पशुता और नीचता नहीं रही है रिश्ता मतलब विश्वास, रिश्ता मतलब प्रेम,रिश्ता मतलब आदर्श, रिश्ता मतलब एकत्व की भावना, रिश्ता मतलब संस्कार है। आज रिश्ता मजाक बन गया।

अंग्रेजी शिक्षा अंग्रेजी संस्कार को हमारे समाज में रोप रही है। पति-पत्नी का रिश्ता अभिन्न था। प्रेमी-प्रेयसी की कितनी कहानियां रही है जिसका मन से वरण कर लिया वही तन से वर हो जाता है। नल दमयन्ति की प्रेम गाथा, दुष्यन्त-शकुंतला की प्रेम गाथा अजर-अमर है।

महाभारत में वर्णन है जब जुएं में अपना सब कुछ हार कर नल रात्रि में सराय में दमयंती को छोड़ कर चले जाते है । दमयंती नदी से,पहाड़ से,पेड़ से, जंगली पशुओं से,चिड़िया आदि से कहती है तुम मेरे नल को देखें हो, मैं उनके बिना जीवित न रहूंगी।

जब माता सीता का हरण हो जाता है श्रीराम उन्हें खोजने के लिए जाते है तो कहते है कि

हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी ।
तुमने देखी मेरी सीता मृग नैनी।।

श्रीराम अपनी “श्री” के लिए व्याकुल दिखे। क्या यह प्रेम तुम्हें नहीं दिखा जो वैलेंटाइन में तुम प्रेम की तलाश करने लगे।

प्रेम का भारतीय ग्रंथों अद्भुत वर्णन है आज के युवाओं को पढ़ना चाहिए जिन्होनें प्रेम को बदनाम कर दिया है। प्यार पूरे जीवन एक से होता है लगाव कई लोगों से होता है।

“प्रेम गली अति साकरी जामे दो न समाय”

चरित्र के लिए हिटलर कहता है कि चरित्रहीन व्यक्ति समाज में वायरस की तरह है समाज में उसे फैलता जाता है इस लिए चरित्रहीन को गोली मार देनी चाहिये।

चरित्र से आप पता नहीं कहा तक सहमत है! स्त्री पुरुष में रिश्ता मित्र का हो ही नहीं सकता है बारूद और माचिस में मित्रता कैसी? रिश्तों को घुमाया न जाय बल्कि वास्तविकता में जिन्होंने ने अनुभव लिया उनसे पूछ कर देखिये। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध पिछले 5000 वर्षों सबसे निम्न स्तर के दौर से गुजर रहा है।

भारत की भूमि चरित्र को बहुत महत्व देती रही है जिसको मन,वचन से पति/पत्नी मान लिया वही कर्म से भी होता है।

कौशिक और कौशिकी की कथा में जब कौशिकी के पिता कौशिक के साथ कौशिकी का विवाह निश्चित कर देते है। कुछ दिन बाद कौशिक को कुष्ठ रोग हो जाता है वह विवाह के लिए मना कर देते है। कौशिकी अपने पिता को लेकर कौशिक के पिता गाधि के आश्रम जाती है उनसे कहती है यह बीमारी विवाह के पश्चात होती तो क्या मैं इनका परित्याग कर देती ? नहीं ! मैंने मन वचन से इन्हें पति मान लिया है यह बंधन सात जन्मों का है जो मेरे भाग्य में है वही होगा। आगे कहती है कि-

पति पत्नी वह रथ के पहिये है जिसपर सृष्टि घूमती है। मैं आप को मन से ,वचन से पति मान लिया मैं दूसरे का वरण नहीं कर सकती।

कौशिक-कौशिकी,नल- दमयंती,दुष्यंत-शकुंतला
,राम-सीता की भूमि पर प्रेम,विश्वास और रिश्तों का अभाव है। रिश्तों की उखड़ती डोर। चिंता है हमें भारतीय संस्कृति की है जिसका आचरण युवा पीढ़ी में नहीं दिखता है। यह दशक 2020- 2030 बहुत कठिन है इसमें जिस तरह से समाज में आदर्श रोपेंगे वह 2090 तक चलने वाला है। इस बहुत सावधानी से कदम उठाने की जरूरत है।

चरित्र,संस्कार,मर्यादा और अनुशासन बीते युग की बाते होनी लगी है। हमारे घर में ,हमारी सोच में अपसंस्कृति का प्रवेश जिससें हमारा मन विशृंखलित हो गया है। दूसरे के प्रभाव में कुछ दूसरा कर रहे। एको ही नारी सुंदरी या दरीवा कही गयी है पति को देव तुल्य माना गया है। विवाह के समय पत्नी अपने पति से सात वचन लेती है और एक वचन देती है।

एको नारी व्रत: । एको पति व्रत: कहा गया है।

यह डोर प्रेम भरे विश्वास की है अभिन्नता,एकात्म के अनुभति की है।

अपने सतीत्व की शक्ति से माता अनुसूइया ने ब्रह्म,विष्णु और महेश को बालक बना दिया।

भगवान परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के कहने पर अपनी माता रेणुका वध का उनकी अशक्ति(चरित्र) डिग जाने की वजह से कर दिया। चरित्र का बल सबसे बड़ा बल। उच्चश्रृंखल होकर देयभोग की वासना सुख नहीं देगी बल्कि अहंकार और भ्रम पैदा करेगी। जीवन पत्नी और पुत्री के शंका में बीतेगा।

मनुष्य के रूप एक पुरुष को एक स्त्री संग का अधिकार है यही बात नारी पर लागू होती है। भौतिक भोगों से कामनाओं की तृप्ति नहीं होती है। उससे शरीर जर्जर और कामी हो जाते है। हमारे शास्त्रों में कहा जाता धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष ! अर्थ और काम का सेवन धर्मानुसार होना चाहिए। वह धर्म से नियंत्रित रहे तभी वह उत्तम है अन्यथा व्यसन बन जाता है।

प्रेम सह्रदय,कोमलता,एकत्व का बोध करता है स्त्री-पुरुष के भेद को दूर कर देता है। प्रेमी-प्रेयसी एक हो जाते है वह जीवन से लेकर मृत्यु तक अभिन्न रहते है।

रूठे सुजन मनाइये जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए टूटे मुक्ता हार।।

भारत की संस्कृति क्या है?🏹🚩

भारतीय संस्कृति यह आज भी एक बहुत ही ज्वलंत विषय बनी हुई है। भारत में सदा से आस्तिक और नास्तिक रहे है और इसके साथ वाममार्गी भी अपने विचार को समाज में रोपित करने का प्रयास करते रहे हैं। सनातन मान्यता की जड़ें बहुत मजबूत हैं जिसका आधार है- धर्म। धर्म से अभिप्राय सक्रियता, वास्तविकता और स्वयं को जानने का सिद्धांत है। सनातन धर्म भौतिकता पर न रुक कर आध्यात्मिकता पर जोर देता है। आध्यात्मिकता का तात्पर्य है- सम्पूर्णता से है।

