दीपावली का दिन..

प्रयागराज में मेरा एक छोटा सा गाँव है। जहाँ हिन्दू के साथ बीस घर मुस्लिम के है । यहाँ के सभी मुसलमान दीपावली के दिन मोमबत्ती जलाते है पटाखे भी छुड़ाते है मेरे गाँव में कोई मस्जिद नहीं है। किसी मुस्लिम में धार्मिक कट्टरता भी नहीं है। यह भंडारे,देवी जागरण आदि में हिस्सा लेने में संकोच नहीं करते है।

मेरा गॉंव कोई विशेष न होकर साधारण है। धार्मिक रूप रामवनगमन मार्ग पर पड़ता है। यहाँ सेकुलिरिज्म जैसी कोई चिड़िया नहीं है। आतंकवाद का सामान्य बातचीत में मुसलमानों द्वारा आलोचना की जाती है। ऐसे बढ़िया मुस्लिम देख के लगता है कि भारत भर के मुस्लिम मेरे गांव की तरह क्यों नहीं है?

एक बड़ी चीज मेरे गांव में बड़ा या कहे तहसील स्तर का नेता कोई नहीं है। मुस्लिम कभी गांव में मस्जिद के लिए सक्रिय नहीं हुए। सात-आठ गांव पर कोई एक मस्जिद है।

एक खासबात यह है कि क्ष्रेत्र में मुस्लिम की तादाद ज्यादा नहीं है। धार्मिक कट्टरता, अरबीकरण ,जिहाद,तीन तलाक का प्रचलन नहीं है। उसका एकमात्र कारण है भारतीयकरण। मुल्ला के इस्लाम पर अल्लाह के इस्लाम को यहाँ के मुसलिमों ने तरहीज दी है। मुझे लगता है प्रयाग का यह गांव ,कलाम साहब के रामेश्वर के गांव की तरह ही है। जहाँ का धर्म भारतीयता में रंगा है।

मुस्लिम में उनकी पूछ है जो देवबन्दी,बरेलवी,जमाती से होती है गोया सऊदी की नकल करता हो तो और भी अच्छा है। किंतु यदि भारतीय है, हिन्दू संस्कृति को मानता है तो मौलवी की निगाह में खैर नहीं। काफिर तक कह देंगें। भारत की भूमि प्राचीन समय से शरणार्थियों को शरण दी है। भारत के अधिकतर मुस्लिम के पूर्वज हिन्दू रहे है। कितने मुस्लिम परिवार है उन्हें अपने वंश में कब पूजा पद्धति बदल के हिन्दू से मुसलमान हो गये ,स्मरण है।

मेरे गांव से कुछ दूर एक गांव है जहाँ दो परिवार है राजपूतों का एक तो क्षत्रिय है दूसरा किन्ही परिस्थितियों में मुस्लिम हो गया । दोनों परिवार में आपस में आना जाना बहुत दिनों तक बना रहा । लेकिन समय के साथ दूरी बन गयी। मैंने मुस्लिम बने परिवार से पूछा पूर्वज हिन्दू है तो चचा आप क्यों हिन्दू नहीं बन जाते। उनका कहना था मैं हिन्दू बन जाऊं लेकिन क्या समाज हमें स्वीकारेगा। मेरे लड़के को बहु क्षत्रिय घर से मिलेगी?

एकबार विवेकानंद जी मिलने एक मुस्लिम आया उसने कहा महाराज जी मेरा कल्याण कैसे होगा मैं तो मुस्लिम हूँ। जानते है स्वामी जी ने क्या कहा… तुम जिसकी भी इबादत करते हो उसका फर्क नहीं पड़ता है तुम् दृढ़ रहो ,सत्य का अनुशरण करो। धर्म का आडम्बर न करो बल्कि अनुशीलन करो। स्वयं को जानो….

परिवार -टूटते रिश्ते… गांगेय

भारतीय समाज में भाई के रिश्ते को बहुत मजबूत माना जाता है। किंतु इस समय सबसे बड़ा टकराव भाई का भाई से है। आपने ने विचार किया है इतनी माधुर्य लिए बन्धु का सम्बंध आज इतनी कडुआहट कैसे पैदा हो गयी?

