मेरा कमरा—

मैं और मेरे कमरे की कहानी बहुत रोचक रही है जब मैं कमरे में रहने पहुँचा तब एक अल्हड़ और मूढ़ था धीरे धीरे मेरी कमरे से दोस्ती हो गयी। बहुत सी योजनाएं इसी में बनी बिगड़ी।

जब कोई साथ नहीं था तब भी यह था मुझे धैर्य धराता रहा कि तुम हो ,ठान लो तो कोई मुश्किल नहीं है। मेरा कमरा मेरे लिए एक ऋषि के तपस्थल से कम नहीं है। यह मुझें किसी और से बहुत ज्यादा दिया है। पढ़ना और लड़ना सिखाया। वेद,उपनिषद, धर्म आदि की जीवंतता में ले गया।

इसने कहा कि धनंजय तुम धार्मिक व्यक्ति हो ,धर्म के मर्म को समझो। समाजिक इच्छापूर्ति के साथ सामाजिक इकाइयों को भी जानो।

जब मैं निराश होता हूँ तब मेरे में सकारात्मकता का संचरण करता है।

कमरे ने एक अच्छा व्यक्तित्व बनाने में पूरा योगदान दिया। भारत भ्रमण,चार धाम की यात्रा,सप्तपुरियों के दर्शन जैसे संयोग बनाने में अपना सहयोग किया। मेरे अब तक के सबसे प्रिय लोगों तक भी पहुँचाया है।

ऐसे कमरे का साथ छूट गया।मैं कहीं और चल दिया। सबसे बड़ी बात कमरें ने कोई शिकायत नहीं की। बस इतना कहा कि उसके शबब याद रखो और जहाँ भी रहो प्रसन्नतापूर्वक रहो। मेरा और तुम्हारा साथ पूरा हुआ। यह जीवन है जो परिवर्तन के साथ चलता है। कुछ सपने ऐसे होते है जिन्हें जीवन में जीना होता है।

कमरा निर्जीव होता है फिर भी सजीव सा लगता है। क्योंकि जब मैं अपने साथ एकांत में था वह भी तो वही था। ऐसा दोस्त जो मेरी हाँ को हाँ ,मेरी न को न कहा। कुछ प्रेरणा ,कुछ परिवर्तन को प्रोत्साहित किया । उसने मेरे मन में उत्प्रेरण करने में सहयोग किया।

देखा जाय तो वैशेषिक दर्शन के अनुसार जिन्हें हम निर्जीव समझ रहे है वह निर्जीव न होकर उसमें चेतना का स्तर कम है। विश्व जड़ और चेतन में विभाजित है । जो जड़ है वह चेतन होने की ओर अग्रसर है।

पहले की बरात VS अब की बारात…. गांगेय

बारात का अर्थ वर यात्रा! भारतीय समाज में बारात एक सुखद पल होता है जिसमें हम दूल्हे के खर्च पर जाकर छक खाते है और मौज करते है। जितनी उत्सुकता दूल्हे को दुल्हन की नहीं होती है उससे कही ज्यादा बाराती को बारात में जाने की होती है।

पहुँच कर पहला काम बारात में बंदोबस्त कैसा है खाने की व्यवस्था बढ़िया है कि नहीं है आदि-आदि । यदि भोजन में तरह-तरह के पकवान के साथ आइसक्रीम ,दो तीन प्रकार हलुवा ,काफी, कोल्डड्रिंक लिए हो तो लड़की के घर वाले सम्पन्न और दिलदार है । यदि ठीक-ठाक खिलाया तो चिरकुट। रास्ते भर गाली तथा नाहक बारात आये।

अच्छा खाना पा जाने पर बाराती बहुत खुश😄

पहले के बारात में व्यंजन के ज्यादा प्रकार न थे लोगों का ध्यान खाने की क्वालिटी पर रहता था। आज की तरह भौंडापन और छिछोरापन नहीं होता था। आज बारात में शराब का बढ़ता प्रचलन चिंता का शबब है कभी-कभी तो दूल्हा ही नशे में मस्त रहता है।

गहरा मेकअप लिए लड़की और महिलाएं ,कानफाड़ू संगीत । खड़े खड़े भोजन लेना उसपर जरा सी चूक की आपके सूट या लहंगे पर मटर पनीर,रसगुल्ला,चाट रंग बदल सकता है।

नकल के चक्कर में संस्कार (रस्म रिवाज ) खाना पूर्ति रह गया है सबसे ज्यादा भसड़ फोटो सेशन की है। कुछ बारात में दुल्हन नया करने के चक्कर में अब तो नाचते हुये स्टेज पर आ रही है। पहले खाना बनाने का कार्य घर के लोग पड़ोसी और गांव वाले मिलकर करते थे। हाँ नाचने के लिये नाचने वाली या लौंडा अलग से ले आते थे अब तो दूल्हा-दुल्हन से लेकर पूरा घर नाचने के लिये परेशान है। खाना बनाने वाले अब हलवाई है नचनिये जरूर घर के हो गये है।

