कोरोना और मनोचिकित्सा……

डॉक्टर कम है ,बेड कम है अस्पताल कम है बढ़ता कोरोना, डरते लोग । इस बीमारी की 90 प्रतिशत चिकित्सा अपनी सकारात्मकता है। मन से न डरना है न हरना ,मृत्यु का क्या है वह नियत समय पर आनी है मौत के पहले मौत की भगदड़ न करें।

कोरोना को पहले मन से निकाले, फिर तन से । भारत में डॉक्टर और बिस्तर कम हो सकते है अमेरिका,फ्रांस,इटली में नहीं फिर कम न थे, फिर भी मौत नहीं रुकी। लोगों के इलाज में डॉक्टरों की संख्या संक्रमित होने में तेजी से बढ़ी है।

हो सकता है जितने डॉक्टर है उसमें 20 प्रतिशत आने वाले समय में उपलब्ध रहे है। जिस तरह से संक्रमण की दर बढ़ रही है अभी और बढ़ने वाली है। महाराष्ट्र की तरह सरकार भी जल्द हाथ खड़े कर देगी। तब की स्थिति कितनी भयावह हो सकती है।

Pic भैंसा कुंड, लखनऊ

किसी स्थिति के बावजूद आप को इनर चिकित्सा यानि मन से मजबूत रहना है।

सीमित विकल्प है डरने से काम चलने वाला नहीं है जब तक जरूरी न हो घर को अस्पताल मान कर वही रहे। संघर्ष भूख और बीमारी का साथ ।एक लंबा दौर चल रहा कोविड का जो मानवता की परीक्षा के स्वयं को भी सफल करना है।

कोरोना से कोई 100 वर्ष पहले 1918 में विश्व युद्ध में मध्य यूरोप से लौटे सैनिक अपने साथ स्पेनिश फ्लू नामक संक्रामक बीमारी के लौटे । इसमें बीमारी ज्ञात इतिहास में मनुष्य के लिए सबसे बड़ी त्रासदी लागा ,जिसमें लगभग 2-5 करोड़ लोग मारे गये। स्पेनिश फ्लू में मृत्यु दर 35% तक थी।

स्पेनिश फ्लू का प्रथम विश्व में मरे एक करोड़ लोगों के बाद आया। कितना बड़ा संकट उस समय विश्व पर था। यह बीमारी युवाओं पर ज्यादा खतरनाक थी। यूरोप युवा पुरुष की भारी कमी हो गयी। इसी समय महिलाओं के घर से बाहर निकलने और अन्य विदेशी पुरुष से विवाह का अवसर मिला। क्योंकि यूरोप में नवयुवक असमय ही करोड़ो की संख्या में मर चुके थे।

इतिहास में एक और संक्रामक बीमारी चिकेन पॉक्स-स्माल पॉक्स जिसे भारत में बड़ी माता-छोटी माता कहा जाता है। समय- समय पर अपना तांडव मचाती रही है इस बीमारी ने विश्व भर में 30 करोड़ लोगों की मृत्य का कारण बनी। इसे रेड फ्लू भी कहा जाता है। भारत में इससे गांव के गांव खाली हो जाते थे। संक्रमण को रोकने के लिए अपने मरीज को उसी गांव में छोड़ कर लोग पलायन कर जाते थे।

इसी बीमारी का इलाज चीन में पल्लव राजकुमार बोधिधर्मन ने किया गया। आधुनिक विश्व में 1798 में जेनिंग के टीके के बाद विश्व इस पर विजय पायी।

इन बीमारियों को बताने का मतलब है मनुष्य के समक्ष चुनौतियां सदा रही है वह अपनी युक्ति से उसका सामना निकाला है। मनुष्य के संघर्ष में जीवन संचालित होता है। पीड़ा में रह कर मां सृष्टि का सृजन करती है। मनुष्य की सबसे बड़ी खासियत है वह विपरीत समय में बहुत अच्छा काम करता है।

अतः कोरोना से बचाव रखे ,न कि आतंकित हो। एक बात और जब तक आप जीवित हो दुनिया की कोई ताकत मार नहीं सकती है यदि आप मर गये, दुनिया की कोई ताकत जीवित नहीं कर सकती है। फिर डरना कैसा ? छुआछूत का पालन करें, मास्क और दो गज दूरी बनाएं रखे। घर को मन्दिर और अस्पताल दोनों समझ कर रहें, जबतक जरूरी न हो घर से बाहर न निकलें। " मन के हारे हार है मन जीते जीत"

कोरोना से दुनिया हाय हाय कर रही है फिर भी क्या मजाल लोगों के मन से लोभ,लालच और पाखंड कुछ देर का ही सही, निकल जाय।

कोविड की नई लहर में संक्रमण बहुत तेजी से बढ़ रहा है एक संक्रमित व्यक्ति 30% लोगों को संक्रमित कर सकता है । महाराष्ट्र की स्थिति राज्य के नियंत्रण से बाहर है वही दिल्ली के हालात जल्द ही इसी स्तर पर पहुँचने वाले है।

पिछले कुछ महीने पहले वाले कोरोना से ,यह भिन्न और ज्यादा ताकतवर लग रहा है , परिवार में एक को होने के बाद यह सभी लोगों को संक्रमित कर दे रहा है। मरने वाले एक पूरे परिवार सारे लोग भी हो सकते है।