मनुष्य होने के नाते एक चीज पर विचार बनता है कि हम पृथ्वी पर क्यों आते है? यदि हम अपने शास्त्रों का रुख करते है तो शास्त्र समूल चिंतन के साथ आगे बढ़ता है। वह मनुष्य के विभिन्न पहलुओं अर्थात् चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के साथ चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास का वृहद फलक देता है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध यहाँ अभिन्न है किंतु अब नये विकसित तथाकथित धर्म पनप गये हैं जिनमें सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से नारी को “देह” और “भोग्या” रूप में ही लिया गया है।

विश्व की किसी भी संस्कृति पर दृष्टि डालें – चाहे वो यूनानी हो, मिश्री हो, सुमेर की हो, वा बेबीलोन की हो; सभी में नारी के दैहिक भोग के साथ लौंडेबाजी भी एक बड़ा स्टेटस सिंबल था। जब विश्व में यहूदी, ईसाई और इस्लाम जो (यहूदी से दोनों निकले हैं) में यह बुराई आम थी। इनके प्रसार के साथ नारी के अधिकार में कटौती होती गयी। वहाँ नारी, पुरुष की यौन कुंठा का समाधान और बच्चा पैदा करने का उपकरण भर बन कर रह गयी। उस समय सनातन धर्म में नारी को माता और अनन्य सम्मानित अधिकार प्राप्त थे।

सबसे बड़ा परिवर्तन देखने को तब मिला जब विश्व युद्ध के दौरान सभी पुरुष युद्ध के मोर्चे पर चले गये। ऐसे में समाज को संचालित करने के लिए नारी की जरूरत पड़ी और उन्हें अधिकार दिये गये। यूरोप में इसी समय तेजी से कम्युनिस्ट विचार फैल रहा था जिसका जन्म समाजवाद से हुआ था। कम्युनिस्टों ने नारी की भावनाओं को बढ़ा कर उनका मटेरियल की तरह बिस्तर में मौज के लिए प्रयोग किया और इसे नया नाम दिया “नारी स्वतंत्रता का”।

नारी को कुछ भी करने को आजादी और अपनी इच्छा से किसी से सम्बन्ध बनाने की स्वतंत्रता। विचार चला समानता और सामाजिक न्याय का।

भारत के सनातनी व्यवस्था पर चिंतन करते हैं- सबसे पहले वर्णव्यवस्था के माध्यम से लोगों के रोजगार का प्रबंध जन्मजात कर समाज की ऊर्जा को नष्ट होने से बचाकर हमने अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व में सर्वांगीण बनाया। यह विश्व की जीडीपी की 35% तक जा पहुँची। बेरोजगारी जैसा कोई विचार नहीं था।

बेरोजगारी पहली बार फिरोज तुगलक के समय 14वीं सदी में देखने को मिली जब प्रचलित हुआ- पढ़े फ़ारसी बेचे तेल। मुस्लिम शासन के दौरान धार्मिक शोषण जोर -शोर पर था लेकिन प्रचलित अर्थव्यवस्था से छेड़छाड़ करने व जनमानस का विधिवत शोषण करने से से भारत में बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी। यह बेरोजगारी अंग्रेजों की देन थी। इस विषय पर दादाभाई नौरोजी और रजनी पाम दत्त ने अपनी पुस्तक में वर्णन किया है।

काम (सेक्स) का विचार किसी भी समाज को बहुत जल्दी प्रभावित कर लेता है। भारत में इसे लेकर वृहद फलक पर चिंतन वात्सायन के कामसूत्र, कोकशास्त्र आदि से लेकर अनेक धर्म ग्रंथों है। भारत एक गर्म जलवायु वाला देश है जहाँ सेक्स सामान्य वाला ही मान्य और सफल है। यदि 1990 के पूर्व का भारत देखें तो एक चीज कॉमन मिलेगी। पति-पत्नी मर्यादा की वजह से स्वयं के लिए एकांतिक समय बहुत कम दे पाते थे। फिर भी पति-पत्नी को अपने सेक्स सम्बन्ध को लेकर कभी शिकायत नहीं रही है।

1990 के बाद आये उदारवाद, मीडिया और सूचना क्रांति ने इंटरनेट को हाथ-हाथ पहुँचा दिया। जिससें पॉर्न सहज उपलब्ध हो गया। लोगों के मन पर वर्चुअली कब्जा हो गया।

सनातन हिन्दू धर्म किसी चीज की व्याख्या उसके पूर्णता में करता है। शरीर का भी विवेचन स्थूल, सूक्ष्म या प्राण शरीर में करता है। २५ तत्वों से मिलकर मनुष्य का निर्माण होना, अन्न और प्राण की व्याख्या, धार्मिक चिंतन से लेकर सामाजिक चिंतन, मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है आदि उसके चिंतन का स्वाभाविक हिस्सा है।

मनुष्य धरती पर सिर्फ खाने और मरने ही आता है? यह सनातन परम्परा के चिन्तन में है ही नहीं । वर्ण व्यवस्था के माध्यम से व्यक्ति के जन्म के साथ उसके जीवन निर्वाह के लिए रोजगार का सृजन जिससे जन्म लेने वाले ४० साल तक रोजगार की खोज में अपनी ऊर्जा न गवानी पड़े, कितनी ही अद्भुत व्यवस्था थी !! वर्ण-व्यवस्था के बिना हिन्दू धर्म की कल्पना नहीं जा सकती है।

समस्या यह है कि वर्ण को जन्म आधारित माना जाय या कर्म आधारित? वैदिक काल के शुरुआत में यह देखा गया वर्ण कर्म आधारित था। उस समय जनसंख्या कम थी आज एक बहुत बड़ी जनसंख्या चुनौती है यदि कर्म आधारित वर्ण मानेगे तो आज कर्म दिनभर बदलते हैं।

लोग जीवन में कई व्यवसाय बदलते है। इन परिस्थितियों में वर्ण की स्थापना कैसे होगी? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी की व्यवस्था के सुचारु निर्वहन की आवश्यकता है। व्यापार प्रधान युग में सभी वैश्य बनना चाहते है, सम्मान के लिए ब्राह्मण भी बनना चाहते है। पेशे से आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर आदि शूद्र वर्ग में आते हैं। इनमें से कितने है जो अध्यापक बनना पसन्द करेंगे, यह आप उनसे पूछ के देख सकते है।

सामाजिक व्यवस्था में देखें तो लड़की के रजस्वला होने पर विवाह का विधान है। १८ वर्ष तक वह पति के घर जाती थी। लड़के को २५ वर्ष बाद गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना होता था। इस उम्र का लाभ था व्याभिचार पर नियंत्रण और स्त्री-पुरुष अपनी अतिरिक्त ऊर्जा का क्षय किसी अन्य के विचार में न करें। अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था ने जो रोजगार का वादा किया, कर्मसंकरता को फैलाया, क्या वह आज रोजगार देने में सफल है ? उत्तर है- नहीं।

आज स्त्री-पुरुष सम्बन्ध दोयम दर्जे पर पहुँच चुका है जिसका कारण है आधुनिक बाजारवाद।