फूहड़ता ज्यादा है परम्पराओं के निर्वहन में चूक हो रही है। विवाह के महत्व में, जिस प्रकार संस्कार और घर के लोगों की भागीदारी घटी है कही न कही पति-पत्नी के रिश्तों की मिठास में कमी आयी है। अहम का टकराव आम बात है उस पर नये लोग नये समझने वाले बन कर नये बने रिश्ते में कड़वाहट घोल रहे है।

विवाह 16 संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है जिसमें दो ईकाई एक हो जाते है सृष्टि के सृजन का यज्ञ प्रारम्भ होता है एक नये का जन्म होता है। बारात का कौतूहल तो हमें शिव-पार्वती के विवाह में रामचरित मानस में भी दिखता है। गोस्वामी बाबा ने क्या रोचक वर्णन किया है।

पहले भी बारातियों का ध्यान भी भोजन पर रहता था। लोग समय लेकर जाते थे कुछ दिन लड़की वाले के घर रुकते थे रामायण के अनुसार रामजी की बारात जनकपुरी में छ: मास रुकी थी। अब तो किसी के पास समय नहीं है खाना खाते ही बाराती गायब जिस तरह से मिडडेमील भोजन के बाद प्राइमरी से बच्चे गायब हो जाते है।

अब यदि देखा जाय तो बराती की आवश्कता नहीं है.. पहले के समय में जब कैमरा,फ़िल्म आदि नहीं थे आज की तरह द्रुत वाहन नहीं थे पैदल और बैलगाड़ी ही साधन थे रास्ते में चोर आदि का डर था तब बाराती सुरक्षा और गवाह के रूप में जाया करते थे जो आज परम्परा के रूप में दिखता है।

भारत की राजनीति में विवाह से जुड़ा एक रोचक तथ्य है कि मुम्बई गवर्नर जनरल की परिषद की बैठक 1897 में अंग्रेज हिन्दू शादी को फिजूल खर्ची बता कर प्रतिबंधित करने जा रहे थे ।

उस समय के बड़े कांग्रेसी नेता फिरोजशाह मेहता जिन्हें बॉम्बे का बेताज बादशाह कहा जाता था विरोध करते हुए कहा था भारतीय हिंदुओं के जीवन में कितने उत्सव ही है शादी तो एक उत्सव जैसा है जिसमें कुछ चटक- मटक के कपड़े ,रद्दी सुपारी,मिठाईया और टमटम। विवाह समारोह आप कैसे प्रतिबंध लगा सकते है। मेहता जी गोपालकृष्ण गोखले के साथ बहिर्गमन किया यह भारतीय संसदीय इतिहास की बहिर्गमन की पहली घटना भी बनी। जिसकी गूँज अंग्रेजों के बहरे कानों तक लन्दन तक पहुँची।

विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है उसकी गरिमा और महिमा बनाये रहे उसे कानफोड़ू संगीत और शराब के हवाले न करे बल्कि उसके महत्व को समझे।

इतिहास में नैरेटिव कारोबार●●

भारत में कई तरह के एजेंडे सेट किये गये। बौद्ध,यूनानी,चीनी,मुस्लिम फिर अंग्रेजों द्वारा। स्वतंत्रता पश्चात लोकतंत्र में सेकुलिरिज्म और जातिवाद की खेती काटी गयी। जिसे संस्कृति का भान नहीं वह सेकुलिरिज्म का प्रवक्ता बना बैठा है।

लोकतंत्र में सत्ता के एजेंडे को सेट करने में स्कूली पुस्तकों, अध्यापकों से लेकर सिनेमा,मीडिया ,
साहित्यकारों ने अपनी अपनी भूमिका को अंजाम दिया।

भारत के गद्दार राजे,राय की उपाधि विदेशियों से लेकर अपने अरमानों के लिए भारत की बलि चढ़ा दी। गद्दार सत्ता सुख पाने लगे उनके बच्चें विदेशों में पढ़कर
समाज सेवा वंशवाद का सहारा लेकर लोकतंत्र को वंशानुगत और जातिवादी बना दिया ।

कभी आप को इतिहास की पुस्तक में यह पढ़ने को नहीं मिलेगा कि भारत में असभ्य मुस्लिम का आक्रमण हिंदु संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके मंदिर का विध्वंश किया। इस्लाम के नाम कितने हिन्दूओं का कत्ल कर दिया जिहाद का नारा देकर। फिर भी इल्तुतमिश और अल्लाउद्दीन खिलजी भारत को मंगोलों से बचाया। मुहम्मद तुगलक हिंदु मुस्लिम एकता का पैरोकार था मुहम्मद तुगलक और फिरोज तुगलक अन्वेषक थे। मुगल ने भारत की लक्ष्मी का उद्धार किया।