परिवार का आधार है नारी। यह नारी ,नर को आकार और आधार दोनों देती है। नारी शसक्तीकरण और फेमिनिस्म के चक्कर में भाई-भाई का दुश्मन बन गया। हर घर में कलह का कारण भाई का भाई से सम्बन्ध है। भाई -भाई अलग होने का मतलब है सामूहिक परिवार का एकल परिवार की ओर प्रस्थान। न्यूक्लियर फेमली का आगमन। सब का यही कहना है मुझे कोई झंझट नहीं रखना है अब भाई झंझट होगया है।

भारत ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व में नारी प्रधान समाज रह चुका है लेकिन अन्ततः यही पता चला कि नारी न्याय नहीं कर सकती है वह अपना हित ,अपने सन्तान को तरहीज देगी। वह पति को उसके परिवार से अलग करने के लिए सब कुछ करेगी। साथ ही अपने परिवार से जोड़ने के लिए भी कोई कोर कसर न छोड़ेगी। बात कडुवी है लेकिन सच है।

रामायण,महाभारत से लेकर रूस की क्रांति तक कारण एक नारी का होना। इसके विवाद में जाने की जरूरत नहीं है सिर्फ समझने की कोशिश करिये। जो परिवार भारतीय संस्कृति के आधार पिछले हजारों वर्ष थे उन्हें टूटने में महज 20 वर्ष लगे है। बीस से तीस का दशक बहुत कठिन होने वाला है यह 2090 तक कि सामाजिक रूपरेखा का निर्धारण करेगा। नारी के उत्थान में परिवार की अवनति की ओर चला गया।

जिस तरह परिवार में एक भाई कमाता था पूरा परिवार खाता था। आज पूरा परिवार कमा रहा है लेकिन सुख से कोई नहीं खा रहा है। असन्तोष चहु ओर व्याप्त है। वह नारी भूल जा रही है उसके भी दो बेटे है जो कलह उसके पति के भाइयों में वही उसके पुत्रों के बीच भी होगी। ये नारी की आलोचना का विषय नहीं है बल्कि सामाजिक चिंतन का है।

एकल परिवार में खुशी कितनी है चार परिवार चार कमरें में रह लेता था खुशी खुशी पूरा परिवार एक साथ बैठ के खाता था आज एक ही परिवार न साथ बैठ के खाना बहुत मुश्किल है खुशियां मनाने की बात कौन करें । चार जन सोलह कमरे है। वह कहता है बहुत खुश है! लेकिन कितना है ? वह स्वयं जानता है। मैं,मेरा,हम,हमार है तुम्हारा,तुम,हमसब,हम सबका गायब है। अपने सब सपने हो गये है। अब तो एक चीज है हम तुम हिस्सा बाँट ले और मुक्त हो जाये।

मुस्लिमऔर इस्लामिक आतंकवाद !

मुस्लिम फ्रांस से इतना चिढा है कि उसके प्रोडक्ट का बॉयकाट का अभियान चलाया है। जबकि राष्ट्रपति मैंक्रो ने सही कहा है।

आतंकवादी “अल्लाहह हू अकबर”,’इंसा अल्लाह’ कह कर कितनी नृशंश घटना को अंजाम दिया। अल्लाह का नाम क्यों कभी नहीं खराब हुआ? जैश ए मोहम्मद आतंकी संगठन का बॉयकाट मुस्लिम क्यों नहीं चलाया। क्यों कि आतंकवादी अल्लाह के रास्ते पर है?

ISIS जैसे आतंकवादी मुसलमान की नजर में इस्लाम के नाम को अच्छा किया है इस लिए इसे मुस्लिम का समर्थन रहा है। इस्लामिक आतंकवाद पर मुग़लाते में न रहिये यह सीधे सीधे मुसलमानों के मौन समर्थन पर चल रहा है।

आतंकवादी मुस्लिम के लिए मसीहा, हीरो की तरह होते है लादेन,बगदादी, वानी, अफजल गुरु को देख लीजिए।
यदि आतंकवादियों से मुसलमानों को घृणा होती तो यह आतंकवाद जो फिलीस्तीन के मसले से 1969 में शुरू हुआ निपट गया होता है। इस्लाम के नाम पर लोगों का कत्ल जायज है।