कोरोना में सबसे आश्चर्य करने वाली बात है जिन राज्यों चुनाव है वहाँ जाने से डर जा रहा है। बड़ी-बड़ी चुनाव रैली का शोर सुन कर सीधे किसी संस्थान में घुस जाता है। नेता और उसकी पार्टी के कार्यकर्ता से बहुत भय खा कर बेसुध हो जाता है । कोरोना एक रहस्य बन गया।

खैर covid कोई अकेला नहीं जो नेताओं के सिस्टम से डरता है उसे सभी डरते है।

कोरोना से मुक्त होकर एक नई दुनिया का निर्माण होगा। कहते है कोविड कुल 2.5 करोड़ लोगों को मारने का संकल्प लेकर चली है।

कोरोना एक प्रकार के प्राकृतिक न्याय की तरह है । पिछले सदियों में प्रकृति युद्ध और प्राकृतिक आपदा से कुछ संतुलन बनाती थी। लेकिन अब युद्ध नहीं हो रहे है द्वैष अत्यधिक बढ़ने पर भी ,सीधे युद्ध से सभी बच रहे है।

मुस्लिम अल्लाह की सलाह मानकर जब तक जेहन में ताकत है ये आदम तू बच्चे होने दे…इसी सिद्धांत पर अमल जारी रखे है। प्रकृति के संतुलन स्थापित करने के क्रम में पीड़ा होती है। जो इस समय दिख रही है।

मनुष्य की मानवता ऐसी है कि अपने अनुरूप वह विचार और तर्क गढ़ लेता है। मांस के लिए पशु,पक्षियों की हत्या, बताइये किस तरह से सही है। खाने के लिए जबकि इतनी सारी चीजें प्रकृति ने दी रखी है।

चिंता का सबब यह है कि इस बार कोरोना का चरम क्या होगा , कितनी मौतों के बाद इस वायरस की भूख मिटेगी,कहा नहीं जा सकता है।

झूठा_इस्लाम…. ⛳

भारत के मुसलमानों के पास समय चल कर पुनः आया है वह इतिहास में इस्लामिक आक्रमणकरियों की गलतियों को सुधार सके । हिंदुओं के महत्वपूर्ण मन्दिर उन्हें वापस दे कर,800 साल से तलाश रहे मुस्लिम की स्वीकारता को समाज भी मान सकेगा। यदि विवाद को बढ़ा कर कोर्ट से ही न्याय मिलेगा तो वैमनस्यता और बढ़ती जायेगी। मुसलमान परस्पर समाजिक सहअस्तित्व चुनौती का सबब ही बना रहेगा। गंगा-जमुनी और हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई के अतीत की तरह खोखले नारे ही साबित होते रहेंगे।

मुसलमान सच्चाई से भाग नहीं सकता है जैसे बामपंथी इतिहासकार सच्चाई छुपा नहीं पाएँ । सत्ता उनके पास नहीं है ,जो मुस्लिम ठेकेदारों की गैरवाजिब मांगो को मान ले। हकीकत से रूबरू होने से मुसलमान कब तक बचेगा।

काशी,मथुरा,आयोध्या,अटलादेवी, विजगगढ़, रुद्रमहालय,धार ,कुतुबमीनार, अढ़ाई दिन का झोपड़ा,तेजोमहल की वास्तविकता जानते हुए विवाद करना , मुसलमान को जहन्नुम की आग में जलायेगा।

मजेदार बात यह है कि मुसलमान किसी जांच से पीछे क्यों भाग रहा है ? कारण छुपाई गयी सच्चाई अयोध्यामन्दिर की तरह बाहर आ जायेगी।

कई मुस्लिम और मुस्लिम परस्त कहते है सब में हिंदु- मुस्लिम क्यू? सीधा सा उत्तर है मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा कब्जाई सभी मन्दिर वापस कर दो। फिर तुम्हें हिन्दू-मुस्लिम कुछ न लगेगा। यह झूठे का डर है जो बार बार निकल आता है। अब गजनवी,बाबर,औरंगजेब की कारगुजारी मिट्टी में मिल जायेगी। अतीत का स्वप्न वर्तमान की सीढ़ी नहीं चढ़ता है।

दो ध्रूवों को प्रयोगशाला🏹 To Pole Laboratory

अफ्रीका, एक ऐसा खूबसूरत महादीप जिसे प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है लेकिन यह यूरोप,एशिया और अमेरिका की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं पाया।

अफ्रीका एक सनातन परंपरा वाला महाद्वीप है जो अपनी मान्यताओं के साथ प्रकृति पर विश्वास करता था।

समय के साथ रोमन साम्राज्य का विस्तार अफीका तक पहुँचा। चौथी सदी में एक्शन साम्राज्य के समय यहाँ ईसाई धर्म और सातवीं सदी में मुस्लिम धर्म लाया गया। आज के अफ्रीकी डेमोग्राफ में 45 फीसदी मुस्लिम, 40 फीसदी ईसाई और 15 फीसदी में हिंदु सहित अन्य धर्म हैं।

लिखित इतिहास में मनुष्य की उत्पत्ति होमो सीपियंस और होमो इरेक्ट्स यही से माने जाते हैं जो बाद में विकसित हो कर मानव बन गये।

यह विकास अंग्रेजों का दिया है। वास्तविकता के धरातल पर बन्दर से मनुष्य का विकास संभव नहीं है। यही विकास क्रम रहता तो आज भी संभव होता, जैसा कि नहीं है।