बाबर भारत में आक्रमण नहीं करना चाहता था वह तो भारत के राजाओं के कहने पर आया था। हुमायूँ एक ईमानदार मुस्लिम था। अकबर गंगाजमुनी संस्कृति का बीज लगाया। जंहागीर कलाप्रेमी ,शाहजहां निर्माण कला का स्वर्णयुग लेकर आया। सबसे बढ़कर हास्यास्पद औरंगजेब भी सेकुलर था वह राज्य की कुछ मजबूरी में मंदिर तोड़े थे नहीं तो हिन्दू प्रजा के लिए मथुरा,काशी आदि में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।😂

मुस्लिम का सेकुलिरिज्म यही नहीं रुका वह बढ़ कर बंगाल पहुँच गया सिराजुदौला के रूप नया हिन्दू-मुस्लिम एकता वाला इंसान जन्म लिया। दक्षिण भारत में गंगा जमुनी संस्कृति की एक बड़ी पैदाईश मैसूर के हैदरअली के घर में टीपू सुल्तान के रूप में हुई। जो इस्लामिक देश बनाने के सपने की जगह भारत की उन्नति के स्वप्न देखा करता था । उसने भी मंदिर बहुत मजबूरी में तोड़े साथही कुछ हिंदुओं को मुस्लिम बनाया। नहीं तो वह हिन्दू और मुस्लिम को समान समझता था। यह स्कूली पुस्तक में आज भी जारी है।

जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट थी भारत के वास्तविक योद्धाओं वीरांगनाओ के इतिहास गायब है जिसने देश बर्बाद किया वह गंगा जमुनी संस्कृति का प्रणेता बन गया। जिन अंग्रेजों ने भारत को 200 साल लूटा वह भारत के उद्घारक बन गये, उन्होंने ने भारत को अंधकार युग से निकाल कर आधुनिक युग में लाया। भारत के लोगों को कुप्रथा से निकाल कर उन्हें आधुनिक शिक्षा से रूबरू करवाया।

यह सब हकीकत गद्दारों के पुत्र ब्रिटेन में पढ़कर खोज की । उन्होंने अंग्रेजों की नकल आदि करके भारतीयों को परतंत्रता की जगह उपनिवेशवाद से मुक्ति दिला कर आधुनिक भारत में प्रवेश दिया। जिन्होंने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर जातिवाद का जहर घोला वह अब बड़े नेता बन चुके थे अंग्रेजों ने सभी समझौते अपनी सुविधानुसार उन्ही से कर लिया। ये अंग्रेजों का नमक खाये थे उनके गुलाम आज भी बने है भले ही पीढ़ी बदल गयी है।

इतिहास में पन्ने दर पन्ने लीपापोती की गयी। भारत का औपनिवेशिक इतिहास अंग्रेजों द्वारा लिखा गया था उसे कमेटियां बना कर मुंहर लगाना था। जो सीधा स्कूल से बच्चों के दिमांग में बिठाना था। यह सिद्ध किया गया समस्या की जड़ सनातन व्यवस्था है। देश को सेकुलर रंग में रंगा जाय। इतिहास के माध्यम से डाला गया कि बर्बर,लुटेरे,आतंकी,गद्दार उतने ही समान है जिस तरह चप्पल चोरी में जेल गया व्यक्ति भी फ्रीडम फाइटर बन गया । जिसतरह स्वतंत्रता के समय और इमरजेंसी में जेल में बंद कैदी हो गये बस उन्हें जुगाड़… की जरूरत थी।

अब आप कहेंगे कि धनंजय आप सही नहीं कह रहे हो ?आपको सिंधिया परिवार ,जयपुर नरेश और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेंदर सिंह के वंशजों को देखना चाहिए। दो बड़े परिवार जो हाईब्रिड होकर एक हो गये वह सत्ता पर जोंक की तरह चिपक गये है। लोकतंत्र को परिवारिक राजतंत्र बना दिया है ।

हम अपने वीर,वीरांगनाओं को भूल गये जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए हँसते हुये रणभेरी में स्वाहा हो गये। ऐसे ही वीर असम के अहोम राजा लाचित बारपुखन जिन्होंने मुगलों को 17 बार हराया। राजा सुहलदेव बर्बर महमूद के भतीजे सैयद सालार गाजी की 20 हजार की सेना को बहराइच की भूमि पर काट डाला जो अयोध्या को निमित्त बना कर आया था।

दुर्गावती,कर्णावती,अहिल्याबाई,सोलंकी रानी नायका देवी, सिसोदिया रानी हांडी रानी,हरियाणा के राव तुलाराम,जाट राजा राजाराम,दुर्गादास राठौर,बन्दा बहादुर,महाराष्ट्र के पेशवा इन्होंने देश को सबसे ऊपर रख कर मर-कट गये। ये हमें स्मरण नहीं है?

