नागों का इतिहास●◆●

✳️महाभारत✳️के आदिपर्व के अंतर्गत #आस्तीक पर्व के 35 वें अध्याय के श्लोक संख्या 5-16 में नागों और सर्पो का वर्णन है🔱

नागों में सबसे पहले शेष जी तदन्तर वासुकि,ऐरावत,तक्षक,कर्कोटक,धनजंय,कालिय,मणिनाग,आपूरण,पिंजरक,एलापत्र,वामन,नील,अनील,कल्माष,शबल,आर्यक,उग्रक,कलशपोतक,सुमनाख़्य, दधिमुख,विमलपिंडक,आप्त,
कर्कोटक द्वितीय,शंख,वालिशिख,निष्टानक।

हेमगुह,नहुष,पिंगल,वह्यकर्ण,हस्तिपद,मुद्गरपिंडक,कम्बल,अश्वतर,कालीयक, वृत्त,संवर्तक,
पद्म प्रथम,पद्म द्वितीय,शंखमुख,कुष्माण्डक,
क्षेमक,पिण्डारक,करवीर,पुष्पदंष्ट्र,बिल्वक,बिल्वपांडुर,मूषकाद,शंखशिरा,पूर्णभद्र,हरिद्रक,अपराजित,ज्योतिक ।

श्रीवह,कौरव्य,धृतराष्ट्र,पराक्रमी,शंखपिंड,विरजा,सुबाहु,वीर्यवान,शालिपिण्ड,हस्तिपिंड,पिठरक,सुमुख,कौणपाशन,कुठर,कुंजर,प्रभाकर,कुमुद,कुमुदाक्ष,तित्तिरि,हलिक,महानाग कर्दम, बहुमूलक,
कर्कर,कुंडोदार और महोदर।
कुल ♀️79 नाग की प्रजाति उपन्न हुई।

यह सनातन धर्म कि महिमा है जो सर्पो का सम्पूर्ण विवरण देती है तब मनुष्य के लिए क्या कहा जाय। एक बार अपने शास्त्रों को जरूर पढ़िये।🚩🚩

पुलिस इनकाउंटर पर कुछ न कहना🌻

न्याय का समाज में महत्वपूर्ण स्थान है किंतु भारत में न्याय बहुत घिसड़-पिसड़ के मिलता है सामान्य व्यक्ति के लिए वह भी दुरूह है। न्यायपालिका में केश इतने ज्यादा है कि न्याय मिलते-मिलते इतनी देर हो जाती है कि कितने अपराधी पहले ही सामान्य मौत मर चुके होते है।
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पुलिस के खिलाफ न्याय पाना टेढ़ी खीर है क्योंकि पुलिस की गलती पर पर्दा डालना तत्कालीन सरकार सबसे महत्वपूर्ण मानती है जिससें स्वयं की किरकिरी से बचा जा सके।
दो मामले एक IAS अधिकारी किंजल सिंह और प्रिंजल के पिता DSP KP सिंह को 1982 बलिया के मुठभेड़ में अपराधियों से मिलकर उनके पुलिस वाले ने मार दिया।

तत्कालीन सरकार इसे अपराधियों द्वारा अंजाम दी गयी हत्या बताया था। किंजल अपने पिता को न्याय इस लिए दिला पायी क्योंकि वह स्वयं जिलाधिकारी पद पर थी। सामान्यजन का सोचिये जो कंट्रोल के राशन के लिए कई दिन लाइन में लगता है और पूरा भी नहीं पाता।
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दूसरा मामला भरतपुर के राजा मानसिंह जो जाटों के नेता थे 1985 में सरकार और पुलिस की मिलीभगत से इनकाउंटर कर दिया था। जिन्हें आज न्याय मिला है, सामान्य मौत से बचे 11 पुलिस वाले को सजा दी गयी।

