भारत का इतिहास @INDIAN HITORY

भारत का सम्बंध अपने पड़ोसी और अन्य विदेशी शासकों से रहा है इसका प्रमाण हमें मिलता रहा है। पश्चात में कोई बौद्ध,ईसाई और मुस्लिम बन गये। आज भी विश्व में पुरात्विक साक्ष्य मिलते है जिनमें भारतीय सम्बन्धों की पुष्टि होती है। सबसे महत्वपूर्ण है कि उन मिले प्रमाणों के विवेचन हमने कैसे किया है।

रोमन बस्ती का अरिकामेडु से मिलना ,शैलेन्द्र वंशी राजाओं की समुद्र गुप्त से अपील बोधिगया में बौद्ध मंदिर बनवाने को लेकर रही हो। दिलमुन,माकन, मेलुहा ,फारस के विषय मे वर्णन मिलता है।

एशिया माइनर (तुर्की) बोगजकोई अभिलेख से संस्कृत में इंद्र,मित्र,वरुण,नासात्स के विवरण को गलत तरीके से अंग्रेजी इतिहासकारों ने व्यख्यायित किया।

बोगजकोई का अभिलेख बताता है कि भारतीय संस्कृति का विस्तार सीरिया और तुर्की तक प्रत्यक्ष रूप से था। आज भी तुर्की में यत्र तत्र शिवलिंग प्रतिकृति दिखाई पड़ जाती है। चीन का शिजियांग प्रान्त कभी खोतान देश हुआ करता था जिस पर भारतीय वंशज कुमारजीव ने शासन किया था।

इसी प्रकार थाईलैंड,कम्बोडिया,लाओस,वियतनाम,
मलेशिया,इंडोनेशिया ,मैक्सिको,होंडुरास ,जापान और कोरिया तक में भारतीय संस्कृति और भारतीय शासन का विस्तार हुआ ।

यूरोप के रोमा समुदाय जिनका निकट का सम्बंध भारत से है। यह बताता है कि एक समय यूरोप के बड़े भू भाग पर भारत का शासन था। भारत के महान सम्राट विक्रमादित्य अपने शासनकाल 57 ईसा पूर्व में रोमन शासक जूलियस सीजर को रोम से गिरफ्तार करके दंडित किया था।

भारत का वर्णन मेगस्थनीज की इंडिका,टॉलमी की ज्योग्राफी, प्लिनी के नेचुरल हिस्टीरिका और पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रियन सी में भी मिलता है। भारत इतना कौतूहल का विषय विश्व समुदाय के लिए क्यों रहा है?
निश्चित रूप से इसका कारण भारत का व्यापार,शिक्षा प्रणाली,सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था थी।

ग्रीक,रोमन,मिश्र से हमारे सम्बन्ध प्राचीन समय में सुदृढ़ रहे है। जो भारत की विज्ञान तकनीकी को भी परिलक्षित करता है। भारत में प्राचीन काल में समुद्री जहाज और समुद्री यात्रा यंत्र विकसित किये थे। किंतु अंग्रेज इतिहासकारों ने जो भी भारत के लिए कहा उसे हमने आंख बंद कर मान लिया। बिना समुद्री जहाज के भारत का इतने दूर देशों में पहुँचना आसान कैसे होता।

अंग्रेजों के साथ एक दिक्कत थी उनका पूरा विकास ईसा के बाद संभव हुआ है और इसी चश्मे से वह विश्व को उलट-पलट के देखता है और वर्णित करता है ईसा के पूर्व धरती पर कोई विकसित सभ्यता नहीं रही है। भारत के वामपंथी इतिहासकार अंग्रेजी इतिहासकारों को चुनौती देने की जगह उनके ही कथनों की पुष्टि कर दी।

भारत की संभावनाओं को अंग्रेजी संदूक में भरकर उसे यूरोप से आयातित कह दिया गया। “आर्यन थियरी” के माध्यम से भारतीय मूल आर्य को ही विदेशी ठहराया गया बोगजकोई अभिलेख के आधार पर। स्मिथ आदि अपने इतिहास लेखन में माना कि भारत सदा से विदेशियों द्वारा शासित होते रहे है।

बागपत के सिनौली की खोज, जो इतिहासकारों और तकनीकी के माध्यम से हमें 4000 साल पूर्व ले जाती है अभी और खोजें होनी बाकी है। यहाँ से रथ, मूठ लगी तलवार,स्त्री योद्धा का प्रमाण मिला है। रथ जो घोड़े से खींचे जाने वाले है। भारत में हड़प्पा की खोज में अंग्रेजों ने घोड़े के प्रमाण को नहीं माना था जबकि सिनौली भारत में घोड़े नहीं होने के मिथकीय प्रमाण पर विराम लगाता है। यह भारत की प्राचीन सभ्यता में शुमार की जा सकती है।

एकबात जो गौरतलब है कि बागपत जिला पांडवों द्वारा दुर्योधन से मांगे गये पांच गांवों में से एक था। आगे की खोजें भारत के औपनिवेशिक इतिहास के स्वरूप को बदल देगी। क्योंकि भारत के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का कारण एक राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति कराना रहा है । योद्धाओं और वीरांगनाओं की भूमि को सत्ता की पिपासा ने नपुंसक के रूप में पेश किया।

MSP घोटाला ●

°°°°°°°°°°°’°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
घोटाले का तंत्र
••••••••••••••••
Msp घोटाले में मार्केट इंस्पेक्टर,स्थानीय कर्मचारी,
लोकल नेता और दलाल मिल कर सरकार की योजना पर पानी फेर दे रहे है। किसान के रजिस्ट्रेशन के बाद कई तरह मीन-मेख निकाल देते है दूसरे उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में इसबार क्रय केंद्रों पर मंसूरी धान की खरीद हो रही थी अन्य धान की पहुँच MSP से दूर थी।