अंग्रेजों ने भारतीय व्यवस्था पर चोट करने के लिए एक चाटुकार व आश्रित वर्ग तैयार किया। राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले, पेरियार और भीमराव सकपाल आदि उनके एजेंट बने। इन्होंने सती प्रथा, आधुनिक शिक्षा, शूद्र का शोषण आदि मुद्दों के लिए एक विधिवत आवाज बना कर सनातन हिन्दू व्यवस्था को दोषी बना दिया। जबकि मुस्लिम और अंग्रेजों ने अपनी सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन की ओर ध्यान नहीं दिया कि वहाँ किस तरह औरतों व गुलामों की बिक्री के लिए बाजार लगाएं जाते थे। धर्म के नाम पर कत्ल-ए-आम किये गये जो आज भी बदस्तूर जारी है। रिलीजन, मजहब यह धर्म नहीं है। यह विशुद्ध राजनीतिक विचार है जिसमें लोगों की संख्या बढ़ाना और सत्ता की प्राप्ति है। इसके लिए लोग मरते हैं तो मर जायें।

हिन्दू धर्म मे नाना पंथ बन गये। सभी अपने को ईश्वर मानने का दावा कर रहे हैं। इनका मानना है वही पूरी तरह से सही और विद्वान है और बाकी सब मूर्ख। शब्दों में हिंसा आ गयी है उनके विचार को नहीं मानने पर वह कत्ल करने को तैयार है। सत्य की राह और सहजता खो चुकी है।

हिन्दू धर्म में गणित, विज्ञान, ज्योतिष, खगोलिकी, कला और काम की शिक्षा एक साथ दी जाती थी। जिससें मनुष्य का सम्पूर्ण विकास हो।

एलोरा से लेकर खजुराहों, कोणार्क, मोढ़ेरा आदि मंदिरों तक वासना (काम कला) का चित्रांकन किया गया। यह सहज स्फूर्ति थी कि जिन लोगों की वासना शांत नहीं हुई वह उसे समझें और सहज बनें। उसके लिए आडम्बर की जरूरत नहीं है। मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य को पूर्ण कर सके । जिस दिन हिन्दू १० प्रतिशत धार्मिक हो गया उसकी समस्या का समाधान हो जायेगा।

विश्व में फैली हिंसा पर रोक सिर्फ सनातन हिन्दू व्यवस्था से ही हो सकता है। लोगों का शोषण हो रहा है। मजहब के नाम पर लाखों मारे जा रहे हैं। आधुनिकता के नाम नारियों को मसला जा रहा है। स्वाद के नाम पर सभी तरह के जीवों को भोजन की थाली में परोसा जा रहा है। इन सबके लिए अपने कुतर्क गढ़ लिए गये हैं।

व्यक्ति की पहचान कागज का टुकड़ा भर रह गया है। विश्व के लम्बरदारों को इन हितों की पूर्ति करने पर पुरस्कार से नवाजते है। आप के मामले में उनका दृष्टिकोण अपने हितों की पूर्ति है। यह प्रकृति आज की व्यवस्था से रुष्ट हो चुकी है सर्वत्र शोषण और झूठ का व्यापार जमा लिया गया है। प्रकृति मनुष्य की सीमा को बारम्बार बता रही है किंतु मनुष्य सब रौंद कर लाभ चाहता है। लोभ और दुष्प्रचार आधारित व्यवस्था को समाज में कितने दिन रोपित करेंगे !! जिसको देखो, वही अपनी ढ़ोल पीट रहा है। कौन मर रहा है, कौन जी रहा है, ये मायने नहीं रखता है; मायने है कि किसका व्यापार चल रहा है!!

हिन्दू व्यवस्था को हिन्दू भूल चुका है।एक समय धरती पर हिन्दू धर्म अकेले था। तब हमें समानता,स्वतंत्रता,न्याय और लोकतंत्र की बैशाखी की जरूरत नहीं थी। एक-एक व्यक्ति महत्वपूर्ण था। आज की तरह भ्रामक विचार फैला कर लोगों का दोहन नहीं किया जाता था।

हिंदुओं को जगना होगा। बहुत देर हो चुकी है। प्रकृति और लोग कराह रहे है। लोगों को जाहिलियत और हैवानियत से बाहर लाकर मनुष्य बनाना होगा। ये यहूदी, ईसाई, मुस्लिम, कम्युनिस्टों से धरती को बहुत बड़ा संकट है।

आज कुछ लोग प्रयास कर रहे है सनातन हिंदू धर्म को मजहब और रिलीजन की तरह बनाने का। हिंदू को हिंसक बनाने का ,पर हिंसा से सिर्फ हिंसा का जन्म होता है। हम अपने मूल स्वभाव प्रेम को भूल जाएँ, ऐसा कभी नहीं हो सकता है। तुम्हारे कहने से हम नपुंसक नहीं होने वाले है। जब देश पर बर्बरों के आक्रमण की श्रृंखला लगी थी, तब भी मूल स्वभाव नहीं छोड़ते हुए अपने स्वधर्म की रक्षा की उसकी कीमत के लिए लाखों हिन्दू रणभूमि में खेत रहे थे।

अब कुछ वाचाल बताएँगे कि हिन्दू धर्म कैसा व्यवहार करेगा!! तुम्हारा जो संगठन है वह धन, मान के लिए है; सनातन के रक्षार्थ नहीं। पहले तुम धर्म धारण करो, नैतिकता का पालन करो और सीख बाँटते न फिरो। सनातनी जानता है कैसे रक्षा की जाती है!

कोई इकोसिस्टम बना रहा है कोईदेहात्मवाद,व्यवहारवाद
को सत्य मान पूंजीवादी परिपाटी को उपयोगी कहता है। व्यक्तिवाद और मानवतावाद की आड़ में लोकतंत्र के विचार को अधिरोपित करके बाजारवाद को संरक्षण दिया जा रहा है। जहाँ से पेट्रोल चाहिए वहाँ राजतंत्र ही ठीक है। जहाँ बाजार चाहिए वहाँ प्रजातंत्र का मीडिया के माध्यम से स्थापना की जाती है।

आधुनिक शिक्षा शोषण आधारित है जिससें निर्मित व्यक्ति दूसरे का खून चूसता है वह परजीवी में परिणित हो जाता है। इन दुर्व्यवस्था के बीच क्या आप को नहीं लगता है सनातन धर्म को विश्व की बागडोर संभालनी चाहिए?

अफ्रीका जैसे शानदार महादीप को अंधकार दीप और प्रयोग और परीक्षण स्थल न बनना पड़े। अमेरिका के मूल निवासियों को बायोरिजर्व में रहने पर विवश न होना पड़े। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के मूल निवासियों को किताबों में न खोजना पड़े। एशिया के देश सदा आपस में गुत्थमगुत्था न हो।

राम और कृष्ण पर संशय है! क्योंकि तुम्हें अपने होने पर संदेह है। राम और कृष्ण भारतीय संस्कृति के आदर्श है प्रणेता है और प्राण भी। तुम अभी भी धर्म के मर्म को नहीं समझे हो ,तुम्हारी पहुँच मजहब तक है। इस लिए पूर्व की मनुष्य प्रक्रिया से तुम रस्खलित हो चुके हो ,तुम्हें पुनः मानव धर्म में संस्कारित करना होगा।

यह धरती ,समुद्र ,आकाश के स्वामी नहीं हो जो दावा करता है प्रकृति उसे बर्बाद कर देती है। हो सकता है कुछ समय लग जाय। नेपोलियन और हिटलर इसका उदाहरण है उन्हें दुश्मनों ने नहीं बल्कि प्रकृति ने पराजित किया था।