तत्कालीन घटना कानपुर के बिकरु गांव की है जिसमें DSP मिश्रा और उनके टीम के अन्य 9 लोगों की हत्या कर दी गयी मीडिया और पुलिस वाले ने अपराधी विकास दुबे को दोषी ठहराते हुये इनकाउंटर में मार गिराया। इन सबके बाबजूद वहाँ के पुलिस वालों की भूमिका संदिग्ध है वास्तव में वारदात के वक्त क्या हुआ था।


विकास दुबे को जिंदा न्यायपालिका के समक्ष क्यों पेश नहीं किया गया? पुलिस की कहानी पूर्व में DSP KP सिंह ,राजा मानसिंह और DSP जियाउल हक वाली ही है। 2014 में कुंडा में हुये जियाउल हक की हत्या में अपराधी कौन था पुलिस गुत्थी सुलझा नहीं पायी,फिर CBI भी नाकाम रही।

पुलिस का व्यवहार और प्रणाली शायद किसी से छुपी हो,किन्तु पुलिस रिफॉर्म पर सरकारें मौन है, क्योंकि गलत-सही काम को अंजाम देने में पुलिस सबसे अहम भूमिका में नेताओं के लिए काम करती है। SP ऑफिस से लेकर थाने-पुलिस चौकी तक घूस का जो “खुला खेल फरुखाबादी चलता है” इसमें आखिर सहमति किसकी है? सब मौन है।
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एक जिले से करोड़ो रूपये वसूल के महीने के महीने जाता है फला थानाध्यक्ष बनने के लिए इतने रुपये का चढ़ावा ऊपर के अधिकारियों को चढ़ाया जाता है जिस पर सरकारें गाँधीजी के बंदर का व्यवहार करती है।

गुंडा,पुलिस,नेता के गठजोड़ से आमजन ठगा सा रहता है उसकी आवाज ज्यादा दूर तलक नहीं जाती सिर्फ हथमल के रह जाता है। आज के UP के मुख्यमंत्री 2007 में संसद में रोते हुये लोकसभा अध्यक्ष से कहा था कि पुलिस उनका इनकाउंटर कर देगी। लेकिन आज वही पुलिस पूरी तरह सही है … क्योंकि सत्ता में वह बैठे है। गलत तो विपक्ष में नजर आता है?
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पुलिस का आलम यह है कि हर थानाध्यक्ष के पास करोड़ो की संपत्ति बन जाती है लेकिन वह टैक्स अधिकारियों की पहुँच में कभी नहीं आता। घूस का एक नियम है “लेके के घूस फंस जा देके घूस छूट जा”।

न्यायपालिका बार-बार इनकाउंटर को गलत कहती है फिर भी अंजाम दिया जाता है। अपराधी के पहले वारदात पर पुलिस उसे पैसा लेकर नहीं छोड़ती तो वह अपराधी आज बन नहीं पाता । विधायक,सांसद,नेता आदि बनना दूर की बात है। देखेगे तो पता चलेगा जहाँ सफल गुंडा नेता है वही असफल नेता गुंडा है।

समय रहते सुधार करिये क्योंकि आज लोकतंत्र,नेता,पुलिस और व्यवस्था सभी लोकतंत्र के आधार जनता को चिढ़ा रहे है।
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मुलायम सिंह यादव हिस्ट्रीशीटर से मुख्यमंत्री

मुलायम सिंह के ऊपर हत्या,डकैती सहित कुल 32 मुकदमें के हिस्ट्रीशीटर के साथ ही फूलनदेवी सहित सभी दस्युओं के संरक्षक रहे है 1981 में मुख्यमंत्री VP सिंह जो दस्युओं को बड़े जोर शोर से खत्म करना चाहते थे मुलायम सिंह यादव के इनकाउंटर का आदेश दिया ।

मुलायम सिंह यादव को इटावा के पुलिस वाले से सूचना मिली वह तुरंत ही साइकिल से गांव -गांव होते हुये दिल्ली चौधरी चरणसिंह के पास पहुँचे ,पैरों में गिर के रोते हुये कहने लगे कि VP सिंह की पुलिस से मेरी जान बचाइये। चौधरी चरणसिंह ने मुलायम सिंह को विधानमंडल में लोकदल का नेता चुन कर, जान बचा दी। नेता-गुंडा का यह शानदार गठजोड़ है।