अफ्रीका महाद्वीप बताने का तात्पर्य यह है कि किस प्रकार से यह ध्रुवों की प्रयोगशाला के रूप इस्तेमाल होता रहा है। वह कैसे अंधकार महादीप बन गया। उसकी मौलिकता को अपहृत किया गया।

प्राकृतिक रूप से जीने वालों को लूटने के लिये ईसाइयों और मुस्लिमों ने यहाँ अपने-अपने टेंट गाड़े और फिर यह खेमा बंदी में बदल गया। इस्लाम के पूर्व अफ्रीका की व्यापारिक चौकी यमन था किंतु इस्लाम के साथ ही अफ्रीका की सीमा सीमित कर दी गयी।

दूसरी तरफ से ईसाई पहले ही वह प्रयास शुरू कर चुके थे।विदेशी पंथ अफ्रीका की धरती पर उगाये गये। अफ्रीका को निचोड़ने का काम विदेशी सत्तायें करती रहीं।

मध्यकाल में मोरक्को का यात्री इब्नबतूता मुहम्मद बिन तुगलक के समय 14 वीं सदी में भारत आया । उसने भारत के समाज, मौसम और फलों विशेषकर आम का विशद वर्णन अपनी पुस्तक “रेहला” में किया है।

समय के साथ पुर्तगाली और डचों ने अपनी कालोनियां बना ली। फिर आया ब्रिटिश और फ्रांसीसी दौर। कार्य वही था गुलाम बनाना, प्राकृतिक संसाधनों की चोरी।

आज अफ्रीका में यूरोपीय शासन का अंत हो चुका है और सभी 53 देश स्वतंत्र है । गरीबी जारी है। दो धुवों की जगह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और रूस ने संभाल ली।

शीत युद्ध के खत्म होने के साथ सोवियत यूनियन का पराभव हो गया। अमेरिका का एक छत्र राज हो गया। वही ब्रिटिश और फ्रांसीसी प्रभाव कायम रहा। यह पूरा क्ष्रेत्र मिशनरियों के लिए सैरगाह की तरह रहा।

नयी सदी एक नये खिलाड़ी चीन को लेकर आया। चीन ने अपने आर्थिक मुनाफे को अफ्रीका में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम से प्रचारित कर प्राकृतिक संसाधनों की चोरी शुरू की। गरीब देश विरोध नहीं कर पा रहे हैं।

अफ्रीका यूरोप, अमेरिका, चीन का प्रैक्टिकल फील्ड है दवा, नशा या नया प्रयोग जैसी मर्जी हो करिये। मनुष्य जीवन की कीमत एक बकरी और दो जून की रोटी से अधिक नहीं है।

अफ्रीका में खुशहाली की कुछ गिनी-चुनी जगहें हैं जिनमें दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और अल्जीरिया को शामिल किया जा सकता है। बाकी देश में मिलीशिया, आतंकवादी,समुद्री लुटेरे, मानव तस्कर, छोटी लड़कियों के व्यापारी सक्रिय है। बाकी जो पाप बचता है उसे सैनिक तानाशाह पूरा कर देता है। आये दिन छोटे-छोटे देश के अंदर से लेकर सीमा तक हिंसात्मक टकराव होते रहते है।

अफ्रीका महादीप को लूटने की जद्दोजहद में शक्तिशाली देश रहे है। और इतना सब अफ्रीका के नाम पर करने.के बाद भी धरातल पर उनके जीवन के बेहतरी का कोई प्रयास नहीं है।

पेट की भूख के लिए अफ्रीकन हाथ बांधे खड़े है। उनकी कोई आवाज विश्व में नहीं है। उसके हिस्सें में दूसरे की सेवा लिखी है क्योंकि काले लोग है। उनका दोष अफ्रीका का मूल निवासी होना।

विश्व में एक देश भारत ही ऐसा है जो शोषण की जगह पोषण , मानवीय मूल्यों का तरज़ीह देता है। भारत विश्व की महाशक्ति और नेता बनता है। उससे सबसे बड़ा लग बेजुबान देशों को आवाज मिलेगी। उनकी बेहतरी लिए काम होगा। अफ्रीकी देशों को भारत पर पूरा भरोसा है।

मौर्य सम्राट विन्दुसार के समय अफ्रीका से ईसा से 300 वर्ष पूर्व सम्बन्ध स्थापित किये थे। मिस्र के नरेश टॉलमी फिलाडेल्फस ने डायनोसिस को दूत बना कर भेजा।

सीरिया के शासक एण्टियोकस ने डायमेकस नामक राजदूत बिंदुसार के दरबार में भेजा। बिंदुसार ने सीरिया से मीठी मदिरा, सूखी अंजीर के बदले भारत से वहाँ दार्शनिक भेजने के लिये पत्र लिखा था।

प्राचीन अफ्रीकी लोगों ने खनन कर प्रसंस्कृत धातुओं का निर्माण किया। सोना चांदी,तांबा, कांस्य, लोहा,मिट्टी के बने सुंदर पात्र निर्मित किये।

रोमन,भारत और अरब देशों के जहाज यहाँ से गुलामों, हाथीदांत,सोने,पन्ना,जानवरों की खाल,दरियाई घोड़े और विभिन्न जानवरों का आयात करते थे।