आओ मिलकर विश्व को सनातन मार्ग पर ले चले उन्हें शांति,प्रेम,बन्धुता और अहिंसा का बोध कराये उनके बच्चे भी खुशहाली से रह सके।

मृत्यु से 🕷️मुलाकात…♨️


जीवन के महत्व को मृत्यु रेखांकित करती है एक चीज जो सोचने पर विवश किया है कि जिस प्रकृति का शोषण करके हम विकास का दावा कर रहे है वास्तव में वह विनाश है जिसमें भौतिक विकास का ढांचा खड़ा दिखता है सिवाय उस मनुष्य के जिसकी साँसे धीरे धीरे थम रही है।

हमें अपनी प्राथमिकता बदलनी पड़ेगी ,विकास प्रकृति में निहित है जिसे हमें संवहनीय तरीके से अर्जित करना है। जितनी भूमि,वायु,जल है यह सब की है। प्रकृति के साथ संतुलन बैठाने में ही मानव की भलाई है , नहीं तो ग्लेशियर,पहाड़,समुद्र की गहराई में तरह तरह के वैक्टीरिया और वायरस दफन है जो तुम्हारें कार्यो से बाहर आ रहे है ।

प्रकृति की विविधताओं को रौंदते हुए विकास की भूलभुलैया बना रहे है तरह तरह के जीव जंतु जो कि प्राकृतिक संतुलन के वाहन है,जिन्हें तुम भोजन मान है खा ले रहे है ,काश तुमने ऐसा नहीं किया होता है ये हैजा,चिकेन- स्माल पॉक्स ,फ्लू,इन्फ्लूएंजा, इबोला और कोरोना जैसे रोगाणु और विषाणु आज मानवता पर कहर बन कर न टूटते।

बुखार में मुझे कई दिन ऐसा लगा कि आज ये दवा लेकर लेट रहे है अब दुबारा नहीं उठेंगे। लेकिन जीवन में कुछ प्रियजन के प्रेम और हमारे कुछ पुण्य शेष थे जिससें यह पुर्नजन्म रूपी जीवन मिला है ईश्वर के आदेश से कि कुछ कार्य तुम्हारें शेष है पूरा करो। मेरी प्राथमिकताएं बदल गयी है । हाँ एक चीज और मेरी देवी जी का विश्वास बहुत मजबूत रहा है कि मैं अभी नहीं मर सकता हूँ।

नये जीवन का इस्तकबाल करना ही होगा ,कुछ तो करना होगा ,आगे की डगर का मांझी देखिये पतवार किधर ले जाता है।

जिंदगी की अबूझ पहेली..

जीवन और मौत के बीच बहुत महीन डोर का अंतर है अब देखना है मर कर मीले जीवन रूपी नैया को कहाँ तक ले जा पाते है।करती है वही सांसों की कीमत का एहसास कराती है। जिस सहजता से यह जीवन और प्रकृति प्राप्त हुई है उसी पर जब कोई संकट आता है हम बहुत जल्द जीवन जीना हराने लगते है सारे बने बनाये सिद्धांत रेत की ढेर की तरह दरकने लगते है। उस देव का स्मरण करते है कि मुझे इस भयंकर पीड़ा से उबारिये।

जब हमारे सारे करतब खत्म हो जाते है मुँह से बरबस निकलता है हारिये न हिम्मत विसारिये न राम।।

मैं नवरात्रि में व्रत पूरा करके कोविड के भय से दूर अपने काम पर लगा था प्रयाग से दूर दिल्ली के एक फ्लैट जिसे मैं कबूतर खाना कहता हूं। थोड़ा भी शंका न थी कि कोरोना अपनी जाल में हमें फंसा लेगा। बुखार आना शुरू हुआ।

कोविड के तहत ली जाने वाली दवा ,प्रयाग में भैया जो कोविड टीम में है हमें बता रहे थे हम एजथ्रोमाईसीन, आइवरमैक्टीन, डॉक्सी,जिंक,विटामिन सी,बी कॉम्प्लेक्स का पूरा 10 दिन का कोर्स किया। काढ़ा, भाँप, गुनगुना पानी फल,पौष्टिक भोजन और पॉजिटिव थिंकिंग के साथ ईश्वर में असीम आस्था रखा। लेकिन यह बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था। नींद आना बन्द हो गयी । घर से मैं बहुत दूर था कोई पास से मन की चिकित्सा करने वाला नहीं था। मैं घर में अपनी बीमारी भाई के अलावा किसी को नहीं बताया। घर में सभी लोग पहले से ही बुखार के चपेट में थे।

एक रात लगा कि यदि मैं पांचवी मंजिल के फ्लैट में मर गया तो मेरी लाश यही सड़ जायेगी।
मरना भला विदेश में जहाँ न अपना कोय। माटी खाय न कौवा अग्नि देय न कोय।।

रोज घर से सूचना फला रिश्तेदार पत्नी सहित आज मर गये, आज के दिन में रिश्तेदारी से चार लोग कम हुये है। न्यूज चैनल के खैर क्या कहने ,वह तो श्मशान की रूहानी कहानी बता-बता के कार्यक्रम जारी रखे है ,कोई मरे गिद्ध को लाश से मतलब है

दिल्ली में मौत का भयानक मंजर चल रहा था। ऑक्सीजन और इंजेक्शन का ऐसा खुला खेल फरुखाबादी जारी रहा है कि दलाल आपदा को अवसर में बदल कर मौत में मुनाफा निकाल रहे थे घिन आ रही थी कि इन्ही मनुष्यता के जमात के हम भी है जिसके लिए धन ही सब कुछ है तुम मरते हो , मर जाओं।

जीवन की आशा धूमिल होती जा रही थी मौत मेरे आस पास आशियाना बना चुकी थी,बार-बार कहती थी चलो तुम्हारा कार्य पूरा हुआ, मुझे भी लगने लगा था कि यह मौत सही कह रही थी।

मुझे माता-पिता और मेरी देवी का ख्याल बार-बार आता कि मेरे मरने पर यह कैसे जियेगें। परन्तु यह मौत है किसी के होने से इसके व्यवसाय पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

कोविड कैसे भी हो ,उसके विस्तार के कारण के पीछे चीन आदि कुछ भी हो सकता है फिर इसने विश्व भर की व्यवस्था की नकेल खोल दी। मानव को एकबार पुनः सोचने पर विवश किया है जिस प्रकृति का शोषण करके हम विकास का दावा कर रहे है वास्तव में वह विनाश है।

यह स्नायुतंत्र जो भौतिक विकास का ढांचा खड़ा दिखता है सिवाय उस मनुष्य के जिसकी साँसे धीरे धीरे थम रही है। हमें अपनी प्राथमिकता बदलनी पड़ेगी ,विकास प्रकृति में निहित है जिसे हमें संवहनीय तरीके से अर्जित करना है। जितनी भूमि,वायु,जल है यह सब की है।