इसी बीच ‘बेहमई गांव’ में मुलायमसिंह की चेली फूलन देवी ने 22 क्षत्रियों का बेरहमी से मार डाला। इस घटना से विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गयी। आगे चल कर हिस्ट्रीशीटर मुलायम सिंह समाजवादीपार्टी बनाई, मुख्यमंत्री “माननीय” “नेताजी” आदि-आदि बन गये। 1989 का वह दौर था जिन गुंडों को लोहिया और चरणसिंह आजमा रहे थे मुलायम ‘स्वयं’ सफल प्रयोग थे और गुंडों को सांसद बनाने का सिलसिला चल पड़ा इसी फेहिस्त में ‘फूलनदेवी’ भी सांसद बन गयी।

मुलायम पिछड़े के नेता का आडम्बर करके अपने पूरे कुनबे को राजनीति में सफल कर लिया , अपने साथ ही लड़के को भी मुख्यमंत्री बना दिया। वह अल्पसंख्यक के मसीहा अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवा के बने थे। यह अलग बात है कुंडा में 2013 में DSP जियाउल हक की हत्या होने के बाद उनके पुत्र अखिलेश ने एक भी मुजरिम पकड़ नहीं पाये। सिर्फ अल्पसंख्यक को वोट वैंक के रूप प्रयोग हुआ। “कुंडा के गुंडा” की राजनीति उसी समाजवादी पार्टी में चमकती रही।

गुंडे को आदर्श बनाने वाले क्षत्रिय “बेहमई” में मारे गये 22 क्षत्रिय को भूल कर मुलायम सिंह यादव को ‘क्षत्रिय शिरोमणि’ घोषित कर के दो बार समाजवादी सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। गुंडा पूजन की एक परिपाटी है लोकतंत्र में जिस तरह वोट के लिए जातियां है। गुंडे पूरे भारत में बूथ कैप्चरिंग से लेकर डराने धमकाने,दंगा-फसाद के लिए नेताओं के लिए उपयुक्त है।

DSP जियाउल हक

मुलायम सिंह यादव भारत के पहले “हिस्ट्रीशीटर विधायको” में से एक है । 1989 से लेकर 2003-04 सीधे गुंडे ही विधायक जिताने की स्थिति में आ गये थे। राजनीति का अपराध,
माफिया,गुंडे से चोली दामन का साथ लगातार जारी रहा है । क्योंकि बिना मेहनत के विधायक मिल जाते है। अंसारी,मुख्तार,बृजेश,धनंजय,
राजा इसी श्रेणी के नेता है। “रंग लगे न फिटकरी रंग चोखा”

2004 में दस्यु सरगना निर्भय सिंह गुर्जर ने बयान दिया “इटावा के दो शेर एक मुलायम सिंह यादव दूसरा निर्भय सिंह गुज्जर”। मुलायम सिंह उस समय मुख्यमंत्री थे उसी रात निर्भय का इनकाउंटर हो गया, कही दस्यु का मामला विश्वनाथ प्रताप की तरह सरकार न गिरा दे।

सोचिये यदि 1981 में चौधरी चरण सिंह ,
मुलायमसिंह यादव का इनकाउंटर न बचाते तो आज गुंडे,बदमाश,माफिया विधानसभा,
लोकसभा की सीढ़ियां नहीं चढ़ पाते।

बूढ़ी कांग्रेस कीबूढ़ी सोच🔥

कांग्रेस पार्टी का एक समृद्धिशाली इतिहास रहा है किन्तु आज की परिस्थितियों में उसके वयोवृद्ध नेताओं की कसरत ने उसे नेतृत्व विहीन बना दिया है। कांग्रेस के लिए “अंधा बाटे रेवड़ी फिर- फिर अपने देय” कहावत विल्कुल चरितार्थ है।