अक्सुमाइट साम्राज्य अफ्रीका में दसरी शताब्दी में स्थापित हुआ। जिसमें अरब देशों के हिस्से भी शामिल था। एक्सुमाइट राजदूत मिश्र,अरब और भारत गये।

12 वीं सदी में माली जो पूर्व में घाना का सामन्त राज्य था, में एक बड़े साम्राज्य की स्थापना हुई जिसकी राजधानी टिम्बकटू थी। इसके सुल्तान विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति शासक मनसा मूसा थे जिनकी कुल सम्पत्ति 4 लाख मिलियन अमेरिकी डॉलर थी। भारत के संदर्भ में 40 लाख डॉलर मुकेश अम्बानी से लगभग 300 गुना ज्यादा।

अरियो और हाइलैंड्स का साम्राज्य इथियोपिया में सोंगई पूर्वी अफ्रीका में। मेडागास्कर में इमेरिन। स्वाहिली साम्राज्य युगांडा क्षेत्र में । नूबिया और कार्थेज राज्य। एक्सम शासन में 330 ईसवी में ईसाई धर्म का प्रवेश हुआ था।

पशुपालन में गाय, बकरी,भेड़ आदि का किया जाता था कृषि में बाजरा,गेंहू,कपास आदि होती थी। फल में अंजीर,जामुन,नींबू,आबनूस होते थे।

अफ्रीकी लोग प्राकृति प्रेमी और मस्त थे किंतु ईसाई और मुस्लिम की ललचाई शातिर व्यवस्था ने अंधकार दीप और कालों का देश बना दिया। नील नदी

अफ्रीका में धर्म देखें तो 85 फीसदी लोग मुस्लिम या ईसाई है फिर भी अशांति का कारण है। ये दोनों धर्म के स्तर पर असफल विचार धाराएँ हैं। इन दोनों के लिए खुशहाली का मतलब यूरोप के चंद देश और अरब है।

मध्यकाल में मुस्लिमों की लूट से ये उबर न पाये। आधुनिक काल में यूरोपीय ईसाइयों की लूट से इच्छापूर्ति नहीं हुई। ये चालाक थे और उपनिवेश के साथ वहाँ व्यापार विकसित कर दिए जिससे शोषण आज भी बना हुआ है।

धर्म का सहारा लेकर अफ्रीकी सम्पदा की लगातार चोरी होती रही और मूलवासियों को यातनाएँ मिलती रही है । भारत के देर से पहुँचने से ये लूट,बर्बरता अभी तक चालू है। भारत पूरे अफ्रीका को सनातन संस्कृति से रोशन करे। इन प्राकृतिक लोगों को खुशहाल जीवन जीने की ओर ले चले।

अफ्रीका शब्द बर्बर भाषा के इफ्री से हुआ है जिसका अर्थ है गुफा । इसीलिए इसे गुफा में रहने वालों का देश कहा गया।
डेंसमण्ड टूटू ने अंग्रेजों के लिए कहा था- उनके पास बाइबिल थी हमारे पास जमीन। जब उन्होंने बाइबिल की कहानी सुनाई तो आंख बंद हो गई। आंख खुली तो बबइबिल हाथ में थी जमीन उनके पास।

अलबरूनी गजनवी के लिए कहता है कि अल्लाह रहमत बक्से गजनवी को जिसने भारत की हँसती- खेलती संस्कृति को उजाड़ दिया।

अफ्रीका की प्राकृतिक सुंदरता मनोहर है।नदियों में नील जिसे अफ्रीका की जीवन रेखा कहा जाता है, बहुत सुंदर है। और कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ हैं– जैम्बेजी,जूना,रुबका, लिंपोपो तथा शिबेली। कुछ प्यारी बड़ी झीलें हैं- चाड,विक्टोरिया,वोल्टा आदि। पर्वतों में एटलस,किलमिंजारो, ड्रैकेन्सवर्ग,कैमरून और काला हारी महत्वपूर्ण हैं। कालाहारी,सहारा जैसे रेगिस्तान तो वहीं सवाना जैसे वन। और उष्णकटिबंधीय सदाबहार जलवायु जैसे भारत ही लगता है। कर्क, विषुवत तथा मकर तीनों रेखा यहाँ से गुजरती है।

मैंने कब ऐसा सोचा कि मुझें तुम खुशियां दो।

मैं सिर्फ जुड़ना चाहता था मैं एक होने की अनुभूति चाहता था

मेरी पीर तुम्हारें में तुम्हारी मेरे में होने लगे।

मनुष्य चालक और शातिर भी वह साथ ही सहज और सरल भी हो सकता है।

तुम सिर्फ अपने मन का देखती हो मेरे मन क्या!

तुम दुनियावी दुःख का कारण मुझे कैसे मानती हो।

मैंने कभी किसी को तकलीफ देने के विषय में नहीं सोचा।
क्या तुम्हें मेरा मेरा प्यार नहीं दिखता।

उम्र भले बढ़ती गयी हो हम जिसे प्यार करते है उसके लिए बच्चों से मासूम हो है।

प्यार के मामले में उससे माँ वाली फीलिंग चाहते है।

तुम इतना क्यों सोचती हो। मेरे पुरुष होने का तुम्हें इतना सुबा है।

मेरे में भी एक कोमल मन है जैसा तुम रखती हो तुम जिस तरह अपने लिए चाहती हो उसी तरह मैं भी चाहता हूँ।

एक होने का मतलब है मेरे तुम्हारे अहम का चला जाना।

जीवन एक बार का मिला है हम जीते कैसे यह ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाय हम मरते कैसे है?