प्रकृति के साथ संतुलन बैठाने में ही मानव की भलाई है , नहीं तो ग्लेशियर,पहाड़,समुद्र की गहराई में तरह तरह के वैक्टीरिया और वायरस दफन है जो तुम्हारें कार्यो से बाहर आ रहे है । विकास के नाम पर प्रकृति की विविधताओं को रौंदते हुए जिस विकास की भूलभुलैया बना रहे है । तरह-तरह के जीव जंतु जो कि प्राकृतिक संतुलन के वाहक है,जिन्हें तुम भोजन मान के खा रहे हो ,काश तुमने ऐसा नहीं किया होता है ये हैजा,चिकेन- स्माल पॉक्स ,फ्लू,इन्फ्लूएंजा, इबोला और कोरोना जैसे रोगाणु और विषाणु आज मानवता पर कहर बन कर न टूटते।

बुखार में मुझे कई दिन ऐसा लगा कि आज ये दवा लेकर लेट रहे है अब दुबारा नहीं उठेंगे। लेकिन जीवन में कुछ प्रियजन के प्रेम और हमारे कुछ पुण्य शेष थे जिससें यह पुर्नजन्म रूपी जीवन मिला है ईश्वर के आदेश से कि कुछ कार्य तुम्हारें शेष है पूरा करो।

मेरी प्राथमिकताएं बदल गयी है । हाँ एक चीज और मेरी देवी जी का विश्वास बहुत मजबूत रहा है कि मैं अभी नहीं मर सकता हूँ। नये जीवन का इस्तकबाल करना ही होगा ,अभी बहुत कुछ बाकी है ,आगे की डगर का मांझी पतवार ले लिया है। मौत सज-धज के आती है ,आखिर सत्य बन है । मुझे तो बहुत नीरश सी जान पड़ी। जिंदगी की जद्दोजहद में 20 दिन बाद जीवन ने फिर ताना बुना और कहा है कि आओ मिलकर एक बार फिर बगिया सजाते है।

जीवन और मौत के बीच बहुत महीन डोर का अंतर है क्या एक बीमारी इतना कमजोर कर देती है? हम मौत के मुसाफिर बनने के लिये स्वयं कहने लगते है इतना हैरान,परेशान और विवश! अब देखना है कि मर कर मिले इस जीवन रूपी नैया को कहाँ तक ले जा पाते है।

कोरोना और मनोचिकित्सा……

डॉक्टर कम है ,बेड कम है अस्पताल कम है बढ़ता कोरोना, डरते लोग । इस बीमारी की 90 प्रतिशत चिकित्सा अपनी सकारात्मकता है। मन से न डरना है न हरना ,मृत्यु का क्या है वह नियत समय पर आनी है मौत के पहले मौत की भगदड़ न करें।

कोरोना को पहले मन से निकाले, फिर तन से । भारत में डॉक्टर और बिस्तर कम हो सकते है अमेरिका,फ्रांस,इटली में नहीं फिर कम न थे, फिर भी मौत नहीं रुकी। लोगों के इलाज में डॉक्टरों की संख्या संक्रमित होने में तेजी से बढ़ी है।

हो सकता है जितने डॉक्टर है उसमें 20 प्रतिशत आने वाले समय में उपलब्ध रहे है। जिस तरह से संक्रमण की दर बढ़ रही है अभी और बढ़ने वाली है। महाराष्ट्र की तरह सरकार भी जल्द हाथ खड़े कर देगी। तब की स्थिति कितनी भयावह हो सकती है।

Pic भैंसा कुंड, लखनऊ

किसी स्थिति के बावजूद आप को इनर चिकित्सा यानि मन से मजबूत रहना है।

सीमित विकल्प है डरने से काम चलने वाला नहीं है जब तक जरूरी न हो घर को अस्पताल मान कर वही रहे। संघर्ष भूख और बीमारी का साथ ।एक लंबा दौर चल रहा कोविड का जो मानवता की परीक्षा के स्वयं को भी सफल करना है।

कोरोना से कोई 100 वर्ष पहले 1918 में विश्व युद्ध में मध्य यूरोप से लौटे सैनिक अपने साथ स्पेनिश फ्लू नामक संक्रामक बीमारी के लौटे । इसमें बीमारी ज्ञात इतिहास में मनुष्य के लिए सबसे बड़ी त्रासदी लागा ,जिसमें लगभग 2-5 करोड़ लोग मारे गये। स्पेनिश फ्लू में मृत्यु दर 35% तक थी।

स्पेनिश फ्लू का प्रथम विश्व में मरे एक करोड़ लोगों के बाद आया। कितना बड़ा संकट उस समय विश्व पर था। यह बीमारी युवाओं पर ज्यादा खतरनाक थी। यूरोप युवा पुरुष की भारी कमी हो गयी। इसी समय महिलाओं के घर से बाहर निकलने और अन्य विदेशी पुरुष से विवाह का अवसर मिला। क्योंकि यूरोप में नवयुवक असमय ही करोड़ो की संख्या में मर चुके थे।

इतिहास में एक और संक्रामक बीमारी चिकेन पॉक्स-स्माल पॉक्स जिसे भारत में बड़ी माता-छोटी माता कहा जाता है। समय- समय पर अपना तांडव मचाती रही है इस बीमारी ने विश्व भर में 30 करोड़ लोगों की मृत्य का कारण बनी। इसे रेड फ्लू भी कहा जाता है। भारत में इससे गांव के गांव खाली हो जाते थे। संक्रमण को रोकने के लिए अपने मरीज को उसी गांव में छोड़ कर लोग पलायन कर जाते थे।

इसी बीमारी का इलाज चीन में पल्लव राजकुमार बोधिधर्मन ने किया गया। आधुनिक विश्व में 1798 में जेनिंग के टीके के बाद विश्व इस पर विजय पायी।

इन बीमारियों को बताने का मतलब है मनुष्य के समक्ष चुनौतियां सदा रही है वह अपनी युक्ति से उसका सामना निकाला है। मनुष्य के संघर्ष में जीवन संचालित होता है। पीड़ा में रह कर मां सृष्टि का सृजन करती है। मनुष्य की सबसे बड़ी खासियत है वह विपरीत समय में बहुत अच्छा काम करता है।

अतः कोरोना से बचाव रखे ,न कि आतंकित हो। एक बात और जब तक आप जीवित हो दुनिया की कोई ताकत मार नहीं सकती है यदि आप मर गये, दुनिया की कोई ताकत जीवित नहीं कर सकती है। फिर डरना कैसा ? छुआछूत का पालन करें, मास्क और दो गज दूरी बनाएं रखे। घर को मन्दिर और अस्पताल दोनों समझ कर रहें, जबतक जरूरी न हो घर से बाहर न निकलें। " मन के हारे हार है मन जीते जीत"

कोरोना से दुनिया हाय हाय कर रही है फिर भी क्या मजाल लोगों के मन से लोभ,लालच और पाखंड कुछ देर का ही सही, निकल जाय।

कोविड की नई लहर में संक्रमण बहुत तेजी से बढ़ रहा है एक संक्रमित व्यक्ति 30% लोगों को संक्रमित कर सकता है । महाराष्ट्र की स्थिति राज्य के नियंत्रण से बाहर है वही दिल्ली के हालात जल्द ही इसी स्तर पर पहुँचने वाले है।

पिछले कुछ महीने पहले वाले कोरोना से ,यह भिन्न और ज्यादा ताकतवर लग रहा है , परिवार में एक को होने के बाद यह सभी लोगों को संक्रमित कर दे रहा है। मरने वाले एक पूरे परिवार सारे लोग भी हो सकते है।