खंड स्तर से शुरू होकर यह MSP राज्यों के स्तर पर आसन्न भ्रस्टाचार में लिप्त होगयी है देश स्तर पर इसका घोटाला लाखों करोड़ का होगा। जनता के पैसे को अधिकारी,दलाल और नेता पानी कर दे रहे है।

सरकार ने Msp 1868 ₹ सामान्य धान के लिए घोषित किया है । जिस किसान ने पिछले बार क्रय केंद्र पर धान बेचे है लेकिन इस पर बार वह “मंसूरी धान” न होने की वजह नहीं बेच पाया। उसके खाते का भी रजिस्ट्रेशन मिली भगत से करके धान बेच लिया जाता है। धान की खरीद सरकार क्षमता से अधिक करती है लेकिन उसका लाभ किसान को नहीं मिल पा रहा है।

दूसरी तरफ किसान के खाते में कोई समस्या दिखा कर किसान के धान नहीं है या धान की गुणवत्ता में कमी,धान में धूल आदि कह कर भी कम दाम में लिया जाता है। एक जुगाड़ और चलता है कि आप का इतना कुन्तल है आप इतना पैसा एडवान्स दे दीजिए आपकी खरीद हो जायेगी।

उसी जगह पर मील वाले और व्यापारी का धान धड़ल्ले से ले लिया जाता है। घपले बाज बाकायदा एक टीम बनाये है जो किसानों के यहाँ जाकर उनका धन घर से तौल कर कम कीमत पर लेकर लेवी पहुँचा देते है।

भ्रष्ट्राचार का एक पूरा तंत्र विकसित है जो सरकारी व्यवस्था को पंगु कर देता है कोटरदार,प्रधान,ग्राम सचिव तक हाल बहुत बुरा है। सरकारी लाभ जो जनता तक पहुँच सके वह सब बीच में इनके घर भर रहे है।

सार्वजिनक वितरण प्रणाली (PDS) में जितना खाद्यान सरकार से तय है उसमें वजन कम जरूर देगा। पूछने पर कोटेदार कहता है कि घर से नहीं देगें हमें भी ऊपर तक देना रहता है।

यह धंधा मौन स्वीकृति पर चल रहा है किसी शिकायत पर एक मैनेज करने वाला मैकेनिज्म रहता है जो शिकायती पर दबाव डालकर उसे शिकायत लेने पर मजबूर करता है।

प्रधान,कोटेदार,सचिव,लेखपाल,थाने, लोकल नेता सबकी मिलीभगत से जुगाड़ चल रहा है। आम जनता कहा तक और किससे- किससे शिकायत करें।
सब जगह दलाल और सरकारी गिद्ध सक्रिय है।

लौटते है MSP घोटाले पर सरकार को चाहिए कि किसानों का जितना भी कोटा है उस पर बायोमेट्रिक व्यवस्था को लागू किया जाय। जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि खरीद सही व्यक्ति से हो रही है। साथ ही जिस किसान की फसल क्रय नहीं कि गयी उस पर रिपोर्ट लगायी जाय उसके साथ किसान का सहमति पत्र भी रहे जिसमें स्पष्ट कारण हो किसकी वजह से किसान की फसल खरीद नहीं हो सकी है।

-किसान पोर्टल पर किसान अपने बोए गए फसल क्षेत्र के अनुसार धान/गेहूं का रजिस्ट्रेशन करवाता है।

किसान के खतौनी नंबर का प्रयोग करके कोई भी व्यक्ति बटाईदार या कांट्रैक्ट फाॅर्मिंग के विकल्प द्वारा फर्जी रजिस्ट्रेशन कर सकता है।

  • खरीद केन्द्र पर केन्द्र प्रभारी को घूस देकर आराम से फर्जी रजिस्ट्रेशन पर धान बेंच सकता है।

-बिचौलिए उपरोक्त प्रक्रियाओं को अपनाकर ही पहले किसान से MSP से आधे मूल्य पर फसल खरीद लेते हैं और केन्द्र प्रभारी को रिश्वत देकर आराम से अच्छा मुनाफा कमाते हैं

-देखने में ये भी आया है कि केन्द्र प्रभारी जो कि सरकारी नौकर(SMI) होता है, वह किसानों के गतवर्ष के कागजातों को सहेजकर इस वर्ष घोटाला करता है। यानी किसानों के खाते का फर्जी बटाईदार बनकर।

अब इस घोटाले से निपटने का सबसे सरल उपाय जो सरकार को लागू करना चाहिए वह निम्नलिखित है….

किसान रजिस्ट्रेशन में किसानका बायोमेट्रिक(अंगूठे का)सत्यापन अनिवार्यकिया जाए।

बटाईदार और कांट्रैक्ट फार्मिंग के विकल्प को किसान द्वारा ही भरा जाए। यानी बटाईदार का भी रजिस्ट्रेशन भी किसान द्वारा ही हो और प्रपत्र में बटाईदार और कांट्रैक्टर का विकल्प चुनने का अधिकार केवल किसान को ही हो। क्योंकिकिसान को ही पतावहै कि वास्तविक बटाईदार/कांट्रैक्टर कौन है।

रजिस्ट्रेशन का सबसे घातक विकल्प यही है जिसके द्वारा बड़े पैमाने पर घोटाला हो रहा है। इस प्रकार किसान की खतौनी का इस्तेमाल करके कांट्रैक्टर या बटाईदार न तो रजिस्ट्रेशन कर पाएंगे और न ही धान विक्रय कर पाएंगे।

  • रजिस्ट्रेशन प्रपत्र में बटाईदार/कांट्रैक्टर का विकल्प चुनने के बाद उसका आधार व बैंक ब्यौरा भी किसान द्वारा ही भरा जाए और बटाईदार/कांट्रैक्टर का भी बायोमेट्रिक सत्यापन किया जाए।
  • अंत में सरकारी खरीद केन्द्रों पर तौल के समय भी किसान/बटाईदार/कांट्रैक्टर का बायोमेट्रिक सत्यापन किया जाय।

जनता का पैसा जनता की भलाई के लिए प्रयोग न होकर अधिकारी और दलाल की कमाई का साधन बन गया है?