तुम चाहों तो सब बदल सकता है लेकिन तुम्हारा तुम मेरे मैं आना नहीं चाहता है।

बड़ा आसान मैं और तुम चलो हम बन जाते है।

मेरे राम तेरे राम….

तुम किसको राम कहते हो- राम का मतलब भारत से है अरे मुकुट और धनुष लिए ही नहीं बल्कि मैली सी धोती पहना किसान ,कुर्ता पहना मास्टर या कहे टिफिन लिए ऑफिस जाता वह आदमी जिसे लौटते समय माँ चश्मे,पत्नी की दवाई और बच्चों की किताबें लाना है। इन सबमें राम है।

वैसे तो बहुत से लोगों के मन में राम का जिक्र होते ही भगवा कपड़ा पहने कुछ दिखने लगता है बहुतों को चिढ़ मचती है इसी राम की वजह से उसकी बनी बनाई सत्ता चली गयी। जिस सत्ता रूपी मुर्गी से कुल जमां तीन पीढ़ी निकल गयी थी। ये ससुरा राम को कुदा दिया..।अब लौंडा कौन सा रोजगार ढूढे उसे कुछ आता नहीं सिवा चूतिया बना के कुर्सी पाने के। अरे भाई वह खून से जो पाया है। राम के नाम पर दुकानें चलाने वाले भी हो गये है। ऐसा कुछ नेता जी टाइप के लोग कहते है।

खैर हमें राजनीति से क्या? हम बताते है राम क्या है मेरे लिए…मैं बहुत छोटा था अभी स्कूल जाना शुरू किया था कि बड़े भाई के साथ हनुमान चालीसा गाते-गाते याद हो गई थी । हनुमान जैसे कि हर बच्चे के हीरों बचपन में रहते है,उम्र इतनी थी कि दोनों भाई मिलकर शर्त लगाते थे कि किसका मूत्र आगे जायेगा🙃

राम पर थे ये कहा चले गये। बचपन में ही घर में सुंदरकांडका पाठ शनिवार को घर में होता था। स्कूल से एक दिन आया तो बाबरी टूट गयी ऐसा दादी ने बताया। यह भी कहा कि वहाँ भव्य राम मन्दिर बनेगा। मैंने दादी से पूछा राम को भगवान जी क्यों कहते है। दादी- उन्होंने धर्म की रक्षा की पापी और दुष्टों को दण्ड दिया। मैंने कहा क्या इतने से कोई भगवान हो जायेगा?

दादी- वह भक्तों पर बहुत कृपा करते है वह करुणा के सागर है। मैं- वह कहाँ रहते है क्यों नहीं दिखते है? दादी भक्तों के ह्रदय और सबको ऐसे ही दिखते रहेंगे तो यह बहुत चालक मानव है उन्हें अपने को भगवान सिद्ध करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और मानव नित्य एक सबूत मांगेगा आज के नेता की तरह।

दादी जैसे मुझे मिलना हो राम भगवान से तब क्या करें
दादी-अच्छे काम करो,भगवान को स्मरण करते रहो, दीन दुःखियों की सेवा करों। मैंने कहा कि इसे हम कर सकते है। राम मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है तुम्हारे लिए राजनीति हो सकती है।

विवेकानंद जी ने राम के बारे में शिकागो में कहा था कि जब तक भारत में एक पुरुष और एक महिला जीवित है तब तक राम और सीता जीवित है। सीता-राम सदैव सनातनियों के आदर्श है और रहेंगे।

कुछ उच्चश्रृंखल लोगों की वाचालता से राम पर कोई आंच आने वाली नहीं है। इस धरती पर राम पर प्रश्न अब तक सबसे ज्यादा उठे है फिर भी वह हम सबके आदर्श है। गांधी जी ने लोकतंत्र की नहीं रामराज्य की बात की थी। जहाँ सब सुखी रहे मनुष्य तो मनुष्य, कुत्ता भी न्याय पा सके। शेर और बकरी एक घाट पानी पिये।

राम जिसमें रमन और मरण समाहित है सृष्टि का आदि अंत निरन्तर चलता रहता है । वैसे ये तुम्हारी समझ में नहीं आयेगा क्योंकि तुम उदारवादी पंथी हो। राम सहजता और प्रेम का विषय है जो तुम्हारे बस का नहीं है।

मानव की खोपडिया भागती बहुत है वह दानी की जगह ग्राही सिस्टम को जोर से एक्टिवेट किया है उसे सबमें लाभ चाहिए,इसमें क्या फायदा पहला प्रश्न होता है? कुछ कम ऐसे है जिन्हें तुम बिना लाभ के करते हो जैसे नशा,बकैती,सोसल मीडिया इत्यादि। एक बार राम में प्रीति करके देखों ये तुम्हें एक्टिवेट कर देगा। राजनीति करो उसकी पूछ पकड़ के लटके न रहो। तुम्हारे में कुछ जीवित है जो तुम्हे ढूढ़ रहा है तुम हो कि कुछ बाहर ढूढ़ रहे है।

जब अंदर बाहर एक बराबर जब हो जायेगा उस समय तुम्हें समानता,स्वतंत्रता और न्याय के लिए संग्राम की आवश्कता नहीं पड़ेगी।

बिना कारण कुछ नहीं होता इसकी सिद्धि विज्ञान से चाहो तो कर लो।यह विश्वास की तुम हो यह जगत भी है तुम्हें बनाने वाले तुम्हारें माता पिता है तो इस जगत का भी कोई माता पिता भी होगा । उसे ही हम राम कहते है तुम क्या कहते हो?