कोरोना में सबसे आश्चर्य करने वाली बात है जिन राज्यों चुनाव है वहाँ जाने से डर जा रहा है। बड़ी-बड़ी चुनाव रैली का शोर सुन कर सीधे किसी संस्थान में घुस जाता है। नेता और उसकी पार्टी के कार्यकर्ता से बहुत भय खा कर बेसुध हो जाता है । कोरोना एक रहस्य बन गया।

खैर covid कोई अकेला नहीं जो नेताओं के सिस्टम से डरता है उसे सभी डरते है।

कोरोना से मुक्त होकर एक नई दुनिया का निर्माण होगा। कहते है कोविड कुल 2.5 करोड़ लोगों को मारने का संकल्प लेकर चली है।

कोरोना एक प्रकार के प्राकृतिक न्याय की तरह है । पिछले सदियों में प्रकृति युद्ध और प्राकृतिक आपदा से कुछ संतुलन बनाती थी। लेकिन अब युद्ध नहीं हो रहे है द्वैष अत्यधिक बढ़ने पर भी ,सीधे युद्ध से सभी बच रहे है।

मुस्लिम अल्लाह की सलाह मानकर जब तक जेहन में ताकत है ये आदम तू बच्चे होने दे…इसी सिद्धांत पर अमल जारी रखे है। प्रकृति के संतुलन स्थापित करने के क्रम में पीड़ा होती है। जो इस समय दिख रही है।

मनुष्य की मानवता ऐसी है कि अपने अनुरूप वह विचार और तर्क गढ़ लेता है। मांस के लिए पशु,पक्षियों की हत्या, बताइये किस तरह से सही है। खाने के लिए जबकि इतनी सारी चीजें प्रकृति ने दी रखी है।

चिंता का सबब यह है कि इस बार कोरोना का चरम क्या होगा , कितनी मौतों के बाद इस वायरस की भूख मिटेगी,कहा नहीं जा सकता है।

झूठा_इस्लाम…. ⛳

भारत के मुसलमानों के पास समय चल कर पुनः आया है वह इतिहास में इस्लामिक आक्रमणकरियों की गलतियों को सुधार सके । हिंदुओं के महत्वपूर्ण मन्दिर उन्हें वापस दे कर,800 साल से तलाश रहे मुस्लिम की स्वीकारता को समाज भी मान सकेगा। यदि विवाद को बढ़ा कर कोर्ट से ही न्याय मिलेगा तो वैमनस्यता और बढ़ती जायेगी। मुसलमान परस्पर समाजिक सहअस्तित्व चुनौती का सबब ही बना रहेगा। गंगा-जमुनी और हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई के अतीत की तरह खोखले नारे ही साबित होते रहेंगे।

मुसलमान सच्चाई से भाग नहीं सकता है जैसे बामपंथी इतिहासकार सच्चाई छुपा नहीं पाएँ । सत्ता उनके पास नहीं है ,जो मुस्लिम ठेकेदारों की गैरवाजिब मांगो को मान ले। हकीकत से रूबरू होने से मुसलमान कब तक बचेगा।

काशी,मथुरा,आयोध्या,अटलादेवी, विजगगढ़, रुद्रमहालय,धार ,कुतुबमीनार, अढ़ाई दिन का झोपड़ा,तेजोमहल की वास्तविकता जानते हुए विवाद करना , मुसलमान को जहन्नुम की आग में जलायेगा।

मजेदार बात यह है कि मुसलमान किसी जांच से पीछे क्यों भाग रहा है ? कारण छुपाई गयी सच्चाई अयोध्यामन्दिर की तरह बाहर आ जायेगी।

कई मुस्लिम और मुस्लिम परस्त कहते है सब में हिंदु- मुस्लिम क्यू? सीधा सा उत्तर है मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा कब्जाई सभी मन्दिर वापस कर दो। फिर तुम्हें हिन्दू-मुस्लिम कुछ न लगेगा। यह झूठे का डर है जो बार बार निकल आता है। अब गजनवी,बाबर,औरंगजेब की कारगुजारी मिट्टी में मिल जायेगी। अतीत का स्वप्न वर्तमान की सीढ़ी नहीं चढ़ता है।

दो ध्रूवों को प्रयोगशाला🏹 To Pole Laboratory

अफ्रीका, एक ऐसा खूबसूरत महादीप जिसे प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है लेकिन यह यूरोप,एशिया और अमेरिका की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं पाया।

अफ्रीका एक सनातन परंपरा वाला महाद्वीप है जो अपनी मान्यताओं के साथ प्रकृति पर विश्वास करता था।

समय के साथ रोमन साम्राज्य का विस्तार अफीका तक पहुँचा। चौथी सदी में एक्शन साम्राज्य के समय यहाँ ईसाई धर्म और सातवीं सदी में मुस्लिम धर्म लाया गया। आज के अफ्रीकी डेमोग्राफ में 45 फीसदी मुस्लिम, 40 फीसदी ईसाई और 15 फीसदी में हिंदु सहित अन्य धर्म हैं।

लिखित इतिहास में मनुष्य की उत्पत्ति होमो सीपियंस और होमो इरेक्ट्स यही से माने जाते हैं जो बाद में विकसित हो कर मानव बन गये।

यह विकास अंग्रेजों का दिया है। वास्तविकता के धरातल पर बन्दर से मनुष्य का विकास संभव नहीं है। यही विकास क्रम रहता तो आज भी संभव होता, जैसा कि नहीं है।

अफ्रीका महाद्वीप बताने का तात्पर्य यह है कि किस प्रकार से यह ध्रुवों की प्रयोगशाला के रूप इस्तेमाल होता रहा है। वह कैसे अंधकार महादीप बन गया। उसकी मौलिकता को अपहृत किया गया।

प्राकृतिक रूप से जीने वालों को लूटने के लिये ईसाइयों और मुस्लिमों ने यहाँ अपने-अपने टेंट गाड़े और फिर यह खेमा बंदी में बदल गया। इस्लाम के पूर्व अफ्रीका की व्यापारिक चौकी यमन था किंतु इस्लाम के साथ ही अफ्रीका की सीमा सीमित कर दी गयी।

दूसरी तरफ से ईसाई पहले ही वह प्रयास शुरू कर चुके थे।विदेशी पंथ अफ्रीका की धरती पर उगाये गये। अफ्रीका को निचोड़ने का काम विदेशी सत्तायें करती रहीं।

मध्यकाल में मोरक्को का यात्री इब्नबतूता मुहम्मद बिन तुगलक के समय 14 वीं सदी में भारत आया । उसने भारत के समाज, मौसम और फलों विशेषकर आम का विशद वर्णन अपनी पुस्तक “रेहला” में किया है।

समय के साथ पुर्तगाली और डचों ने अपनी कालोनियां बना ली। फिर आया ब्रिटिश और फ्रांसीसी दौर। कार्य वही था गुलाम बनाना, प्राकृतिक संसाधनों की चोरी।

आज अफ्रीका में यूरोपीय शासन का अंत हो चुका है और सभी 53 देश स्वतंत्र है । गरीबी जारी है। दो धुवों की जगह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और रूस ने संभाल ली।