इस्लामिक आतंकवाद के मसले पर पूरे विश्व को एक होना होगा। इनके साथ चीन,म्यामांर, श्रीलंका, अमेरिका,इजरायल अब फ्रांस जैसा व्यवहार सम्पूर्ण विश्व को करना होगा। यदि अपने लोगों के जान-माल सुरक्षा चाहते है । नहीं तो ये घृणित और विकृत लोग टुकड़ो में लोगों को धर्म के नाम पर मारते रहेंगे।

कार्टून बनाने वाले, और उस टीचर को जो कार्टून का सबब अपने स्टूडेंट को बता रहा था काट दिया गया।
इसकी आलोचना करने पर दुनियाभर के मुसलमान बॉयकाट फ्रांस प्रोडक्ट का प्रोपेगैंडा चलाये है।

सुन्नी मुस्लिम का नया खलीफा तुर्की राष्ट्रपति एर्डोगन बन गया जो इस्लाम के लिए बहुत घातक सिद्ध होगा। वैश्विक राजनीति में आतंकवाद और इस्लाम को वह बखूबी भुना रहा है। फ्रांस के साथ यूरोप को बहुत बड़ी कीमत चुकानी होगी अपने देशों में मुस्लिम शरणार्थियों को बसाने के एवज में।

समानता और मानवाधिकार के समर्थकों का यही जनाजा निकालेगे। इस्लाम में मुसलमान होता है मानवता नहीं । यदि इतनी सी चीज आपको मालूम नहीं तो मरने के लिए तैयार रहिये। गला रेत कर या बम से परखच्चे उड़ कर यही विकल्प शायद मिले।

नारेतक़बीरअल्लाहु अकबर ! बम के लिए तैयार रहिये 😥

विचार भी भिन्न साँचे में जाने से मूल विचार खाँचे के आकार में ढल जाता है। मार्क्सवाद को ही ले लीजिए कही चे ग्वेरा ,लेनिन तो कही माओ के वाद के साँचे में ढल गया।

इस्लाम को देखे तो अरब के सांचे से निकल कर मध्यपूर्व से इंडोनेशिया फिर देवबंदी,सहारनपुरी,
मरकज का आकार बदल गया। सच्चा इस्लाम चलने से पहले ही लुप्त हो गया। कुछ सूफी से शांति का पाठ पढ़ाने का प्रयास किया उनका भी कत्ल कर दिया गया।

सबसे बड़ी कमी यह है कि गलत को गलत अब कहा नहीं जाता। वह साहस आधुनिकता और बौद्धिकता के तथाकथित प्रयास में खो गया। क्योंकि सोच यह रहती है कि वह क्या सोचेंगे?

आज कट्टरपंथी मुसलमानो को कोई आईना दिखाने का साहस नहीं करता है। जिस तरह धार्मिक कट्टरता के नाम लोगों के सिर काट देते है जैसा कि अभी पेरिस के स्कूल में टीचर का सिर उसके कट्टरपंथी मुस्लिम शिष्य ने काट दिया। क्योंकि उसने समझाने में मुहम्मद के कार्टून का उदाहरण दिया था ?

धर्म क्या है ? मुस्लिम अभी भी वाजिब परिभाषा के बगैर मनमौजी व्याख्या करने में लगा है। अरबी,ईरान,कुवैती,सीरिया,नाइजीरिया ,इंडोनेशिया सब का इस्लाम अलग अलग है। मुस्लिम फिरकापरस्ती से सभी परेशान है। वह ईशनिंदा का खाँचा बनाये है जिसमें आल्हा और नबी पहले पर कुरान दूसरे पर है। यदि आप से कही इनके खिलाफ गलती हुई तो समझये कभी में गला रेत कर बदल ले लिया जायेगा।

आधुनिक दुनिया में ये जाहिल,जंगली खून का खेल खेल रहे है जिन्हें धर्म से मतलब नहीं वही पैगम्बर बनने का स्वप्न बुना है। किसी को कत्ल करने की इजाजत यदि कोई धर्म देता है तो यकीन मानिये वह धर्म नहीं है। वह कौम ही हो सकता है।

मुस्लिम की तादाद बढ़ाने के लिए एक हथकंडा यह बनाने है गैर मुस्लिम लड़की को प्रेमजाल में फंसा कर एक नया मुसलमान बना लेना। फिर वह अपने घर की बैरी हो जाएंगी।