आज क्या हो रहा है… जिसने अंग्रेजों की वकालत की वह देश में पूजे जा रहे है जिसने देश,धर्म को गाली दी उनके स्टैच्यू बन रहे है ! क्योंकि इससे वोट बैंक बढ़ता है। जबतक देश अपने नायकों और गद्दारों की पहचान नहीं कर लेता तब तक उसे कोई मुगल गंगा जमुनी कोई अंग्रेज आधुनिक बनाता रहेगा।

इतिहास का आलम यह है कि देसी विदेशी हो गया विदेशियों की सेवा करने वाले अपने को मूलनिवासी कहता है। मुस्लिम और गद्दार के बोल है यह किसी के बाप का देश नहीं है। मैकाले से लेकर के स्टुवर्ट मिल , विसेंट स्मिथ और मैक्समूलर का नैरेटिव भारत में वृक्ष का आकार ले लिया। अंग्रेजों को अपने शासन के स्थायित्व के लिए सिकन्दर महान ,अकबर महान की जरूरत थी उसी तरह भारत के नेताओं को औरंजेब और टीपू सेकुलर नजर आये।

कृषि शास्त्र और किसान पुराण••

भारत प्राचीन काल से लेकर अब तक कृषि प्रधान देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था का परचम विश्व में कृषि के कारण ही हुआ था। भारत के किसान के घर “कुटीर एवं लघु” उद्योग के केंद्र रहे है। किंतु अंग्रेजी व्यवस्था के षड्यंत्र ने किसान को मजदूर और मजदूर बना दिया । भारतीय राजनीति ने उन्हें जातियों में बाँटकर उनकी मांग को कुचल दिया।
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कृषि का भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 14% योगदान है लेकिन कृषि भारत के 60% लोगों के निर्वाह का आधार है। कृषि का योगदान 1960 के दशक में जीडीपी में 53 % रहा है। कृषि अपने साथ उद्योगों को बढ़ावा देती है। कपास, गन्ना,मसाले कितने उद्योग को गति देता है।
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भारतीय कृषि उद्योग बन सकती है किंतु इसमें सरकारों की इच्छाशक्ति में बहुत कमी दिखाई देती है। आज भी कृषि का बेहतर प्रबंधन करके ,उसमें तकनीकी निवेश के साथ उन्नत बीजों का प्रयोग करके किसान की आय में वृद्धि करके सामाजिक खुशहाली में वृद्धि की जा सकती है। ◆◆◆◆◆◆◆◆◆

1991 के उदारीकरण और 1996 में WTO में हस्ताक्षर के साथ सरकारों ने निर्णय कर लिया है कि कृषि क्षेत्र को हतोत्साहित किया जायेगा। “अन्न दाता सुखी भव” की कामना अब दुःखी और हताश स्थिति में छोड़ दिया जा रहा है।

“उत्तम खेती मध्यम बान अधम चाकरी भीख निदान।”

आज उल्टा चल रहा है नौकरी उत्तम बन धन दे रही है
किसान घटिया जीवन जीने पर विवश है। विडम्बना देखिये व्यापारी अपने उत्त्पाद की कीमत कार्टेल बना कर या स्वयं तक करते है । वही किसान के उत्पाद की कीमत दलाल और सरकार द्वारा तय करती है। समस्या यह है कि इनके द्वारा तय कीमत भी किसानों को नहीं मिल पाती है। किसान औने-पौने अपना उत्पाद बेचने को विवश है।
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सरकारें नई घोषणा करती है जो कि ‘तृणमूल स्तर शून्य हो जाती है।’ व्यापारी आसानी से कम दर पर बैंक से कर्ज लेता है वही किसान बैंक की परिक्रमा में समय नष्ट करता है और सूदखोर से ऋण लेने के लिए मजबूर हो जाता है।

दूध एक कृषि उत्पाद है जिसकी किस्मत भारत में अमूल्य ने बदल दी। वही कृषि के अन्य उत्पाद बदहाल है उनका कोई अमूल्य जैसा संगठन नहीं है। किसान के संगठन सभी राजनैतिक दल के अनुषंगी संगठन है जिसका निर्णय किसान न करके नेता राजधानी से करता है।
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सरकार द्वारा जिसप्रकार की सहूलियत उद्योग को दी जाती है उस तरह किसान को नहीं मिलती है। सरकार एक ओर अपने को किसान हितैषी बताती है दूसरी ओर उर्वरक की कीमतों में निरंतर वृद्धि कर रही है।
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खाद्यान्न सुरक्षा का आधार किसान है मुफ्त आनाज वितरण किसान के आधार पर किया जा रहा है जिसकी मार भी किसानों पर पड़ रही है। धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 घोषित है फिर भी किसान 1100 रुपये में धान बेचने पर क्यों विवश है ? कारण सरकार जानने का प्रयास नहीं करती है।