दिल्ली में चल रहा किसान आंदोलन का एक मुख्य विषय MSP है और MSP की व्यवस्था ऐसी बना दी जा रही है। किसान की मजबूरी है कि तैयार फसल को कितने दिन तक अपने पास रखे जबकि फसल मूल्य से उसके काफी काम होने बाकी रहते है।

MSP क्या है…
—— ———-
न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP) सरकार की ओर से किसान के उपज की गारंटी है। देश में पहली बार MSP की जरूरत लालबहादुर शास्त्री जी के समय में 1966-67 में गेहूँ के लिए ऐलान किया गया। फिलहाल यह रवि और खरीफ मिलाकर 20 से अधिक फ़सलों पर दिया जाता है।

MSP का निर्धारण कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा किया जाता है। अगर मंडी में किसान को MSP से ज्यादा पैसे नहीं मिलते तो सरकार किसान की तय मूल्य पर खरीद कर उसका भंडारण फूड कारपोरेशन आफ इंडिया (FCI) और नफेड के पास करती है। इन्ही स्टोरों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के जरिये गरीबों तक सस्ते दामों में अनाज पहुँचाया जाता है। यह 20 से ज्यादा फसलों पर दिया जाता है जबकि सरकार आधिकांशत: गेंहू-चावल का क्रय करती है।

बड़ी से बड़ी व्यवस्था यदि भ्रष्टाचार के चपेट में आ गयी तो वह मूल उद्देश्यों के पूरा होने के पहले ही दम तोड़ देती है। किसान की आय 2022 तक दुगुनी कैसे होगी जब वह इन गिद्धों के चंगुल में रहेगी। सरकार को एक सुदृढ़ मोनिटरिंग व्यवस्था रोपित करनी चाहिये जिससे किसान और आम जनता के हितों का संवर्द्धन हो सके।

सत्ता संघर्ष बनाम भारत ••

•••••••••••••••••••••••••

कुछ चीजें हमें नये सामाजिक सुधार में अभी से ध्यान में रख कर करनी होगी जिससें हमारा सामाजिक ढांचा प्रभावित हुये बिना गतिशील निरन्तरता को प्राप्त कर सके।

भारत में कई तरह के समूह बन चुके है ज्यादातर समूह राजनीतिक खेमें में विभाजित है वह एक पार्टी विशेष की विचारधारा के इर्द गिर्द चीजों को बुनते है। उसका फायदा उन्हें कई तरह से राजनीतिक पार्टियों से मिलता है।

भारत में कुछ वर्ष पूर्व तक एक घोषित विचार था सेकुलरिज्म जिसके कई स्वरूप है वामपंथी सेकुलरिज्म मुस्लिम सेकुलरिज्म , राजनीतिक सेकुलरिज्म और छुपा सेकुलरिज्म यह सब सत्ता को स्थायी रखने का राजनीतिक उपाय था।

माबलिंचिंग का सूरतेहाल यह है कि यह भी सेकुलरिज्म का चोला ओढ़े है। जब हिन्दू द्वारा किसी मुस्लिम को चोरी करने के लिए हिंदुओं द्वारा मार दिया जाता है। तब यह माबलिचिंग की श्रेणी में डाल कर हो हल्ला मचाया जायेगा । “वही किसी हिंदु को मुस्लिम भीड़, धर्म के नाम पर उसके घर में घुस का चाकू मारे वह मॉबलिचिंग की श्रेणी में नहीं आयेगा”। क्योंकि इससे बहुत से राजनीतिक विचार को खाद नहीं मिलती है। तो मौन और सन्नाटे से काम चलाया जाता है।

देखने का ढंग बन गया है कि दलित,पिछड़ा और मुस्लिम होगा तब चक्का जाम किया जायेगा। डिस्क्रमिनेशन एक समान घटना पर अलग-अलग है। बात यह भी सही है जहाँ मांस दिखेगा गिद्ध वही मंडरायेगा….

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कितनी लम्बी है इसे संविधान नहीं बता सकता है। हिन्दूधर्म के विरुद्ध,देश के विरुद्ध असीम आजादी है।

भारतरत्न सचिन,लतामंगेशकर देश की संप्रभुता की बात करते है, विदेशियों को दखल न देने की नसीहत दे। तब केरल से दिल्ली तक हाय तौबा । दिल्ली नेक्सस जो कल देश का नैरेटिव सेट करते थे वह क्रोनोलॉजी गढ़ने लगते है। जिसको न पता वह न बोले।

भारत के मामले में विदेशी को अधिकार है बोलने का! किन्तु देश हित में भारतरत्न को बोलने ज्ञान नहीं है😊

भारत को कोई मुगल,अफगान,तुर्क या अंग्रेज कभी गुलाम नहीं बना सकता था जब तक यही के लोग आस्तीन के सांप न बनते। आज के राजनीतिक परिदृश्य में देखा जा सकता है।