शीत युद्ध के खत्म होने के साथ सोवियत यूनियन का पराभव हो गया। अमेरिका का एक छत्र राज हो गया। वही ब्रिटिश और फ्रांसीसी प्रभाव कायम रहा। यह पूरा क्ष्रेत्र मिशनरियों के लिए सैरगाह की तरह रहा।

नयी सदी एक नये खिलाड़ी चीन को लेकर आया। चीन ने अपने आर्थिक मुनाफे को अफ्रीका में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम से प्रचारित कर प्राकृतिक संसाधनों की चोरी शुरू की। गरीब देश विरोध नहीं कर पा रहे हैं।

अफ्रीका यूरोप, अमेरिका, चीन का प्रैक्टिकल फील्ड है दवा, नशा या नया प्रयोग जैसी मर्जी हो करिये। मनुष्य जीवन की कीमत एक बकरी और दो जून की रोटी से अधिक नहीं है।

अफ्रीका में खुशहाली की कुछ गिनी-चुनी जगहें हैं जिनमें दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और अल्जीरिया को शामिल किया जा सकता है। बाकी देश में मिलीशिया, आतंकवादी,समुद्री लुटेरे, मानव तस्कर, छोटी लड़कियों के व्यापारी सक्रिय है। बाकी जो पाप बचता है उसे सैनिक तानाशाह पूरा कर देता है। आये दिन छोटे-छोटे देश के अंदर से लेकर सीमा तक हिंसात्मक टकराव होते रहते है।

अफ्रीका महादीप को लूटने की जद्दोजहद में शक्तिशाली देश रहे है। और इतना सब अफ्रीका के नाम पर करने.के बाद भी धरातल पर उनके जीवन के बेहतरी का कोई प्रयास नहीं है।

पेट की भूख के लिए अफ्रीकन हाथ बांधे खड़े है। उनकी कोई आवाज विश्व में नहीं है। उसके हिस्सें में दूसरे की सेवा लिखी है क्योंकि काले लोग है। उनका दोष अफ्रीका का मूल निवासी होना।

विश्व में एक देश भारत ही ऐसा है जो शोषण की जगह पोषण , मानवीय मूल्यों का तरज़ीह देता है। भारत विश्व की महाशक्ति और नेता बनता है। उससे सबसे बड़ा लग बेजुबान देशों को आवाज मिलेगी। उनकी बेहतरी लिए काम होगा। अफ्रीकी देशों को भारत पर पूरा भरोसा है।

मौर्य सम्राट विन्दुसार के समय अफ्रीका से ईसा से 300 वर्ष पूर्व सम्बन्ध स्थापित किये थे। मिस्र के नरेश टॉलमी फिलाडेल्फस ने डायनोसिस को दूत बना कर भेजा।

सीरिया के शासक एण्टियोकस ने डायमेकस नामक राजदूत बिंदुसार के दरबार में भेजा। बिंदुसार ने सीरिया से मीठी मदिरा, सूखी अंजीर के बदले भारत से वहाँ दार्शनिक भेजने के लिये पत्र लिखा था।

प्राचीन अफ्रीकी लोगों ने खनन कर प्रसंस्कृत धातुओं का निर्माण किया। सोना चांदी,तांबा, कांस्य, लोहा,मिट्टी के बने सुंदर पात्र निर्मित किये।

रोमन,भारत और अरब देशों के जहाज यहाँ से गुलामों, हाथीदांत,सोने,पन्ना,जानवरों की खाल,दरियाई घोड़े और विभिन्न जानवरों का आयात करते थे।

अक्सुमाइट साम्राज्य अफ्रीका में दसरी शताब्दी में स्थापित हुआ। जिसमें अरब देशों के हिस्से भी शामिल था। एक्सुमाइट राजदूत मिश्र,अरब और भारत गये।

12 वीं सदी में माली जो पूर्व में घाना का सामन्त राज्य था, में एक बड़े साम्राज्य की स्थापना हुई जिसकी राजधानी टिम्बकटू थी। इसके सुल्तान विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति शासक मनसा मूसा थे जिनकी कुल सम्पत्ति 4 लाख मिलियन अमेरिकी डॉलर थी। भारत के संदर्भ में 40 लाख डॉलर मुकेश अम्बानी से लगभग 300 गुना ज्यादा।

अरियो और हाइलैंड्स का साम्राज्य इथियोपिया में सोंगई पूर्वी अफ्रीका में। मेडागास्कर में इमेरिन। स्वाहिली साम्राज्य युगांडा क्षेत्र में । नूबिया और कार्थेज राज्य। एक्सम शासन में 330 ईसवी में ईसाई धर्म का प्रवेश हुआ था।

पशुपालन में गाय, बकरी,भेड़ आदि का किया जाता था कृषि में बाजरा,गेंहू,कपास आदि होती थी। फल में अंजीर,जामुन,नींबू,आबनूस होते थे।

अफ्रीकी लोग प्राकृति प्रेमी और मस्त थे किंतु ईसाई और मुस्लिम की ललचाई शातिर व्यवस्था ने अंधकार दीप और कालों का देश बना दिया। नील नदी

अफ्रीका में धर्म देखें तो 85 फीसदी लोग मुस्लिम या ईसाई है फिर भी अशांति का कारण है। ये दोनों धर्म के स्तर पर असफल विचार धाराएँ हैं। इन दोनों के लिए खुशहाली का मतलब यूरोप के चंद देश और अरब है।

मध्यकाल में मुस्लिमों की लूट से ये उबर न पाये। आधुनिक काल में यूरोपीय ईसाइयों की लूट से इच्छापूर्ति नहीं हुई। ये चालाक थे और उपनिवेश के साथ वहाँ व्यापार विकसित कर दिए जिससे शोषण आज भी बना हुआ है।

धर्म का सहारा लेकर अफ्रीकी सम्पदा की लगातार चोरी होती रही और मूलवासियों को यातनाएँ मिलती रही है । भारत के देर से पहुँचने से ये लूट,बर्बरता अभी तक चालू है। भारत पूरे अफ्रीका को सनातन संस्कृति से रोशन करे। इन प्राकृतिक लोगों को खुशहाल जीवन जीने की ओर ले चले।

अफ्रीका शब्द बर्बर भाषा के इफ्री से हुआ है जिसका अर्थ है गुफा । इसीलिए इसे गुफा में रहने वालों का देश कहा गया।
डेंसमण्ड टूटू ने अंग्रेजों के लिए कहा था- उनके पास बाइबिल थी हमारे पास जमीन। जब उन्होंने बाइबिल की कहानी सुनाई तो आंख बंद हो गई। आंख खुली तो बबइबिल हाथ में थी जमीन उनके पास।

अलबरूनी गजनवी के लिए कहता है कि अल्लाह रहमत बक्से गजनवी को जिसने भारत की हँसती- खेलती संस्कृति को उजाड़ दिया।

अफ्रीका की प्राकृतिक सुंदरता मनोहर है।नदियों में नील जिसे अफ्रीका की जीवन रेखा कहा जाता है, बहुत सुंदर है। और कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ हैं– जैम्बेजी,जूना,रुबका, लिंपोपो तथा शिबेली। कुछ प्यारी बड़ी झीलें हैं- चाड,विक्टोरिया,वोल्टा आदि। पर्वतों में एटलस,किलमिंजारो, ड्रैकेन्सवर्ग,कैमरून और काला हारी महत्वपूर्ण हैं। कालाहारी,सहारा जैसे रेगिस्तान तो वहीं सवाना जैसे वन। और उष्णकटिबंधीय सदाबहार जलवायु जैसे भारत ही लगता है। कर्क, विषुवत तथा मकर तीनों रेखा यहाँ से गुजरती है।

मैंने कब ऐसा सोचा कि मुझें तुम खुशियां दो।

मैं सिर्फ जुड़ना चाहता था मैं एक होने की अनुभूति चाहता था

मेरी पीर तुम्हारें में तुम्हारी मेरे में होने लगे।

मनुष्य चालक और शातिर भी वह साथ ही सहज और सरल भी हो सकता है।

तुम सिर्फ अपने मन का देखती हो मेरे मन क्या!