किसान की खुशहाली के बिना उद्योगों को उन्नत स्तर की ओर नहीं ले जाया जा सकता है। किसान आत्मनिर्भर बने, आत्महत्या न करें । सरकारें उसे भीख न दे बल्कि तकनीकी निवेश को बढ़ावा दे। साथ ही कृषि ऋण, बीज और उर्वरक सस्ते और आसानी से मिल सके। ●●

कृषि को हतोत्साहित करके उद्योग और सेवा क्षेत्र को कैसे विकसित कर सकते है? जबकि 60% उपभोक्ता पूंजी विहीन है। भारत के अर्थशास्त्री न जाने कैसे इस पर ध्यान नहीं देते है। जब किसान के पास पूँजी होगी तब मार्केट की तरलता में वृद्धि होगी।****

किसान पर राजनीति स्वाभाविक है लेकिन उनकी समस्या पर ध्यान क्या आंदोलन होने पर ही किया जायेगा। किसान के विषय को कैसे भूल जाते है यही कृषि क्षेत्र है जब 2008 कि आर्थिक मंदी विश्व पर छायी तब यह रीढ़ बन कर भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करके विश्व का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया था।

दीपावली का दिन..

प्रयागराज में मेरा एक छोटा सा गाँव है। जहाँ हिन्दू के साथ बीस घर मुस्लिम के है । यहाँ के सभी मुसलमान दीपावली के दिन मोमबत्ती जलाते है पटाखे भी छुड़ाते है मेरे गाँव में कोई मस्जिद नहीं है। किसी मुस्लिम में धार्मिक कट्टरता भी नहीं है। यह भंडारे,देवी जागरण आदि में हिस्सा लेने में संकोच नहीं करते है।

मेरा गॉंव कोई विशेष न होकर साधारण है। धार्मिक रूप रामवनगमन मार्ग पर पड़ता है। यहाँ सेकुलिरिज्म जैसी कोई चिड़िया नहीं है। आतंकवाद का सामान्य बातचीत में मुसलमानों द्वारा आलोचना की जाती है। ऐसे बढ़िया मुस्लिम देख के लगता है कि भारत भर के मुस्लिम मेरे गांव की तरह क्यों नहीं है?

एक बड़ी चीज मेरे गांव में बड़ा या कहे तहसील स्तर का नेता कोई नहीं है। मुस्लिम कभी गांव में मस्जिद के लिए सक्रिय नहीं हुए। सात-आठ गांव पर कोई एक मस्जिद है।

एक खासबात यह है कि क्ष्रेत्र में मुस्लिम की तादाद ज्यादा नहीं है। धार्मिक कट्टरता, अरबीकरण ,जिहाद,तीन तलाक का प्रचलन नहीं है। उसका एकमात्र कारण है भारतीयकरण। मुल्ला के इस्लाम पर अल्लाह के इस्लाम को यहाँ के मुसलिमों ने तरहीज दी है। मुझे लगता है प्रयाग का यह गांव ,कलाम साहब के रामेश्वर के गांव की तरह ही है। जहाँ का धर्म भारतीयता में रंगा है।

मुस्लिम में उनकी पूछ है जो देवबन्दी,बरेलवी,जमाती से होती है गोया सऊदी की नकल करता हो तो और भी अच्छा है। किंतु यदि भारतीय है, हिन्दू संस्कृति को मानता है तो मौलवी की निगाह में खैर नहीं। काफिर तक कह देंगें। भारत की भूमि प्राचीन समय से शरणार्थियों को शरण दी है। भारत के अधिकतर मुस्लिम के पूर्वज हिन्दू रहे है। कितने मुस्लिम परिवार है उन्हें अपने वंश में कब पूजा पद्धति बदल के हिन्दू से मुसलमान हो गये ,स्मरण है।

मेरे गांव से कुछ दूर एक गांव है जहाँ दो परिवार है राजपूतों का एक तो क्षत्रिय है दूसरा किन्ही परिस्थितियों में मुस्लिम हो गया । दोनों परिवार में आपस में आना जाना बहुत दिनों तक बना रहा । लेकिन समय के साथ दूरी बन गयी। मैंने मुस्लिम बने परिवार से पूछा पूर्वज हिन्दू है तो चचा आप क्यों हिन्दू नहीं बन जाते। उनका कहना था मैं हिन्दू बन जाऊं लेकिन क्या समाज हमें स्वीकारेगा। मेरे लड़के को बहु क्षत्रिय घर से मिलेगी?