यदि मनुष्य होकर इतनी गंदी सोच है किसी अन्य धर्म के लिए दूसरी ओर इसपर धार्मिक सहमति भी सम्मिलित है तो यह उस धर्म भयंकर तबाही की ओर ले जायेगा। जैसा कि इस्लाम के साथ है बस उसके मानने वाले आंख पर बुरखा डाले है।

भारत में एक तथाकथित सेकुलर वर्ग है जो अपनी राजनीतिक पिपासा के लिए कहते है आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है। शर्लो एब्दो के कार्टूनिस्ट और पेरिस में हुये टीचर के कत्ल के कौन सा धर्म जिम्मेदार है यह कहने में मासूमियत कैसे आ सकती है।
@धनंजय_गांगेय

जब राजनीति बदचलन और झूठी है तब न्याय कैसे मिलेगा। ये अंग्रेजी वाला न्याय शास्त्र जो सीधे इंग्लैंड से लाद लाये। वह भारत को न्याय कैसे देगा। मैकाले कहता था कि भारत के समाज से सबसे पहले न्याय व्यवस्था को खत्म करना है।

जब न्याय की बारी आती है तुम जाति,
प्रजाति,सम्प्रदायिक चश्में चढ़ा लेते हो।

वह स्त्री को न्याय कैसे देगा? न्याय के पूर्व उसकी पूरी स्थिति समझी जाती है। जैसे वह
अल्पसंख्यक है कि नहीं,दलित है कि नहीं ,
अपराध करने वाला सवर्ण समाज ब्राह्मण,ठाकुर से ताल्लुक रखता है नहीं, आदि-आदि।

यदि यही अपराध दलित- मुस्लिम द्वारा सवर्ण पर किया गया है तो उसे उस तरह के अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं किया जायेगा। क्योंकि यह सेलेक्टिव सोच में फिट नहीं बैठती न ही नैरेटिव की आगे बढ़ा पायेगी । जैसे मुम्बई की मायानगरी में फ़िल्म में एक गरीब अभिनेता न्याय के लिए संघर्ष करता हुआ। वही दबंग ठाकुर एक दबे कुचले वर्ग की लड़की का रेप करता है,उसका सलाहकार ब्राह्मण है ।

ऊपर से वर्षों से उस गरीब परिवार को सूद तले दबाते सेठ जी भी है । इस स्क्रिप्ट पर फ़िल्म की कहानी चटकारे दार बनेगी।उसका प्रभाव समाज में जायेगा। फिर कही किसी साधु और पुजारी को जला के मारा जायेगा।

कुल जमा समाज में पूर्वाग्रह उसी तरह बैठाया गया है जैसे अंग्रेज उद्धारक थे। मुस्लिम भारत का विकास करने आये थे उन्होंने कोई मंदिर नहीं तोड़ा न ही समाज को प्रताड़ित किया। वह तो सेकुलिरिज्म में बहुत पहले विस्वास करते थे। इसी को आगे बढ़ाने के लिए गंगा-जमुनी संस्कृति की शुरुआत की।

इस्लाम जो पूरे विश्व में धर्म के नाम पर तबाही मचाये है वह भारत में गीत गाता है “पीड़ पराई जान ले।” दलित,अल्पसंख्यक,पिछड़ा कहना राजनीति में सफलता की गारंटी है । जिसका सहारा बड़े से लेकर टुच्चा नेता करता है।
गांधी जी हिन्दू उसे कहते थे जो दूसरे की पीड़ा जानता है।

लुटियंस गिरोह की नजर में हिन्दू आतंक और पर को पीड़ा देने वाला धर्म। स्वच्छंद वेश्यायें समाज सुधारक बनी है उच्चश्रृंखल पुरुष नीतिकार।

अब कैसे करेंगे समाज तैयार !
जब कि जाति बना दिया गया राजनीति में हथियार। मानवता का पाठ विश्व को सीखाने वाला सेकुलरों को आतंकवाद की पाठशाला नजर आता है। वास्तव में विश्व को आतंकवाद देने वाला शांतिकौम बन जाता है क्योंकि सत्ता की सीढ़ी उसके वोट से जो चढ़ जाता है।

हिन्दु को दलित,महादलित,पिछड़ा,अत्यन्त पिछड़ा,सवर्ण में बांटा जाता है क्योंकि यह लोकतंत्र है दोष ब्राह्मण पर लगाया जाता है।