हिन्दू को मुस्लिम धर्म के नाम पर मारे तो यह ला एन्ड आर्डर वही मुस्लिम चोर और गो तश्कर को गांव मारे तो माबलिचिंग ।

राजधानी में राष्ट्रध्वज के अपमान की जहग फेक आंदोलन की कसीदाकारी की जा रही है। पुरानी पार्टी सत्ता के लिए कभी खालिस्तान को खड़ा किया कभी 370 ,कभी वेल्लू प्रभाकर को। बस कैसे करके सत्ता बनी रहनी चाहिए।

कश्मीरी पंडित के नरसंहार पर करेजा नहीं पसीजा, न ही महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों के नरसंहार पर। किन्तु राष्ट्रद्रोहियों के लिए छाती में दूध उफान मारने लगता है। जब कोई राष्ट्रविरुद्ध काम हो ,सेना से सबूत मांगने हो।

विपक्ष दिशाहीन हो चला है उसके पास न नेता है न ही नीति। वह आव-बाव के सहारे सत्ता सुख उठाना चाहती है। ढंग के विषय उसे राजनीति में नहीं मिल पा रहे है जो मुद्दा लेकर चलना चाहता है जनता छोड़िये, कोर्ट में भी मुंह की खा जा रहा है।

दरबारी पत्रकार और दरबारी इतिहासकार पिछले 70 सालों से भारतीयों में भारत के खिलाफ नकारात्मक विचार भर रहे है। टुकड़े टुकड़े में सत्ता का गणित जो छिपा है। उसके लिए वह डिजिटल षडयंत्र भी करने से बाज नहीं आ रहा है।

सबसे बड़ी समस्या इनके लिए क्या है?

आत्मनिर्भर भारत ! भारत क्यों विश्व महाशक्ति बन रहा है? भारत की शक्ति अंतरराष्ट्रीय पटल तक क्यों हो गयी।
कितना मेहनत के बाद धूल,गन्दगी,नट और सपेरों का देश का तगमा प्राप्त किया था।

राजनीतिक जातिवाद ,दलित,शोषित,वंचित,पिछड़ा,
अल्पसंख्यक कहने से सत्ता मिल जाती थी। धर्मांतरण का खेल बहुत अच्छे से भारत भूमि पर चलता था।

तुमने “राजनीति की वह बगिया उजाड़ दी जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता मिलती थी”। लौंडे जो मुख्यमंत्री बनते वो अब बेरोजगार है। विपक्ष की बिलबिलाहट समझिये,किसी और तकलीफ से कही ज्यादा है सत्ता छिन जाने और दूर तक मिलने के आसार भी नजर नहीं आ रहे है । इसी लिये तो बात-बात लोकतंत्र अपमान और संविधान उल्लघंन के साथ फासिस्ट की बात की जा रही है।

ये जो रोज धरना और आंदोलन चल रहा है उसके पीछे भी पूरा तंत्र है सत्य की लड़ाई की जगह झूठ की बाँह मरोड़ने का करतब इसलिए है कि शायद इससे ही काठ की हाड़ी दुबारा चढ़ जाय। लेकिन ये स्थिति को और खराब करेगा।

कोरोना की दवा भारत में क्यों बन इस बात की गहरी तकलीफ है पुरानी पार्टी सोच रही है कि काश कि वह सत्ता में होते तो चीन वाली वैक्सीन का आयात कर लेते जिससें परिवारों को स्विस बैंक में डारेक्ट अरबों डॉलर मिल जाते।

विदेशी प्रोपेगैंडा भारत मे चलता रहे लोग गुलामी की मानसिकता से न निकले गधे को नेता इस लिए मान ले क्योंकि उसकी नानी घोड़ी की नस्ल की थी। भारत और उसकी संस्कृति की जगह इन्हें सत्ता की जुगत है उसके लिए वह किसी स्तर तक जा सकते है।

नेता की नियत के क्या कहने ,ये उसके पूर्वजों के खून की जद्दोजहद है लेकिन विचारक तो एक विशेष विदेशी विचार के लिए भारत से संघर्ष करने को आतुर है। उसकी संकल्पना भारत जले,दंगे हो ठीक है किंतु विचार खत्म नहीं हो पाये।

प्रश्न सत्ताजीवियों से है कि जिन्होंने 70 वर्ष के शासन में असमानता, जातिवाद,स्त्री शोषण, धार्मिक विद्वेष और किसान की हालत में कितना सुधार किया था ? यदि किया गया था आंदोलन की शाखा क्यों चलायी जा रही है स्वयं को शोषित प्रदर्शित करने से कुछ मिल सकता है।

प्रेम की फैशनपरस्ती और असलियत💐💐

भारत में फैशनपरस्ती नकल बहुत जबरदस्त है प्रेम भी वैलेंटाइन से सीख रहे है मदर, फादर,फ़्रेंडशिप डे अनाप शनाप मानते है दुःख इसका है की मेरे देश का युवान अपनी संस्कृति नहीं जानता,विदेशियों की मानसिक गुलामी को विवश है।

भारत में प्रेम के लिए किसी विशेष दिन का चयन नहीं किया गया था प्रेम स्वाभाविक मानसिक पक्ष है जिसके लिए आप 14 फरवरी के इंतजार कर रहे है उसे 364 दिन में कभी अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता थी। यह भी सच है भारत के प्रेम में व्यवसायीकरण नहीं निहित था। ग्रीटिंग,कार्ड,खिलौने,बुके,होटल आदि आदि। उसे हम आंखों से बया कर देते है जिसको समझना है वह आंखों से ही उत्तर दे देता है।

जहाँ प्रेम तह नेम नहि तह न बुधि व्यवहार ।
प्रेम मगन जब मन भया कौन गिने तिथिवार।।

भारत जैसे देश प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए हमें वैलेंटाइन जैसे प्रेत की आवश्कता पड़ रही है तब आप समझिये की जड़ो से कितना छिटक गये है। कब हमारे युवा अपनी संस्कृति की खूबसूरती को जानेंगे?