एकबार विवेकानंद जी मिलने एक मुस्लिम आया उसने कहा महाराज जी मेरा कल्याण कैसे होगा मैं तो मुस्लिम हूँ। जानते है स्वामी जी ने क्या कहा… तुम जिसकी भी इबादत करते हो उसका फर्क नहीं पड़ता है तुम् दृढ़ रहो ,सत्य का अनुशरण करो। धर्म का आडम्बर न करो बल्कि अनुशीलन करो। स्वयं को जानो….

परिवार -टूटते रिश्ते… गांगेय

भारतीय समाज में भाई के रिश्ते को बहुत मजबूत माना जाता है। किंतु इस समय सबसे बड़ा टकराव भाई का भाई से है। आपने ने विचार किया है इतनी माधुर्य लिए बन्धु का सम्बंध आज इतनी कडुआहट कैसे पैदा हो गयी?

परिवार का आधार है नारी। यह नारी ,नर को आकार और आधार दोनों देती है। नारी शसक्तीकरण और फेमिनिस्म के चक्कर में भाई-भाई का दुश्मन बन गया। हर घर में कलह का कारण भाई का भाई से सम्बन्ध है। भाई -भाई अलग होने का मतलब है सामूहिक परिवार का एकल परिवार की ओर प्रस्थान। न्यूक्लियर फेमली का आगमन। सब का यही कहना है मुझे कोई झंझट नहीं रखना है अब भाई झंझट होगया है।

भारत ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व में नारी प्रधान समाज रह चुका है लेकिन अन्ततः यही पता चला कि नारी न्याय नहीं कर सकती है वह अपना हित ,अपने सन्तान को तरहीज देगी। वह पति को उसके परिवार से अलग करने के लिए सब कुछ करेगी। साथ ही अपने परिवार से जोड़ने के लिए भी कोई कोर कसर न छोड़ेगी। बात कडुवी है लेकिन सच है।

रामायण,महाभारत से लेकर रूस की क्रांति तक कारण एक नारी का होना। इसके विवाद में जाने की जरूरत नहीं है सिर्फ समझने की कोशिश करिये। जो परिवार भारतीय संस्कृति के आधार पिछले हजारों वर्ष थे उन्हें टूटने में महज 20 वर्ष लगे है। बीस से तीस का दशक बहुत कठिन होने वाला है यह 2090 तक कि सामाजिक रूपरेखा का निर्धारण करेगा। नारी के उत्थान में परिवार की अवनति की ओर चला गया।

जिस तरह परिवार में एक भाई कमाता था पूरा परिवार खाता था। आज पूरा परिवार कमा रहा है लेकिन सुख से कोई नहीं खा रहा है। असन्तोष चहु ओर व्याप्त है। वह नारी भूल जा रही है उसके भी दो बेटे है जो कलह उसके पति के भाइयों में वही उसके पुत्रों के बीच भी होगी। ये नारी की आलोचना का विषय नहीं है बल्कि सामाजिक चिंतन का है।

एकल परिवार में खुशी कितनी है चार परिवार चार कमरें में रह लेता था खुशी खुशी पूरा परिवार एक साथ बैठ के खाता था आज एक ही परिवार न साथ बैठ के खाना बहुत मुश्किल है खुशियां मनाने की बात कौन करें । चार जन सोलह कमरे है। वह कहता है बहुत खुश है! लेकिन कितना है ? वह स्वयं जानता है। मैं,मेरा,हम,हमार है तुम्हारा,तुम,हमसब,हम सबका गायब है। अपने सब सपने हो गये है। अब तो एक चीज है हम तुम हिस्सा बाँट ले और मुक्त हो जाये।

मुस्लिमऔर इस्लामिक आतंकवाद !

मुस्लिम फ्रांस से इतना चिढा है कि उसके प्रोडक्ट का बॉयकाट का अभियान चलाया है। जबकि राष्ट्रपति मैंक्रो ने सही कहा है।

आतंकवादी “अल्लाहह हू अकबर”,’इंसा अल्लाह’ कह कर कितनी नृशंश घटना को अंजाम दिया। अल्लाह का नाम क्यों कभी नहीं खराब हुआ? जैश ए मोहम्मद आतंकी संगठन का बॉयकाट मुस्लिम क्यों नहीं चलाया। क्यों कि आतंकवादी अल्लाह के रास्ते पर है?