मानव और सत्ता का बाजार●◆★

तुम परेशान सत्ता और विपक्ष के लिए हो वह तुम्हें कोरोना दे दिया। परिवार को तोड़ दिया चार रोटी के लिए तुम रेस्तरां पर निर्भर हो गये। हजारों मिठाइयों के बावजूद तुम चाकलेट खा रहे हो। स्नेक के नाम पर तुम जहर और जंक फूड खाकर बीमार पड़ रहे हो…।

तुम लाई,चने,घी चुपड़ी रोटी और तरह-तरह के अनाज भुने,भिगोये और अंकुरित सब भूल गये। ब्रेड,चाउमीन,मैगी आदि पर निर्भर हो गये। तुम्हारे पौष्टिक खाने को कब का रिप्लेस कर दिया गया है तुम्हें खबर नहीं हो पायी। तुम्हें जल्द ही फैक्ट्री वाला चावल,गेंहू,मक्का और आलू खाने को मिलेगा।

खराब खाने का दो फायदा पहला प्रचार के दम पर फूड इंडस्ट्री बना लेना। दूसरा बीमार पड़ने पर मेडिकल इंडस्ट्री विकसित कर लेना । लोकतंत्र के नाम पर चुनाव में हजारों करोड़ खर्च होता है जिसमें सारे हथकंडे प्रयोग होते है फिर भी इसे सबसे अच्छा विचार कहते है क्योंकि इस पर पश्चिम की मुहर लगी है। अरे भाई ये हजार करोड़ किसकी जेब से आता है? तुम वास्तव में मानव का कल्याण चाहते हो तो इस लोकतंत्र को खत्म करो।

जाति, आरक्षण,संरक्षण और नौकरी के नाम तुम सड़को पर लड़ रहे हो क्योंकि लोकतंत्र जिंदा है। एक निरपराध दण्डित नहीं होने का सिद्धांत विष्णु तिवारी के मामले में क्या हुआ।

तुम जातिवाद दूर करने का वादा करके जाति को संवैधानिक बना दिये है ये तुमको खूब फबता है हम आपस में नहीं लड़ेंगे तो नेता की चौधराहट की जरूरत नहीं पड़ेगी।

अमेरिका और यूरोप विश्व के खाद्य व्यापार पर कब्जा करना चाहता है वह नया वर्ग वीगन फूड लाया गया है शाकाहार का जिसमें मिल्क प्रोडक्ट भी नहीं रहेगा अरे भैया जानवर काट खाने वाले में इतनी दया कहा से आ गयी व्यापार समझिये।

कुछ दिन पहले मांस की जगह एगटेरियन( अण्डा) का प्रयास हुआ था। अब “वीगन प्रोडक्ट” मार्केट में लांच हो रहे है। आर्गेनिक फूड और हाइजेनिक फूड की तरह। इससे नया बाजार मिलेगा कुछ नये अरबपति बनेंगे। तब विचार है तुम रासायनिक उर्वरक को बाजार में क्यों बिकने देते हो। आगे कृत्रिम मांस और अण्डे ,कृत्रिम दूध और पनीर की तरह मिलेंगे।

तुम बाजार और व्यापार को क्या जानोगे मानुष बाबू😶

एक तरफ कल्याणकारी राज्य दूसरी तरफ शराब को लाइसेंस । यदि तुम समझना चाहोगे तो संविधान के दो तीन अनुच्छेद मिला कर साथ पढ़के जज साहब कहेंगे इसका मतलब यह निकलता है।

परिवार टूटने से तुम्हारा समाज टूटा है व्यापार नहीं, वह तो तेजी से बढ़ा है एक चूल्हे से 30 लोगो का कहना उपले-लकड़ी पर बन जाता था अब एक सिलेंडर से एक लोग का खाना चल रहा है चूल्हा,वर्तन,तेल,मसाला आदि आदि अलावा ऊपर से होटल में खाने का चलन । दोस्त इन सबसे तुम कितना खुश हो कभी शायद सोचा नहीं! क्योकि तुम कहते हो समय नहीं है कभी विचार किया आखिर तुम्हारे समय का क्या हो गया? फेमिनिज्म के कारण चार रोटी ,पति-पत्नी के प्रेम का निर्धारक कोई और हो गया। वही बाजार पौरुषवर्धक गोली बेच रहा। तुम अब भी नहीं समझे।

तुम्हारे विचार को कौन बना रहा है? न्यूजपेपर,न्यूजचैलन,फ़िल्म वाले या कुछ राजनेता! इसमें तुम्हारा क्या फायदा है? युद्ध संस्कृतियों का सदा चल रहा है कभी बाजार के नाम पर कभी साम्यवाद के नाम पर । भारतीय तो एक आर्थिक ईकाई या ज्यादा से ज्यादा दर्शक है खेला कोई और खेल रहा है।

हाँ एक चीज शोर मचाने वाला है कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र है अमेरिका ,यूरोप आदि इसकी शाबाशी तुम्हे दे रहे है। तुम्हारी मान्यताएं,संस्कृति, धर्म और भाषा सब गुलामी में सनी है क्योंकि उन्होंने लोचा तुम्हारें माइंड में कर दिया है।