बंधु भावनाओं का व्यापार नहीं किया जाता है नहीं तो जिसे आप प्यार का नाम दे रहे हो वह खुमारी की उत्तेजना उतरते ही प्रेमी और प्रेयसी एक दूसरे के लिए कुत्ता-बिल्ली साबित होते है।

प्रेम मन का उद्वेग है जिसे मन ही समझ सकता है

“प्रेम न बाड़ी उपजय प्रेम न हॉट बिकाय”…

“छिन हँसे छिन रोये यह प्रेम न होये”…

Love

प्रेम समर्पण का नाम है जिसमें किसी प्रकार की वासना समाहित नहीं है वह निर्मूल और पूर्ण है प्रेम को जितना तुम शब्दों में बांधना चाहते वह शब्दों से मुखरित होकर मन की गलियों में गुंजायमान होने लगता है। प्रेम में द्वि का भाव खत्म हो जाता है। जब एक बार हो गया तब इस जीवन में दूजा रंग नहीं चढ़ता। वास्तव प्रेम रूपी समुद्र का जिसने रसास्वादन ले लिया उसे बाकी खारा लगने लगता है।

भुक्ति और मुक्ति दोनों नोन सी खारी लागे

प्रेम को लव और इश्क केचुल चढ़ा दिया तुमने। अब हमें दूर तलक प्रेम नहीं दिखता सिर्फ भावनाओं के बांध टूट रहे है मेरा भी एक पार्टनर कुछ दिन हो सिर्फ यही सोच कर हम भी गुलाब लिए गली गली भटकते फिरते है।

लेकिन प्रेमी फिर भी न मिला@ क्या तुम्हें प्रेम अभी तक नहीं मिला ..😜 धिक्कार है ऐसे जीवन का!!

गति…

जीवन कैसे जिये ! इसकी उमंग,तरंग और प्राण तुम हो।तुम्हारे होने मात्र से इसे ऊर्जा का पुंज मिल जाता है। शरीर की कोई भाषा नहीं है जबकि आत्मा सभी भाषाएं आत्मसात कर लेती है। समझना आत्मा को है किंतु समझाते सभी है। अपने को विद्वान सभी कहते है पर ज्ञान किसी को नहीं है।

प्रेम किसे कहू ? इसमें क्या हो जाता है जो प्रेम को पाने के लिए मन व्याकुल हो जाता है। जीवन,मरण,सृजन शाश्वत है जिसमें कर्ता हम नहीं है लेकिन दिखाते है हम कर्ता है। मनुष्य सदा से भगवान बनाना चाहता है देहाभिमान की तुष्टि यही है। वह “मैं” में विलीन होने को आतुर है।

यहाँ “मैं” एक भौतिक यूनिट का प्रतिनिधित्व करता है।
जबकि उपनिषदों में वर्णित “मैं” आत्मा और स्वयं के स्वरूप को निर्धारित करता है।

मन के आंदोलन में सभी इंद्रियां सिर्फ कार्यकर्ता बनी नजर आती है आत्मा पर अहं का पर्दा नशी कर दिया जाता है।

प्रभूत होने वाला जगत किसी का हो सकता है लेकिन मन की दौड़ कहती है इसे बेहतर हम बनाते है ईश्वर उत्पन्न करके छोड़ देता है। जो विकास दिखता है वह मेरे द्वारा किया गया है।

हम अनंत की कक्षा में विचरण करते हुए सूर्य से ज्यादा ताप संचरित करना चाहते है। भूमि की दूरी सेंकड में मापना चाहता है। मन है कि बन्धन में डालता है और वह परमस्वतंत्र रहना चाहता है। आत्मचिंतन स्वयं में हो सकता है लेकिन तब जब हमें आत्मा का बोध हो। यह बोध ज्ञान से संभव है ज्ञान कैसे आये ?

संस्कार संसार को ज्ञान से गुंजायमान कर सकता है बस तुम मन को तैयार करो।

आंदोलन का लब्बोलुआब……..

किसी आंदोलन के पीछे की शक्ति होती है जनविश्वास! जैसे ही हम जनविश्वास खो देते है वैसे ही आंदोलन खत्म हो जाता है।

जनतंत्र में विरोध एक प्रक्रिया है।सत्ता को इससे रोज दो चार होना पड़ता है। भारत में जनांदोलन के प्रणेता गांधी जी रहे है। अफ्रीका में किये अहिंसात्मक प्रयोग को भारत में लागू किया । उनके आंदोलन की खूबसूरती थी अनुशासन,नैतिक बल और अहिंसा ।

वह जानते थे शासन के विरुद्ध हिंसात्मक आंदोलन को ब्रिटिश बहुत क्रूर तरीके से दबा देंगे। साथ ही अहिंसात्मक आंदोलन को दबाने के लिए किये शासन द्वारा बल प्रयोग से शासन में जनता के विश्वास को बुरी तरह प्रभावित करेगा।