कोई इन गिद्दों से नहीं पूछता 70 साल में तुम क्या कर पाएं ? शिक्षा को तुम ऐसा बना दिया छोटी-छोटी बच्चियों में वासना दिखने लगी। नारी का शोषण दिल्ली-मुम्बई में होने लगा। उन आदिवासी,ग्रामीण क्षेत्र में जहाँ नग्न हो नहाती है वहाँ उनकी इज्जत बची है क्योंकि तुम्हारी विदेश वाली सीख अभी नहीं पहुँची है।

पूरक मिलन —

स्त्री और पुरुष के मिलन को पूर्णता कहते है यही मेल ही दोनों में आकर्षण का मुख्य कारण है। मैथुनी सृष्टि में नर और मादा मिलकर अर्धनारीश्वर हो जाते है।

एक लिंगी जीव को छोड़ कर इसमें स्थावर,जंगम,उभयचर सभी प्राणी जगत,जिसमें बनस्पतियां सम्मिलित है। किंतु मुख्य आकर्षक मानव है।

पुरुष और स्त्री का योग सृष्टि का आधार है। इसी योग को प्रेम भी कहा जाता है। इस प्रेम का समपक्ष अर्थत जोड़े पूर्व निर्धारित है।
नहीं तो 7.5 अरब में आधी-आधी संख्या दोनों ओर है।

अब प्रश्न है प्रेम किसे कहते है?

जहाँ प्रेम तह नेम नहि तहाँ न बुधि व्यवहार प्रेम मगन जब मन भया तो कौन गिने तिथिवार।

यह प्रेम गोपियों वाला भी हो सकता है और एक साधारण का सामान्य के प्रति भी। किन्तु जीवन में कुछ ऐसे मिलते है जिन्हें देख कर लगता है यही तो है…

प्रेम मिलन चाहता है लेकिन इसमें “काम” कामना से रहित होना चाहिए । काम की कामुकता आप को जीव से जानवर की ओर ले जाती है। यदि वासना रहित है तो बात दूसरी है। प्रेम विस्तार है मनुष्यता और सहृदयता का।

कभी आप भी प्रेम करिये। ये मत कहियेगा की प्रेमी या प्रेयसी कहां से मिले❤️

सखी..

हे सखी तुम क्यों नहीं उठती

मैं रोज उठता हूँ तो लगता है आज बोल दोगी । तुम्हारा यू खामोश लेटे रखना बर्दाश्त नहीं होता

मैं चिड़िया होता तो तुम्हे दूर अंतरिक्ष में ले जा कर फिर से वही बना देता।

मेरा रिश्ता कोई इस जन्म का नहीं यह जन्मोजनम का है कभी मैं तुम बनता कभी तुम मैं बनती ।

तुम मुझे इस जनम में छोड़ नहीं सकती ।
आत्मा के सम्बंध को शरीर कैसे मिटा सकता है।

शास्वत,अमरत्व आत्मा वही है जो तुममें है शरीर इसी धराधाम का है यह यही रह जायेगा।

जो आया वह जायेगा निश्चित ,बस कोई पहले कोई बाद। जो पहले जाय वो दूसरे का इंतजार करें।

जब भी मैं दूर ऊंचाइयों में देखता हूँ तुम ही तुम दिखाई देती हो ,मेरे आस-पास हो ऐसा न जाने क्यूँ महसूस होता है।

यह आत्मा ही ईश्वर है तुम मेरी अमृत कल्पनाओं की सखी हो मैं वही हूँ जो तुम हो। सिर्फ पर्दे रूपी अज्ञान का भेद है… आओ न मैं तुम हो जाऊं😥

गांगेय

भारत में सेकुलिरिज्म दो टाइप का प्रचलित है पहला वामपंथी सेकुलिरिज्म दूसरा इस्लामिक सेकुलिरिज्म। दोनों नैरेटिव के पीछे है “नारी शोषण”। कम्युनिस्टो में इनके सूत्रधार मार्क्स एंजिल की बीबी ले उड़े।

तो सावधान∆ यदि वामपंथी मित्र रखे हो तो अपनी बीबी बचा के रखना। मुस्लिम सेकुलिरिज्म में हिन्दू को चूतिया बनाया जाता है। वह किसी तरह करने आपकी बहन-बेटी को बहकाता।

कम्युनिस्ट की तरह मुस्लिम भी नारी को भोग्या मानता है। समस्या यह है लड़की पोती की उम्र की चाहिए। लाल सलाम..