वही पुराने जमे जमाये वृद्ध नेताओं का वर्चस्व बना हुआ है अहमद पटेल,दिगविजयसिंह, पी चिदंबरम, मोतीलाल बोरा, रोसैया,कपिल सिब्बल,अशोक गहलोत, गुरुदास कामत,कमलनाथ आदि- आदि। राहुल गांधी जब अध्यक्ष बने तब उन्होंने नई टीम गठित की जिसमें जयराम रमेश,शशि थरूर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट ,
डीके शिवकुमार,मुरली देवड़ा,संजय निरुपम थे जिन्होंने जोश के साथ ,जमीन से जुड़कर काम किया।


2009 में UPA की सरकार बनाने में इनका बड़ा योगदान था। अब की कांग्रेस में जमीन से जुड़े नेताओ की जगह वर्चुअल और एयर कंडीशन वाले नेताओं ने ले रखी है। पुराने कॉंग्रेसियों को 70 साल के अनुभव का गुमान है ज्यादातर जुगाड़ लगाकर सत्ता न रहने पर भी पार्टी में अहम भूमिका रखना चाहते है। हार के विश्लेषण और उसकी नैतिक जिम्मेदारी की किसी को परवाह नहीं है।

सबसे बढ़ के शैडो राजनीति बार बार करने का प्रयास,वृद्ध नेताओं को लगता है कि गांधी नाम के सहारे नैया पार लगती रहेगी । कांग्रेस में युवाओं को आगे बढ़ाने को कोई तैयार नहीं है। ध्यान रहे जो आगे बढ़ कर नई पीढ़ी का स्वागत नहीं करता वह अपने साथ नई पीढ़ी की ऊर्जा को बेकार कर देता है। वृद्ध नेताओं को जब लगा कि राहुल गांधी उन्हें BJP की तरह मार्गदर्शक मंडल में डालने वाले है तो झट ही राहुल गांधी की भूमिका को ही पार्टी में घुन की तरह खा गये।
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सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया जोकि काफी समय से बनी है सोचने वाली बात है कि जो पार्टी अपने लिए अध्यक्ष नहीं चुन पा रही हो उसे जनता कैसे नेतृत्व सौंप दे? स्पष्ट है मार्गदर्शक मंडल में जाने से अच्छा था कांग्रेस में राहुल गांधी को ‘नाचीज़’ बना के प्रियंका की ताजपोशी का माहौल तैयार किया जाय।

कांग्रेस पार्टी में शैडो राजनीति का इतिहास रहा है शास्त्री जी मृत्यु के बाद कांग्रेस सिंडीकेट “गूंगी गुड़िया” इंदिरा गांधी की तजपोसी की जबकि नेहरू जी परिवार की राजनीति को दरकिनार करके शास्त्रीजी को अपना उत्तराधिकारी बनाया था, यह अलग बात है गूंगी गुड़िया ने सिंडीकेट राजनीति खत्म करके कांग्रेस को ही इंदिरा कांग्रेस कर दिया।
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संजय गांधी के रहते राजीव गांधी की इंट्री नहीं हो पायी किन्तु इंदिरा की मृत्यु ने सिंडीकेट को मौका दिया कि राजीव गांधी को केंद्र बना दिया। जल्द ही पार्टी के कुछ लोगों की महत्वाकांक्षा ने राजीव गांधी को राजनीति का शिकार कर दिया। राजीव के बाद कांग्रेस को मजबूत करने के लिए सिंडीकेट जिसमें अहमद पटेल की भूमिका मुख्य थी, सोनिया गांधी को राजनीति की सीढ़ी चढ़ाना शुरू कर दिया।