भारत में गांधीजी द्वारा पहला बड़ा सफल आंदोलन बिहार के चम्पारण में “तिनकाठिया” को खत्म करने के लिए किया गया। यह किसान आंदोलन था गांधी जी के आंदोलन के पीछे सबसे महत्वपूर्ण चीज अनुशासित कार्यकर्ता थे। गांधी जी का आंदोलन अपने में सफल रहता था वह रौलट सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन आदि में दिखाई भी देता है। असहयोग आंदोलन में “चौरी-चौरा” में हिंसा होने से गांधी जी ने अपना आंदोलन वापस ले लिया था।

इस समय हो रहे किसान आंदोलन में गांधीवादी विचार का पालन नहीं किया गया। हिंसा छोड़िये, राष्ट्र ध्वज का अपमान राजधानी में किया गया। जिसकी जिम्मेदारी आंदोलनकर्ता नहीं ले रहे है।

विचारणीय विषय है आंदोलन दिशाहीन नहीं होता तो कैसे उपद्रवी और आतंकवादियों के हाथ चला जाता। लोकतंत्र में विरोध का मतलब राष्ट्र की अस्मिता को तार- तार नहीं किया जाता। यदि आंदोलन की सफलता का श्रेय उसके नेता को है तो उसमें हुई गड़बड़ी की जिम्मेवारी भी उसी की बनती है। इससे पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता।

भारत में पिछले कुछ आंदोलन से देखा जा रहा है यह आंदोलन से ज्यादा राजनीतिक विचारधारा का विरोध क है। जिसके पीछे राजनीतिक एजेंडा और राजनीतिक पार्टियां कार्य कर रही है।

हमनें गांधी जी के आंदोलन से क्या सीखा?

यदि हिंसा करनी है तो गाँधीवाद को क्यों बदनाम किया जा रहा है। सत्ता की लालसा बार-बार केजरीवाल बनने से पूरी नहीं होगी।

देश में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है भारत मनमोहनसिंह वाला नहीं रह गया। अब वह विश्व में एक मजबूत देश बन चुका और उसकी धमक पूरा विश्व सुन रहा है। तुम राजनीतिक एजेंडा चला कर देश को बार-बार न विभाजित कर सकते हो न ही सत्ता प्राप्त कर सकते हो।

आंदोलन की सफलता ईमानदारी पर निर्भर करती है।

किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत जो अब के टिकैत के पिता जी थे वह नेता कैसे बने यह जानिए! वह अपने गांव के आस पास के लोगों को संगम नहलाने, मथुरा,काशी,आयोध्या फ्री घुमाने का वादा करके ,पार्टी की टोपी दे कर रेलवे की जबरी मुफ्त सेवा देने के बदले 50₹ लेते थे। फिर क्या गांव के लोगों को लेकर पहुँच जाते थे तीर्थ करवाने और लगे हाथ वही रैली कर लेते थे ।

रैली में टोपी-लाठी देखकर वहाँ भीड़ देखने के लिए इकट्ठा होती, लोगों के पूछने पर पता चलता था कि कोई किसान रैली हो रही है। “दूसरी चीज भारत में देखने वाला शौक भी बहुत है”। पुनः रेलवे से टोपी और लाठी के सहारे घर चले जाते थे। ऐसे तो किसान नेता पिता जी बने थे।

खैर बेटा टिकैत तो पूर्व में भी कई पार्टियों से चुनाव और राजनीतिक साठ-गांठ कर भी चुके है। आपको क्या लगता टिकैत,BN सिंह आदि किसान नेता है??

भारत खाला का देश नहीं 🚩

विश्व में भारत की पहचान उसके सनातन धर्म,मन्दिर और बौद्धिक लोगों से होती रही है। भारत अपने ज्ञान,विज्ञान,चिकित्सा पद्धति, ज्योतिष विज्ञान और निर्माण कला से प्राचीन विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया। विश्व में भारत बनने की होड़ लगी थी।

प्राचीन समय में ही भारत का सम्बन्ध बेबिलोनिया,हिब्रू, रोमन,यूनान, मिश्र आदि देश से रहा है। व्यापार अधिशेष सदा ही भारत की ओर था। रोमन,बौद्ध जैसे लोगों की कुत्सिगं चाले भारत में सनातन संस्कृति को नष्ट करने की, कभी सफल नहीं हो पायी। भारत के राजे विक्रमादित्य, पुष्यमित्र शुंग,गौतमीपुत्र शातकर्णी,वशिष्टि पुत्र पुलमाली,गुप्त सम्राट, हर्ष ,नागभट्ट ,बप्पा रावल और दक्षिण भारत के चोल- चालुक्य राजे सनातन धर्म के विद्रोहियों को भारत भूमि से खदेड़ते रहे है।

यह अनवरत संघर्ष बर्बर मुस्लिम लूटेरों के समय में भी जारी रहा। गजनवी,सैयद सालार,गोरी,

ऐबक,इल्तुतमिश, खिलजी,तुगलक से लेकर मुगल तक। यह जरूर है कि जो मुहम्मद गोरी के बाद वाले लुटेरे भारत को अपना आशियाना बनाया लेकिन बुतशिकन (मूर्ति तोड़ने वाला) की उपाधि भी धारण करते रहे। जजिया और तीर्थयात्रा कर लिया । भारत के मंदिर टूटते और लुटते गये इस्लामी सभ्यता भारत में पांव पसारती गयी।

अब आपके मन में प्रश्न होगा जब भारत में इतने बड़े बड़े योद्धा थे तब लुटेरा मुस्लिम भारत में कैसे सफल हो गया? इसको अच्छे से समझा जा सकता है जिसप्रकार आज सत्ता के गिद्ध भारत को नीचा दिखा रहे है भारत को तोड़ने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है उस समय यही घर के भेदी लंका ढाये। अपनों की मुखबिरी सत्ता पाने के लिए विदेशियों से की थी। भारत के राजे के पराजय में मुख्य कारण था गद्दारों का शत्रु खेमें में चले जाना। जिनकी तलवारें सैयद सालार को काट सकती थी
क्या वह अरबी,मुगल,पठान धड़ सर से अलग नहीं कर सकती थी।