ISIS जैसे आतंकवादी मुसलमान की नजर में इस्लाम के नाम को अच्छा किया है इस लिए इसे मुस्लिम का समर्थन रहा है। इस्लामिक आतंकवाद पर मुग़लाते में न रहिये यह सीधे सीधे मुसलमानों के मौन समर्थन पर चल रहा है।

आतंकवादी मुस्लिम के लिए मसीहा, हीरो की तरह होते है लादेन,बगदादी, वानी, अफजल गुरु को देख लीजिए।
यदि आतंकवादियों से मुसलमानों को घृणा होती तो यह आतंकवाद जो फिलीस्तीन के मसले से 1969 में शुरू हुआ निपट गया होता है। इस्लाम के नाम पर लोगों का कत्ल जायज है।

इस्लामिक आतंकवाद के मसले पर पूरे विश्व को एक होना होगा। इनके साथ चीन,म्यामांर, श्रीलंका, अमेरिका,इजरायल अब फ्रांस जैसा व्यवहार सम्पूर्ण विश्व को करना होगा। यदि अपने लोगों के जान-माल सुरक्षा चाहते है । नहीं तो ये घृणित और विकृत लोग टुकड़ो में लोगों को धर्म के नाम पर मारते रहेंगे।

कार्टून बनाने वाले, और उस टीचर को जो कार्टून का सबब अपने स्टूडेंट को बता रहा था काट दिया गया।
इसकी आलोचना करने पर दुनियाभर के मुसलमान बॉयकाट फ्रांस प्रोडक्ट का प्रोपेगैंडा चलाये है।

सुन्नी मुस्लिम का नया खलीफा तुर्की राष्ट्रपति एर्डोगन बन गया जो इस्लाम के लिए बहुत घातक सिद्ध होगा। वैश्विक राजनीति में आतंकवाद और इस्लाम को वह बखूबी भुना रहा है। फ्रांस के साथ यूरोप को बहुत बड़ी कीमत चुकानी होगी अपने देशों में मुस्लिम शरणार्थियों को बसाने के एवज में।

समानता और मानवाधिकार के समर्थकों का यही जनाजा निकालेगे। इस्लाम में मुसलमान होता है मानवता नहीं । यदि इतनी सी चीज आपको मालूम नहीं तो मरने के लिए तैयार रहिये। गला रेत कर या बम से परखच्चे उड़ कर यही विकल्प शायद मिले।

नारेतक़बीरअल्लाहु अकबर ! बम के लिए तैयार रहिये 😥

विचार भी भिन्न साँचे में जाने से मूल विचार खाँचे के आकार में ढल जाता है। मार्क्सवाद को ही ले लीजिए कही चे ग्वेरा ,लेनिन तो कही माओ के वाद के साँचे में ढल गया।

इस्लाम को देखे तो अरब के सांचे से निकल कर मध्यपूर्व से इंडोनेशिया फिर देवबंदी,सहारनपुरी,
मरकज का आकार बदल गया। सच्चा इस्लाम चलने से पहले ही लुप्त हो गया। कुछ सूफी से शांति का पाठ पढ़ाने का प्रयास किया उनका भी कत्ल कर दिया गया।

सबसे बड़ी कमी यह है कि गलत को गलत अब कहा नहीं जाता। वह साहस आधुनिकता और बौद्धिकता के तथाकथित प्रयास में खो गया। क्योंकि सोच यह रहती है कि वह क्या सोचेंगे?

आज कट्टरपंथी मुसलमानो को कोई आईना दिखाने का साहस नहीं करता है। जिस तरह धार्मिक कट्टरता के नाम लोगों के सिर काट देते है जैसा कि अभी पेरिस के स्कूल में टीचर का सिर उसके कट्टरपंथी मुस्लिम शिष्य ने काट दिया। क्योंकि उसने समझाने में मुहम्मद के कार्टून का उदाहरण दिया था ?

धर्म क्या है ? मुस्लिम अभी भी वाजिब परिभाषा के बगैर मनमौजी व्याख्या करने में लगा है। अरबी,ईरान,कुवैती,सीरिया,नाइजीरिया ,इंडोनेशिया सब का इस्लाम अलग अलग है। मुस्लिम फिरकापरस्ती से सभी परेशान है। वह ईशनिंदा का खाँचा बनाये है जिसमें आल्हा और नबी पहले पर कुरान दूसरे पर है। यदि आप से कही इनके खिलाफ गलती हुई तो समझये कभी में गला रेत कर बदल ले लिया जायेगा।

आधुनिक दुनिया में ये जाहिल,जंगली खून का खेल खेल रहे है जिन्हें धर्म से मतलब नहीं वही पैगम्बर बनने का स्वप्न बुना है। किसी को कत्ल करने की इजाजत यदि कोई धर्म देता है तो यकीन मानिये वह धर्म नहीं है। वह कौम ही हो सकता है।

मुस्लिम की तादाद बढ़ाने के लिए एक हथकंडा यह बनाने है गैर मुस्लिम लड़की को प्रेमजाल में फंसा कर एक नया मुसलमान बना लेना। फिर वह अपने घर की बैरी हो जाएंगी।