राजनीति में सौंदर्य के बहुत पुजारी है इंदिरा,सोनिया और प्रियंका को आगे करके राजनीति बिसात चलने वाले माहिर खिलाड़ियों में कामराज, अहमद पटेल रहे है। अब प्रियंका को राहुल गांधी के विकल्प के रूप खड़ा करने की कीमत प्रियंका से वही ले रहे है, जो एक पुरुष एक स्त्री से लेता है , पूर्व में इंदिरा और सोनिया को भी इसी रास्ते हो कर गुजरना पड़ा था।
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राजनीति कीमत वसूल करती है “आप क्या दे सकते हो और कितना” ? कांग्रेस में सिंडीकेट सदा ही वृद्धो का बना रहा है जिसे सत्ता और सौंदर्य दोनों चाहिए । आप बनो इंदिरा,सोनिया और प्रियंका?? राजीव और राहुल की बलि दी जाती रहेंगी। कपिल सिब्बल सही कह रहे कि जब “अस्तबल से घोड़े चले जायेंगे तब हमारे जगने का भी फायदा नहीं है “।

संस्कृति की खोज 😑

भारत अपनी परम्परा को भूल बैठा वह वर्णसंकरता और #कर्मसंकरता को रोकने में विफल रहा है प्राचीन गौरवमयी सभ्यता कुछ छलछंदियो के हाथ पड़ गयी। फिर भी वह संधर्ष करती रही । सबसे बुरा समय #स्वतंत्रता के बाद आया जब सत्ता कम्युनिस्टों के हाथ लग गयी।

वह अंग्रेजी संस्कृति के महत्व को स्थापित करने और भारतीय संस्कृति को कमजोर करते गये । हमारे युवान अपनी संस्कृति न जान दूसरे पर पीठ थपथपाने लगे । क्योंकि किसी परम्परा को गति उसकी संस्कृति देती है। भारत स्वतंत्र हुआ लोग स्वतंत्र हुये किन्तु हिन्दू धर्म स्वतंत्रता के बाद संविधान का गुलाम बना दिया गया।

लोगों में मानसिक गुलामी की आदत डाली जाती रही है। महानता का दम्भ अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली ने विकास और विज्ञान को दिया। अंग्रेज उद्धारक बन गया भारत के वास्तविक गुरु घृणा के पात्र बना दिये गये। पूरी पीढ़ी अंधेरे में जीने लगी उसके आदर्श रंगमंच के नचनिये बनते गये।

अन्य देश वस्तुओं का आयात करते है वही हम संस्कृति के साथ बुद्धि के आयातक बन गये। हमारे भित्ति में भारत नष्ट होकर “इंडिया” का आकार लेता गया। हम अबोध की भांति सेकुलर जामा पहनते गये। भारत के अभाव में विश्व में शांति,प्रेम का पाठ कौन पढ़ाये। अपाहिज इंडिया अपनी आत्मा इंग्लैंड में तो कभी रूस में कभी अमेरिका में देखने की भरपूर नकल करता गया।

कौन कहे वेद,शास्त्र, गीता,रामायण पढ़ने को ,कौन गीत गुनगुनाये महान भारत के जिसने विश्व को मानवता की पहचान करवायी। काले अंग्रेजों ने हमें पढ़ा दिया कि “भारत की खोज” वास्कोडिगामा ने की थी।

जब तक हम #भारत को अपने में नहीं खोज लेते तब तक भारत विश्व गुरु कैसे बन सकता है…?

नवबौद्ध और वामपंथ🗿

अंग्रेजों ने भारत में सबसे पहले उनकी पहचान की जिनकी सहायता से वो भारत से पूंजी के साथ सुरक्षित निकल सके। सामाजिक रूप से ऐसा धुएँ का गुबार उठे कि उन्हें निकलने में आसानी हो सके।

अंग्रेजों के भारत में कई तरह सहयोगी थे। वामपंथी,छुपे वामपंथी और चाटुकार। इसमें चाटुकार की सामाजिक स्थिति दयनीय थी। और वामपंथी जिन्हें अपने राजनैतिक हित सामाजिक ताने -बाने से निकालना था।

इसके लिए अंग्रेजों एक प्रसिद्ध सिद्धांत था –‘मछली के तेल में मछली पकाना।’ मतलब कि भारत की सभी अच्छी चीजें भारतीयों की पीठ पर लाद के इंग्लैंड ले जाना।