भारत के राजाओं में एकता नहीं होने का फयदा विदेशियों द्वारा उठाया गया। बाकी का काम भारत के अंग्रेज परस्त इतिहासकारो ने कर दिखाया। अंग्रेज और बर्बर मुस्लिम लुटेरों का महिमामंडन करके दोष हिन्दू धर्म की कुरीतियों और ब्राह्मणों में खोज निकाला।

ईसाइयों को सबसे बड़ी कामयाबी तक मिली जब भारत के प्रधानमंत्री के पुत्र को एक बारबाला ने फ़सा के शादी कर ली। वह फायदा क्या था ? भावी प्रधानमंत्री और राजनीतिक का सहारा लेकर ईसाई मिशनरियों का खुला खेल फरुखाबादी चलाया जा सके। इस महिला के प्रभाव में कम से कम भारत के 5 करोड़ लोगों को ईसाई बनाया गया। एक नामचीन ईसाई धर्म परिवर्तन कराने वाली महिला को भारत रत्न भी दिया गया।

मुस्लिम शासको का उद्देश्य भारत में स्पष्ट था अवैध कब्जा और इस्लाम का प्रसार। ऐसा मत समझिये कि कोई मुस्लिम शासक किसी हिंदु से संवेदना रखता था। औरंगजेब के समय सबसे ज्यादा मनसबदार हिन्दू थे यह औरंगजेब हिंदुओं को हिन्दू से लड़कर वजीफा देकर इस्लामिक संस्कृति को बचाने के लिये किया था। हिन्दू तलवार हिन्दू के विरुद्ध मुस्लिम साम्राज्य की हिफाजत के लिए।

मुस्लिम शासक जितना हो सकता था उतना हिंदुओं का उत्पीड़न किया। अधोध्या, मथुरा,काशी,सोमनाथ,पाटन, पुरी आदि के मंदिरों को ध्वस्त किया।

दूसरा बड़ा लुटेरा ईसाई और अंग्रेज था जो भारत से व्यापार की नियत से आया और राजा बन बैठा। समाज में हिन्दू- मुस्लिम वैमनस्य का भरपूर लाभ लिया।

ब्राह्मण को सिनेमा,साहित्य के माध्यम विदूषक वही हिन्दू धर्म का बार बार मखौल उड़ाया गया। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में निरूपित किया।

न्यायालय ने हिन्दू को धर्म न मान कर एक जीवनपद्धति कहा जिसका मखौल फिल्मी भांड उड़ाते रहे है। जो आज भी अनवरत जारी है। किसी पैंगबर के कार्टून को चित्रित करने पर चित्रकार की गर्दन काट ली जाती है शोर शराबा विश्व भर में होता है मुस्लिमो की धार्मिक भावनाएं आहत हुई है इस लिए कमलेश तिवारी हो या चित्रकार उनकी गर्दन काटनी जायज है। इसका शोर भारत के टीवी डिबेट में भी सुनने को मिला है।

क्या हिंदु जब तक किसी हिन्दुधर्म के अपमान करने वाले कि गर्दन नहीं कटेगा तब तक यह फ़िल्म,साहित्य,
मुशायरे,मीडिया में हिंदू धर्म का अपमान होता रहेगा?

ईसाई -मुस्लिम जिसे आप धर्म समझ रहे हो वह धर्म होने की कोटि में नहीं है! जो धर्मावलंबी दूसरे धर्म वाले को हीन समझता । दूसरे की गर्दन काटने,अबोध जीवों को खाने का अधिकार देता है वह धर्म कैसे हो सकता है?

विचारों में विचार घुसेड़ने का षड़यंत्र

सही विचार सनातन शास्त्र वेद,उपनिषद, ब्राह्मण,आरण्यक, रामायण,महाभारत के साथ शंकराचार्य, रामानुजाचार्य,चाणक्य,भर्तहरि, विष्णुदत्त शर्मा द्वारा लेखन में झलकता है।

ज्ञान,विज्ञान,कला,व्याकरण,ज्योतिष,वैराग्य,धर्म,मर्म,
मुक्तिबोध भारतीय दर्शन से होता है । धर्म की विधियों का विधिवत पालन करने से धर्मापेक्षिक लाभ मिलता है। इसका पालक करके अनुभव प्राप्त कर सकते हो।

प्रश्न है किस विचार को सही माने.. जिसपर सदियों के अनुसंधान का अनुभव है या उसे जो स्वयं की समस्या या किसी देश के हित में रखकर किसी नये तरह की थियरी गढ़ ली गई वह ही सही है….जैसे जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त नहीं होता था उस व्यवस्था को लाभ पहुचाने के लिए जिस विचार को रोपा गया। वह साम्राज्यवादी पूँजीवादी राजतंत्रात्मक लोकशाही के आसपास विचार बुने गये।

बढ़ते यूरोपीय औद्योगिकरण में मजदूर की समस्या जब मुँह उठाने लगी तब उसे शांत करने के लिए समाजवाद,मार्क्सवाद के बीज बोने शुरू किये। लेकिन मजदूरों की समस्या अभी शांत न हुई थी कि उपनिवेशों की यूरोपीय होड़ ने दो विश्व युद्ध लेकर आया। पहले विश्व की समाप्ति की बेला पर फ्रांस द्वारा जर्मनी पर आरोपित वर्साय की संधि ने हिटलर के फाँसीवाद को पैदा कर दिया। उसे लगा इसी से वह जर्मनी को फिर से खड़ा कर सकता है। नये उभरते देश जापान और रूस ने दूसरे विश्वयुद्ध की आपदा को अवसर में बदलने की चेष्टा की।