तुमने क्या खोया ? परिवार,स्वास्थ्य,रिश्ते,धर्म,संस्कृति
,प्रेम बदले में तुम्हें आधुनिकता और विकास का झुनझुना पकड़ा दिया गया। कम से कम 1000 स्क्वायर फीट में रहने वाले को अब 100 स्क्वायर फिट में 50 मंजिले वाले कबूतर खाने में रखकर आगे एक पार्क बना दिया। नाम दिया “कालोनी”,क्या तुम जानते हो अंग्रेज कालोनी ,उपनिवेश को कहता था। जिसे आज तुम सीना चौड़ा करके अपने को कालोनी वासी ,पॉस कालोनी में रहने वाला बता रहे हो।

ये जो उदारवाद,मानवतावाद,समाजवाद मार्क्सवाद,राष्ट्रवाद आदि देख रहे हो यह सब शासन प्राप्त करने का जुगाड़ है तुम्हारी उन्नति सनातन व्यवस्था में थी जिसे दफन कर दिया गया।

स्वतंत्रता, समानता,न्याय,व्यक्तिवाद के गुब्बारे फोड़े जाते है लेकिन फिर भी तुम दलित,वंचित,पिछड़ा और सवर्ण ही रहते हो । यह डिक्रमिनेशन से बहुत लाभ उन सत्ताधीशों को है। उनके बाद उनका लौड़ा आ जायेगा। तुम्हारे लड़के का खून चूसने। तुम इनके-उनके राजनीतिक विचार को लेकर सिर फुटऔउल करना।

तुम एक चीज सोचों तुम क्या हो ,तुम्हारी उन्नति किसमें है
तुम एक भैतिक ईकाई से जैविक ईकाई बन पाओगे ,क्या तुम खुशियां परिवार के साथ बाट पाओगे या चिप्स,कोलड्रिंक और शराब की पार्टी ही तुम्हारी हकीकत बन गई है। समझ आये तो बताइयेगा तुम कैसा समाज चाहते हो?

श्रीराम मंदिर समर्पण निधि…..

इस समय भारत भर में समर्पण निधि संचित करने का कार्यक्रम चल रहा है। मन्दिर को पुनः बनाने का कार्यक्रम जो निकट आया इसके लिए ३.५ लाख हिन्दू वीर ३६ युद्धों में यज्ञ की समिधा बन गये। श्री राम मंदिर सिर्फ एक मंदिर ही नहीं बल्कि यह भारतीय संस्कृति का वह बिंदु है जहाँ भारत अपने को तलाश रहा है। मन्दिर नहीं होना यह कहता रहा है कि जो देश ने अपने सूर्य के कांति मंडल से दूर है उसका उत्थान कैसे होगा?

भारत को विदेशी ताने बाने के तिमिर में लपेट कर कहा गया कि धर्म से इसका कुछ नहीं हो सकता… तब पुनः प्रश्न है कि जब धर्म महत्वपूर्ण नहीं है तो वैटिकन और काबा की क्या जरूरत है।

आतंकवाद जो कौम की इजाजत लेकर विश्व को लहूलुहान करता है यह रुकता क्यों नहीं है। विश्व के गरीब और पिछड़े क्षेत्र में अमेरिका आदि देशों की ईसाई मिशनरियां क्या कर रही है? धर्म से हीन किसी मनुष्य की कल्पना उस आकाश कुसुम और बध्यापुत्र कि तरह होगी।

भारत में मन्दिर समर्पण निधि को जो चन्दा कह रहे है वह गर्त में जायेगे। राजनीति में तुष्टिकरण अब सत्ताजीविता नहीं हो सकती है। सोई हुई कौम में जागृति लेकर आयेगा श्रीराम मंदिर। विकास के नये पैमाने गढ़ना शुरू कर दिया भारत ने, मन्दिर के आरम्भ में प्रारम्भ है। इसके आयोजन में राम का कुछ न कुछ प्रयोजन निहित है।

यह समस्या नास्तिक सेकुलर के साथ हो सकती है कि राम की मर्यादा क्या है उन्हें किस सीमा तक सीमित करें।
यदि आप आस्तिक है तब राम पर कोई प्रश्न नहीं है। जनमानस निधि के लिए समर्पण करते समय उसके मन में अपने प्रभु राम के प्रति समर्पण रहता है। कई माता-बहने तो निधि संचित करने वाले को ही प्रणाम करती है उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है चलिये इस जीवन में मेरा कुछ श्रीराम के काम आया। उस समय उसके चेहरे की प्रसन्नता देखते बनती है।

यदि आपको श्रीराम में राजनीति दिख रही है तो श्रीमन आपभी राजनीति में जुट जाये। किसी राजनीतिक पार्टी
विचार देह से निकाल दे। इस शरीर को श्रीराम के कार्य से धन्य बनाएं। देश के मूड को समझे , वह अपनी संस्कृति के साथ खड़ा है आपकि ओछी हरकत को वह बर्दास्त नहीं करेगा।

श्रीराम मंदिर अनुकृति

विदेशियों के संस्कृति द्वीप भारत भूमि अब नहीं रह सकते। यह सच है आप ने जिस शिक्षा व्यवस्था में हमारे नौनिहालों को डाल दिया,वह भ्रमित करता है किंतु सत्य अनंत: उभर कर आता है। उसके साथ विदेशी मानसिक बेड़िया स्वत: टूटती जाएगी। आयोध्या गवाह बन रही है और तुम…..