अब समझिये 1942 के बाद की राजनीति जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन को आर्थिक रूप से इतना कमजोर कर दिया कि भारत को गुलाम बनाये रखना मुश्किल हो चला था। अंग्रेजों को अब ऐसे प्यादों को आगज बढ़ाना था जो उनका झोला लेकर ब्रिटेन तक पहुँचाने में गर्व महसूस करें। साथ ही भारतीयों को गाली दें। अंबेडकर, पेरियार जैसे एजेंट पहले से तैयार थे किंतु उन्हें मजबूत जनाधिकार का नेता चाहिए था।

छुपे वामपंथी जिन्हें हिंदू होने में शर्म आती है, जिनका धर्म से वास्ता नहीं है, उन्होंने भी भगवान बनने के लिए मानवतावाद का सहारा लिया। यह भी सेकुलिरिज्म का रूप है। भारत इतना अनुदार रहा होता तो मुस्लिम और अंग्रेज भारत आने की ही हिमाकत न करते!

अंग्रेजों ने नैरेटिव बनाया कि भारतीय संस्कृति और शिक्षा पद्धति बेकार है। इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। लम्बरदार खड़े किए गये। उनके मोहरे थे–पहले तो भीमराव सकपाल जो धार्मिक रूप से अपने को हीन समझते थे और दूसरे नेहरू जो सांस्कृतिक रूप से अपने को अंग्रेजों से कमतर पाते थे। साम्यता यह थी कि दोनों की शिक्षा इंग्लैंड में हुई थी। दोनों अंग्रेजी व्यवस्था के हिमायती थी।

नेहरू ने तो पंडित होकर गांधी जी की सहायता से राजनीतिक धरातल बना लिया था पर अंबेडकर को लगता था शूद्र होने के नाते उनका वह मुकाम नहीं बन सकता। लेकिन खिदमती दोनों अंग्रेजों के ही थे। इनके साथ अपने नैरेटिव को समाज में स्थापित करने का कार्य अंग्रेजों ने कर दिया। दोनों ने अपनी समझ में कमियों का कारण हिन्दू धर्म को माना। वहीं अंग्रेजों को अच्छे से पता था भारत की आधार शक्ति शूद्र रूपी शिल्पी हैं जिन्हें नष्ट करना है। इसमें खाद डालने का कार्य अंबेडकर और नेहरू कर रहे थे।

एक ने हिंदू धर्म का खुले में त्याग कर दिया तो दूसरे ने कहा उसे धर्म में कोई आस्था नहीं है। वैज्ञानिक सिद्धांत को स्वीकार कर दोनों ने भारत के स्वाभाविक आधार को गिरा दिया गया। लड़ाई शूद्र को नष्ट करने की थी, बदनाम ब्राह्मण को किया गया।

हिन्दू वर्णव्यवस्था का मजबूत शिल्पी अब वंचित और दलित की कुलही पहना कर एक बार फिर जबर्दस्ती का दूल्हा बना दिया गया। भारत के अर्थतंत्र को ऐसा निचोड़ दिया कि जिस GDP को अंग्रेजों ने 1757 में 25% पर लिया था उसे 2% पर 1947 में छोड़ दिया। आजादी के इतने साल बाद खूब तकनीकी और वैज्ञानिक विकास के बाद 2020 में 1.8% रेंग रही है। दोनों मसीहा बन गये लेकिन भारत की स्थिति में कमोबेश कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

भीमराव को वाद चलाने के लिए बौद्ध चोगा क्यों पहनना पड़ा? उनको लग रहा था दलित की संख्या भारत में अधिक है तो हिन्दू धर्म के बराबर में खड़ा कर देंगे। लेकिन नवबौद्ध सिर्फ राजनीतिक धर्म बन कर ही रह गया जिसमें सामाजिक और भौतिक उत्थान निहित है।

अब पूछेगें अंग्रेजों को भारत में एजेंट खड़ा करने की क्या जरूरत थी। छोटी कमियों को बड़ी बुराई का आकार क्यों दिया गया?