तुम दुनियावी दुःख का कारण मुझे कैसे मानती हो।

मैंने कभी किसी को तकलीफ देने के विषय में नहीं सोचा।
क्या तुम्हें मेरा मेरा प्यार नहीं दिखता।

उम्र भले बढ़ती गयी हो हम जिसे प्यार करते है उसके लिए बच्चों से मासूम हो है।

प्यार के मामले में उससे माँ वाली फीलिंग चाहते है।

तुम इतना क्यों सोचती हो। मेरे पुरुष होने का तुम्हें इतना सुबा है।

मेरे में भी एक कोमल मन है जैसा तुम रखती हो तुम जिस तरह अपने लिए चाहती हो उसी तरह मैं भी चाहता हूँ।

एक होने का मतलब है मेरे तुम्हारे अहम का चला जाना।

जीवन एक बार का मिला है हम जीते कैसे यह ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाय हम मरते कैसे है?

तुम चाहों तो सब बदल सकता है लेकिन तुम्हारा तुम मेरे मैं आना नहीं चाहता है।

बड़ा आसान मैं और तुम चलो हम बन जाते है।

मेरे राम तेरे राम….

तुम किसको राम कहते हो- राम का मतलब भारत से है अरे मुकुट और धनुष लिए ही नहीं बल्कि मैली सी धोती पहना किसान ,कुर्ता पहना मास्टर या कहे टिफिन लिए ऑफिस जाता वह आदमी जिसे लौटते समय माँ चश्मे,पत्नी की दवाई और बच्चों की किताबें लाना है। इन सबमें राम है।

वैसे तो बहुत से लोगों के मन में राम का जिक्र होते ही भगवा कपड़ा पहने कुछ दिखने लगता है बहुतों को चिढ़ मचती है इसी राम की वजह से उसकी बनी बनाई सत्ता चली गयी। जिस सत्ता रूपी मुर्गी से कुल जमां तीन पीढ़ी निकल गयी थी। ये ससुरा राम को कुदा दिया..।अब लौंडा कौन सा रोजगार ढूढे उसे कुछ आता नहीं सिवा चूतिया बना के कुर्सी पाने के। अरे भाई वह खून से जो पाया है। राम के नाम पर दुकानें चलाने वाले भी हो गये है। ऐसा कुछ नेता जी टाइप के लोग कहते है।

खैर हमें राजनीति से क्या? हम बताते है राम क्या है मेरे लिए…मैं बहुत छोटा था अभी स्कूल जाना शुरू किया था कि बड़े भाई के साथ हनुमान चालीसा गाते-गाते याद हो गई थी । हनुमान जैसे कि हर बच्चे के हीरों बचपन में रहते है,उम्र इतनी थी कि दोनों भाई मिलकर शर्त लगाते थे कि किसका मूत्र आगे जायेगा🙃

राम पर थे ये कहा चले गये। बचपन में ही घर में सुंदरकांडका पाठ शनिवार को घर में होता था। स्कूल से एक दिन आया तो बाबरी टूट गयी ऐसा दादी ने बताया। यह भी कहा कि वहाँ भव्य राम मन्दिर बनेगा। मैंने दादी से पूछा राम को भगवान जी क्यों कहते है। दादी- उन्होंने धर्म की रक्षा की पापी और दुष्टों को दण्ड दिया। मैंने कहा क्या इतने से कोई भगवान हो जायेगा?

दादी- वह भक्तों पर बहुत कृपा करते है वह करुणा के सागर है। मैं- वह कहाँ रहते है क्यों नहीं दिखते है? दादी भक्तों के ह्रदय और सबको ऐसे ही दिखते रहेंगे तो यह बहुत चालक मानव है उन्हें अपने को भगवान सिद्ध करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और मानव नित्य एक सबूत मांगेगा आज के नेता की तरह।

दादी जैसे मुझे मिलना हो राम भगवान से तब क्या करें
दादी-अच्छे काम करो,भगवान को स्मरण करते रहो, दीन दुःखियों की सेवा करों। मैंने कहा कि इसे हम कर सकते है। राम मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है तुम्हारे लिए राजनीति हो सकती है।

विवेकानंद जी ने राम के बारे में शिकागो में कहा था कि जब तक भारत में एक पुरुष और एक महिला जीवित है तब तक राम और सीता जीवित है। सीता-राम सदैव सनातनियों के आदर्श है और रहेंगे।

कुछ उच्चश्रृंखल लोगों की वाचालता से राम पर कोई आंच आने वाली नहीं है। इस धरती पर राम पर प्रश्न अब तक सबसे ज्यादा उठे है फिर भी वह हम सबके आदर्श है। गांधी जी ने लोकतंत्र की नहीं रामराज्य की बात की थी। जहाँ सब सुखी रहे मनुष्य तो मनुष्य, कुत्ता भी न्याय पा सके। शेर और बकरी एक घाट पानी पिये।

राम जिसमें रमन और मरण समाहित है सृष्टि का आदि अंत निरन्तर चलता रहता है । वैसे ये तुम्हारी समझ में नहीं आयेगा क्योंकि तुम उदारवादी पंथी हो। राम सहजता और प्रेम का विषय है जो तुम्हारे बस का नहीं है।

मानव की खोपडिया भागती बहुत है वह दानी की जगह ग्राही सिस्टम को जोर से एक्टिवेट किया है उसे सबमें लाभ चाहिए,इसमें क्या फायदा पहला प्रश्न होता है? कुछ कम ऐसे है जिन्हें तुम बिना लाभ के करते हो जैसे नशा,बकैती,सोसल मीडिया इत्यादि। एक बार राम में प्रीति करके देखों ये तुम्हें एक्टिवेट कर देगा। राजनीति करो उसकी पूछ पकड़ के लटके न रहो। तुम्हारे में कुछ जीवित है जो तुम्हे ढूढ़ रहा है तुम हो कि कुछ बाहर ढूढ़ रहे है।

जब अंदर बाहर एक बराबर जब हो जायेगा उस समय तुम्हें समानता,स्वतंत्रता और न्याय के लिए संग्राम की आवश्कता नहीं पड़ेगी।

बिना कारण कुछ नहीं होता इसकी सिद्धि विज्ञान से चाहो तो कर लो।यह विश्वास की तुम हो यह जगत भी है तुम्हें बनाने वाले तुम्हारें माता पिता है तो इस जगत का भी कोई माता पिता भी होगा । उसे ही हम राम कहते है तुम क्या कहते हो?