भारत का इतिहास @INDIAN HITORY

भारत का सम्बंध अपने पड़ोसी और अन्य विदेशी शासकों से रहा है इसका प्रमाण हमें मिलता रहा है। पश्चात में कोई बौद्ध,ईसाई और मुस्लिम बन गये। आज भी विश्व में पुरात्विक साक्ष्य मिलते है जिनमें भारतीय सम्बन्धों की पुष्टि होती है। सबसे महत्वपूर्ण है कि उन मिले प्रमाणों के विवेचन हमने कैसे किया है।

रोमन बस्ती का अरिकामेडु से मिलना ,शैलेन्द्र वंशी राजाओं की समुद्र गुप्त से अपील बोधिगया में बौद्ध मंदिर बनवाने को लेकर रही हो। दिलमुन,माकन, मेलुहा ,फारस के विषय मे वर्णन मिलता है।

एशिया माइनर (तुर्की) बोगजकोई अभिलेख से संस्कृत में इंद्र,मित्र,वरुण,नासात्स के विवरण को गलत तरीके से अंग्रेजी इतिहासकारों ने व्यख्यायित किया।

बोगजकोई का अभिलेख बताता है कि भारतीय संस्कृति का विस्तार सीरिया और तुर्की तक प्रत्यक्ष रूप से था। आज भी तुर्की में यत्र तत्र शिवलिंग प्रतिकृति दिखाई पड़ जाती है। चीन का शिजियांग प्रान्त कभी खोतान देश हुआ करता था जिस पर भारतीय वंशज कुमारजीव ने शासन किया था।

इसी प्रकार थाईलैंड,कम्बोडिया,लाओस,वियतनाम,
मलेशिया,इंडोनेशिया ,मैक्सिको,होंडुरास ,जापान और कोरिया तक में भारतीय संस्कृति और भारतीय शासन का विस्तार हुआ ।

यूरोप के रोमा समुदाय जिनका निकट का सम्बंध भारत से है। यह बताता है कि एक समय यूरोप के बड़े भू भाग पर भारत का शासन था। भारत के महान सम्राट विक्रमादित्य अपने शासनकाल 57 ईसा पूर्व में रोमन शासक जूलियस सीजर को रोम से गिरफ्तार करके दंडित किया था।

भारत का वर्णन मेगस्थनीज की इंडिका,टॉलमी की ज्योग्राफी, प्लिनी के नेचुरल हिस्टीरिका और पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रियन सी में भी मिलता है। भारत इतना कौतूहल का विषय विश्व समुदाय के लिए क्यों रहा है?
निश्चित रूप से इसका कारण भारत का व्यापार,शिक्षा प्रणाली,सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था थी।

ग्रीक,रोमन,मिश्र से हमारे सम्बन्ध प्राचीन समय में सुदृढ़ रहे है। जो भारत की विज्ञान तकनीकी को भी परिलक्षित करता है। भारत में प्राचीन काल में समुद्री जहाज और समुद्री यात्रा यंत्र विकसित किये थे। किंतु अंग्रेज इतिहासकारों ने जो भी भारत के लिए कहा उसे हमने आंख बंद कर मान लिया। बिना समुद्री जहाज के भारत का इतने दूर देशों में पहुँचना आसान कैसे होता।

अंग्रेजों के साथ एक दिक्कत थी उनका पूरा विकास ईसा के बाद संभव हुआ है और इसी चश्मे से वह विश्व को उलट-पलट के देखता है और वर्णित करता है ईसा के पूर्व धरती पर कोई विकसित सभ्यता नहीं रही है। भारत के वामपंथी इतिहासकार अंग्रेजी इतिहासकारों को चुनौती देने की जगह उनके ही कथनों की पुष्टि कर दी।

भारत की संभावनाओं को अंग्रेजी संदूक में भरकर उसे यूरोप से आयातित कह दिया गया। “आर्यन थियरी” के माध्यम से भारतीय मूल आर्य को ही विदेशी ठहराया गया बोगजकोई अभिलेख के आधार पर। स्मिथ आदि अपने इतिहास लेखन में माना कि भारत सदा से विदेशियों द्वारा शासित होते रहे है।

बागपत के सिनौली की खोज, जो इतिहासकारों और तकनीकी के माध्यम से हमें 4000 साल पूर्व ले जाती है अभी और खोजें होनी बाकी है। यहाँ से रथ, मूठ लगी तलवार,स्त्री योद्धा का प्रमाण मिला है। रथ जो घोड़े से खींचे जाने वाले है। भारत में हड़प्पा की खोज में अंग्रेजों ने घोड़े के प्रमाण को नहीं माना था जबकि सिनौली भारत में घोड़े नहीं होने के मिथकीय प्रमाण पर विराम लगाता है। यह भारत की प्राचीन सभ्यता में शुमार की जा सकती है।

एकबात जो गौरतलब है कि बागपत जिला पांडवों द्वारा दुर्योधन से मांगे गये पांच गांवों में से एक था। आगे की खोजें भारत के औपनिवेशिक इतिहास के स्वरूप को बदल देगी। क्योंकि भारत के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का कारण एक राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति कराना रहा है । योद्धाओं और वीरांगनाओं की भूमि को सत्ता की पिपासा ने नपुंसक के रूप में पेश किया।