अंग्रेज सनातन धर्म की ताकत जानते थे । आज भी पाश्चात्य जगत महेश्वर सूत्र,वेद,चरक,सुश्रुत , वात्सायन आदि पर रिसर्च कर रहा है। यदि हिन्दू आपस में बँटा रहेगा तो मात्र अपने ही वर्ग का हित चाहेगा।भारत के मौलिक विज्ञान की ओर उसका ध्यान जाने से रहा।

भीमराव जिस जातीय अंहकार को तोड़ना चाहते थे, आज उनके ही महार जाति में जो अब अंबेडकर लिखते हैं, वे श्रेष्ठता का दम्भ भरे हुए हैं।

सकपाल अपनी आत्मकथा में व्यवस्था की आलोचना करते हैं। शूद्र वर्ग पर आंसू बहाते है लेकिन कभी भी शूद्र वर्ण का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया। वह न तो संस्कृत भाषा के विद्वान थे और न ही शूद्र वर्ग के जानकर । उन्होंने अंग्रेजों की थियरी को आगे बढ़ाया,
मैक्समूलर के भारतीय ज्ञान को हुबहू उतार दिया ।

भीमराव हीन भावना से कभी उबर नहीं पाये। उन्होंने कभी आगे बढ़कर छाती ठोककर स्वयं को शूद्र कहने की हिम्मत नहीं की। स्यात् वह कह देते तो समाज में शूद्र एक वर्ग की 1572 उपजातियों में विभाजित नहीं होता।

भारत की आर्थिक समस्या को धार्मिक रंग दिया गया। आज सभी नौकरी करना चाहते है आखिर क्यूँ ? यह तो शुद्र वृत्ति है । नौकरी आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है, इस लिए सब नौकर बनना चाहते है।

नेता भी अपने को शासक नहीं सेवक कह रहा है। जात-कुजात सब की अभिलाषा रहती है नेता बनने की। यह समस्या आर्थिक थी । जब तक भारत का विश्व व्यापार पर कब्जा था, तब तक ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र सामाजिक दृष्टि से सामान थे। जब भारत के संसाधनों पर विदेशियों के कब्जा हो गया। साथ ही साथ ये विदेशी भारत में अपना आधार बढ़ाने के लिए नये वर्ग का सृजन कर रहे थे क्षजिससे उसके हितों की रक्षा हो सके।

दलित,वंचित,वामपंथी, मॉडरेट,वैज्ञानिक मनोवृत्ति आदि गढ़े गये। इसका परिणाम भारतीयता के प्रतिकूल था किंतु विदेशी हितों का संवर्द्धन हुआ। अंग्रेजों ने भारत की खोज करके भारत के उद्धारक की छवि सकपाल और नेहरू जैसे के माध्यम से बनवा ली। अंग्रेजों ने भारत को 200 साल लूटा, मुस्लिमों ने 800 साल लेकिन दोष भारतीय सामाजिक व्यवस्था पर डाला गया ।

रही -सही कसर वामपंथी इतिहासकार,वामपंथी लेखक,वामपंथी सिनेमा ने कर दी। आज भारत के बच्चे काले अंग्रेज बनना चाहते हैं शिवाजी,राणा या रानी लक्ष्मीबाई नहीं।

🌿शाकाहार ही क्यूँ🌳

मांसाहार की निंदा क्यूँ न करें ? यहाँ बात जंगल,बीहड़ या अफ्रीका के दुर्गम स्थल की न होकर सामान्य स्थिति की है जहाँ खाने के लिए अन्नफल भरपूर उपलब्ध है तब भी जानवरों को निवाला बनाया जा रहा है दिल्ली,मुंबई,
कोलकाता,चेन्नई,बंगलोर ,अहमदाबाद जैसे शहरों की हालत यही है।लोग जिह्वा के स्वाद और फैशन परस्ती में ज्यादा मांस खा रहे है।

प्रकृति के सिद्धांत को देखेगे तो क्या हर बड़ा छोटे को भोजन की चेन बना देगा ? बूढ़े शेर को लकड़बग्घा खा जाता है तो बुढ़े मां बाप का जवान संतान क्या करें ? क्या इन्हें भी भोजन के चेन में शामिल कर लेगा। झटका,हलाल और भोजन! अरे यह प्रकृति सभी 84 लाख योनियों के लिए बराबर है धरती किसी मानव की अकेले नहीं है।