यदि मनुष्य होकर इतनी गंदी सोच है किसी अन्य धर्म के लिए दूसरी ओर इसपर धार्मिक सहमति भी सम्मिलित है तो यह उस धर्म भयंकर तबाही की ओर ले जायेगा। जैसा कि इस्लाम के साथ है बस उसके मानने वाले आंख पर बुरखा डाले है।

भारत में एक तथाकथित सेकुलर वर्ग है जो अपनी राजनीतिक पिपासा के लिए कहते है आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है। शर्लो एब्दो के कार्टूनिस्ट और पेरिस में हुये टीचर के कत्ल के कौन सा धर्म जिम्मेदार है यह कहने में मासूमियत कैसे आ सकती है।
@धनंजय_गांगेय

जब राजनीति बदचलन और झूठी है तब न्याय कैसे मिलेगा। ये अंग्रेजी वाला न्याय शास्त्र जो सीधे इंग्लैंड से लाद लाये। वह भारत को न्याय कैसे देगा। मैकाले कहता था कि भारत के समाज से सबसे पहले न्याय व्यवस्था को खत्म करना है।

जब न्याय की बारी आती है तुम जाति,
प्रजाति,सम्प्रदायिक चश्में चढ़ा लेते हो।

वह स्त्री को न्याय कैसे देगा? न्याय के पूर्व उसकी पूरी स्थिति समझी जाती है। जैसे वह
अल्पसंख्यक है कि नहीं,दलित है कि नहीं ,
अपराध करने वाला सवर्ण समाज ब्राह्मण,ठाकुर से ताल्लुक रखता है नहीं, आदि-आदि।

यदि यही अपराध दलित- मुस्लिम द्वारा सवर्ण पर किया गया है तो उसे उस तरह के अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं किया जायेगा। क्योंकि यह सेलेक्टिव सोच में फिट नहीं बैठती न ही नैरेटिव की आगे बढ़ा पायेगी । जैसे मुम्बई की मायानगरी में फ़िल्म में एक गरीब अभिनेता न्याय के लिए संघर्ष करता हुआ। वही दबंग ठाकुर एक दबे कुचले वर्ग की लड़की का रेप करता है,उसका सलाहकार ब्राह्मण है ।

ऊपर से वर्षों से उस गरीब परिवार को सूद तले दबाते सेठ जी भी है । इस स्क्रिप्ट पर फ़िल्म की कहानी चटकारे दार बनेगी।उसका प्रभाव समाज में जायेगा। फिर कही किसी साधु और पुजारी को जला के मारा जायेगा।

कुल जमा समाज में पूर्वाग्रह उसी तरह बैठाया गया है जैसे अंग्रेज उद्धारक थे। मुस्लिम भारत का विकास करने आये थे उन्होंने कोई मंदिर नहीं तोड़ा न ही समाज को प्रताड़ित किया। वह तो सेकुलिरिज्म में बहुत पहले विस्वास करते थे। इसी को आगे बढ़ाने के लिए गंगा-जमुनी संस्कृति की शुरुआत की।

इस्लाम जो पूरे विश्व में धर्म के नाम पर तबाही मचाये है वह भारत में गीत गाता है “पीड़ पराई जान ले।” दलित,अल्पसंख्यक,पिछड़ा कहना राजनीति में सफलता की गारंटी है । जिसका सहारा बड़े से लेकर टुच्चा नेता करता है।
गांधी जी हिन्दू उसे कहते थे जो दूसरे की पीड़ा जानता है।

लुटियंस गिरोह की नजर में हिन्दू आतंक और पर को पीड़ा देने वाला धर्म। स्वच्छंद वेश्यायें समाज सुधारक बनी है उच्चश्रृंखल पुरुष नीतिकार।

अब कैसे करेंगे समाज तैयार !
जब कि जाति बना दिया गया राजनीति में हथियार। मानवता का पाठ विश्व को सीखाने वाला सेकुलरों को आतंकवाद की पाठशाला नजर आता है। वास्तव में विश्व को आतंकवाद देने वाला शांतिकौम बन जाता है क्योंकि सत्ता की सीढ़ी उसके वोट से जो चढ़ जाता है।

हिन्दु को दलित,महादलित,पिछड़ा,अत्यन्त पिछड़ा,सवर्ण में बांटा जाता है क्योंकि यह लोकतंत्र है दोष ब्राह्मण पर लगाया जाता है।

कोई इन गिद्दों से नहीं पूछता 70 साल में तुम क्या कर पाएं ? शिक्षा को तुम ऐसा बना दिया छोटी-छोटी बच्चियों में वासना दिखने लगी। नारी का शोषण दिल्ली-मुम्बई में होने लगा। उन आदिवासी,ग्रामीण क्षेत्र में जहाँ नग्न हो नहाती है वहाँ उनकी इज्जत बची है क्योंकि तुम्हारी विदेश वाली सीख अभी नहीं पहुँची है।