थोड़ा सा मुम्बई मामा मारीच की नगरी के फ़िल्म इंडस्ट्री पर नजर डाले 🙄

आलम यह है कि तुम्हारी बीबी या गर्लफ्रेंड तुम्हारी अकेली की नहीं है न ही जो बच्चा लिए घूम रहे हो वह भी तुम्हारा न होकर

किसी ड्रग्स पार्टी की पैदावार है। दम मारो दम… कोई किसी मा..ले, जान से भी, मुक्त है।
अरे डारेक्टर करन,भट्ट,अनुराग कश्यप जैसे लोग हीरोइन बनाने की कीमत हेरोइन पिलाते है बाकी भी…

लेकिन अनुराग कश्यप metoo में नहीं आता क्योंकि सेकुलर वामपंथ में दुस्साशन का ही दुस्साहस चलता है द्रौपदी को पांडवों के सामने नंगा होना पड़ता है।

यह पूरी माया नगरी चीर हरण पर धृतराष्ट्र बनी है। जिसकों मरना है वह चक्रव्यूह तोड़ने की हिमायत करें।

पुत्र💥 गांगेय

पुत्र की परिभाषा है जो पुन्नाम नामक नरक से तार दे वह पुत्र है। पूत शब्द में यही दो शब्द लिए गये है। मनुस्मृति में 12 प्रकार के पुत्र बताये गये है औरस,क्षेत्रक,दत्तक,गूढ़ोत्पन्न,अपविद्ध,
कानीन,सहोदढ़,क्रीत,पुनर्भव,स्वयदत्त और शौद्ध।
औरस पुत्र जो अपनी पत्नी से जन्मता है। मनु ने इसे श्रेष्ठ कहा है।

गरुण पुराण में कहा जाता है कि
“पुन्नाम नरके तारते इति पुत्र:”

जो माता-पिता को पुन्नाम नामक नरक से तार दे वही पुत्र है। गरुण पुराण में पुत्र तीन प्रकार के बताये गये है उत्तम,मध्यम और निम्न। उत्तम को सुपुत्र,मध्यम पुत्र और निम्न कुपुत्र भी कहा जाता है।

पुत्र कुपुत्र तो क्या धन संचय।

आज कल इन तीन पुत्रों में और तीन पुत्र जुड़ गये है “बेटा” जो बांट के ले ले। “लड़का” जो लड़ के ले ले। अंतिम अंग्रेजी पुत्र ‘Son’ जो आपको सड़ा दे;आपकी इच्छाओं को मार डाले। यह तीन व्यवहारिक परिभाषा है।

शास्त्रों में चार प्रकार के पुत्र का वर्णन मिलता है
ऋणानुबंध, शत्रु,उदासीन और सेवक पुत्र इसमें सेवक पुत्र को श्रेष्ठ कहा गया है।

महाभारत के अनुसार ‘ज्येष्ठ’ सबसे बड़े पुत्र को कहा जाता है। भारतीय समाज में ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व प्रथम संतान के रूप में पुत्र की आशा रखता है। शास्त्र कहते है
प्रथमो पुत्र: धर्मतो जाय:। बाकी संतान तो काम का प्रतिफल होती है।

पुत्र वही है जो माता-पिता को भौतिक सुख के साथ आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति करा दे। जो उनकी इच्छाओं को जान कर कार्य को पूर्ण कर दे। माता पिता के सुख के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दे। पंच ऋण में सनातनी पुत्र के पैदा होने से ही पित्र ऋण से मुक्त हो जाता है। पुत्र में स्वार्थ से हट कर धर्म की कामना की गयी है इस लिए भारतीय समाज पुत्र के जन्म पर हर्षोल्लायित हो जाता है।

रामायण में मेघनाद से जब पूछा जाता है कि पिता के लिए नारायण से बैर क्यों जबकि जानते हो कि राम स्वयं नारायण है। मेघनाद- मैंने राम से ही शिक्षा ली है पिता के लिए सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिए।

अब यह आप पर है कि कौन सा पुत्र बनते है और कैसे पुत्र धर्म का पालन करते है क्योंकि पुत्र,पिता और पित्र बनने में ज्यादा समय नहीं लगता।