भोजन की चेन जानवर है लेकिन विवेकवान मनुष्य जानवर की चेन न बने। भवनात्मक होने जैसा कुछ नहीं जितना मनुष्य के माता पिता या जोड़े है उतना न सही लेकिन जानवरों और चिड़िया पंछी में भी थोड़ा कम ही सही लेकिन होते तो होंगे ? यदि मानव है तो मनुष्यता धारण करें अन्य जीवों पर दया करें उन्हें ग्रास न बनाएं उन्हें जीने दे। आपके खाने के लिए बहुत चीजें है।

यदि मनुष्य के लिए मांस बना होता तो उसे उबालने और जायकेदार बनाने की जरूरत न होती। वह भी जानवरों की भांति चीर फाड़ के खा जाता है।बाकी की मति लोग अपने समर्थक के तर्क जुटा लेते है।

दुर्भाग्य है कि हम जानवरों की भाषा नहीं समझते है। हमारे घर की गाय,रोज आने वाली गौरैया,
कौआ, कुत्ता,चींटी भी जब हमारा घर बन के तैयार हो जाता है तो अपने प्रियजन से कहते है कि यह घर बनवा के मानव को रहने को दे दिया है बस इतनी ही इच्छा है वह बस थोड़ा सा हमें भोजन दे दे।

पैसे का मोल 84 लाख में सिर्फ में सिर्फ मनुष्य के लिए है क्योंकि वह अपनों को ठगता है और अपना का स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है इसी लिए मुद्रा है क्यों कि आदमी पल पल बदलता है।

मनुष्य का आतंक 💀

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टिड्डियों का आपके घर में आना बुरा लग रहा!जल,जंगल,जमीन पर पूरा कब्जा क्या मनुष्य का ही होगा। जिस तरह जंगल पर अवैध कब्जा मनुष्य कर रहा है।

प्राकृतिक सेना चिड़िया,कौवे,गिद्ध, बाज,केंचुआ,
चींटी,चींटा,सर्प आदि को खा जा रहा है या उसके अनाधिकृत प्रयास ,कीटनाशक आदि के प्रयोग वह मर रहे है। ऐसा लगता है कि जंगल के जानवर भी एक दिन मनुष्य के घर में घुस आयेगा। अभी तो टिड्डी ही उसके खौफ का मंजर बनी है।

हम अपने पूर्वजों से सहअस्तित्व सीख सकते है। मनुष्य जीवन चले किन्तु अन्य जीव के जीवन को खतरा न पहुँचे। तालाब,पोखर के कब्जे कंकरीट के महल अन्य जीवन का गला घोंट दे रहा है। यह विकसित मानव का विकास है जिसमें अन्य सभी जीव जल जा रहे है।

मनुष्य प्रकृति के संतुलन के लिए खतरा बनता जा रहा। छोटे परिणाम कोरोना जैसे उसे समझ नहीं आ रहे है वह बड़े परिणाम चाहता है भले ही मनुष्य जाति को इतिहास में खोजना पड़े। स्वार्थ लिप्सा, बेतरतीब विकास विनाश की ओर हमें बढ़ाता जा रहा है। हमें समझना चाहिए 84 लाख योनियों का कुछ प्रयोजन होगा ? वह मनुष्य के भूख और शोषण के लिए सिर्फ नहीं बनाये गये है।

आधुनिक परिभाषा और मांसाहार के फैशन ने मनुष्य के जीवन को संकट में ही डाल रहा है। टिड्डी,करोना, समुद्री तूफान और उल्कापिंड की घटनाएं कुछ संकेत कर रही है किंतु आप हो अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर डालकर बच निकलना चाहते हो। ये टिड्डियां कहा और कितनी पैदा हो रही है यह ज्यादा माने नहीं है बल्कि इनकी पहुँच में भारत आता जा रहा है यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।