दूसरे विश्व का माहिर और शातिर खिलाड़ी अमेरिका अपनी नई विचारधारा “व्यवहारवाद”और “देहवाद” को आधुनिकता और लोकतंत्रवाद की चपेट में लपेट लाया। सत्य को व्यक्तिपरक करार दिया। इस नई पूंजीवादी व्यवस्था को बाजारवाद और उदारवाद दो नये कपड़े लपेटे गये।
•••••••••••••••••

नये नये देश नये नये विचार और उसकी पुष्टि से पुराने जांचे परखे विचारों को तोड़मोड़ कर दिया। अब पुरानी हवेली पर नये “टीन सेट” में रहने को आधुनिक और विकासवादी कहा गया। किसी अन्य व्यवस्था के पोषक नये विचार को परोसना शुरू किया। दर्शन के क्षेत्र में उत्कट अनुभववाद,अस्तित्व वाद और मानववाद की पतंग उड़ाई गयी। यह रंगविरंगी पतंग अपनी जड़ से कटे लोगों को खूब भायी।

इतिहास की साम्राज्यवादी,मार्क्सवादी लेखन ने मूल इतिहास को ही गायब कर दिया। सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर सेकुलर वामपंथ विचार ने समाज को ही बाजार बना दिया। लोग हित देख मौन मनमोहन बन गये।
★★★★★★★★★

खाद्यशास्त्र को खाद्य विशेषज्ञ ऐसा सिद्ध किया कि प्राचीन पोषक खाद्यश्रृंखला के स्थान पर मांस और बीमार करने वाले भोजन को रोपित किया…. जिससें बाजार के साथ मेडिकल उद्योग को नई उड़ान मिल सके। सबसे बड़ी बात इन सब की पुष्टि के नये प्रतिष्ठित जनरल और नोबल जैसे पुरस्कार और इनके कार्यक्रम का बड़े स्तर पर लांचिंग की गई। लांचिंग सफल हो इसके लिए मीडिया,साहित्य और सिनेमा को भी भागीदार बनाया गया।

समस्या वही है कि आखिर मूल विचार क्या था जो मनुज के अनुरूप था। अब तो इसी का रिसर्च होना है…। हिटलर कहता था झूठ को लाख बार बोल दीजिये वह सत्य पर भारी पड़ जायेगा। अर्थात सबसे बड़ा सत्य वही बन जायेगा। यह मीडिया संस्थान सबके राजदार बन गये पुलित्जर और मैग्सेसे पुरस्कारों से नवाजे गये। यह पुरस्कारों की श्रृंखला अन्य महकमे में बदस्तूर जारी है।

सही और गलत का अनुमान लगाना वैसे ही मुश्किल हो गया है कि जैसे मुर्गी पहले आई कि अण्डा। लेकिन जीभ का स्वाद दोनों को बनना है।

विश्व की विविधता को छद्म विकासवादी विकास और सुधार के नाम नष्ट कर रहे है इतिहास में ऐसे नैरेटिव सेट किये गये की राणा,शिवाजी, बाजीराव देशद्रोही वही अकबर राष्ट्रवादी औरंगजेब सेकुकर । बर्बर विदेशी आक्रांता निर्माणकर्ता, लुटेरा अंग्रेज भारत का उद्धारकर्ता। ईसाई मिशनरियां सबसे बड़ी सेवादार।

भारतीय व्यवस्था बिल्कुल सड़ी हुई थी उसे कोई मुगल या अंग्रेज लपक सकता था। भारत की विविधता की बात हो तो वह चाहे संस्कृति, समाज,बाजार,व्यापार,
समयानुकूल खाद्यान्न,परिधान सबको गल्प इतिहासकारों ने वर्णन नहीं किया या छुटपुट इसतरह का वर्णन किया कि वह आपको भी बुरी लगे। भारत के राजे और राजगुरु को आधुनिक शासक और विचारकों का विरुद प्रदान किया गया। क्षेत्रीय सामाजिक समस्या को अखिल भारतीय सनातन धर्म की समस्या कह कर स्कूली शिक्षा में पर्दा,सती प्रथा नाम दिया लेकिन इनके पीछे के उन कारणों को नहीं बताया।

आर्यो को बाहरी मुगल को देशी बना दिया गया। अंग्रेज व्यापारी था भारत की कुव्यवस्था देख कर राजनीति में हिस्सेदारी करने लगा। वहाँ सीनेट भारत की बेहतरी के लिए काम कर रही थी।। वह तो 1857 के स्वतंत्रता समर नायक,नायिका अपने स्वार्थ के लिये जब विद्रोही से मिल गये, समाज में अव्यस्था फैल गयी तब जाके बेचारी रानी विक्टोरिया ने कम्पनी से शासन की बागडोर ले ली। ऐसा तो इतिहास हमारे स्कूल में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।

आर्य,हिब्रू,हित्ती,बिबिलोनियन,चीन,ग्रीक,रोमन, माया,नील घाटी,जापानी सभ्यता को नदी मान कर उन्हें अंग्रेज रूपी राक्षसी समुद्र में उड़ेल कर आधुनिकता का जामा पहना दिया गया। नस्लों, धर्मो की सांप सीढ़ी का खेल विश्व के मैदान पर विचारक कलम से खेल रहे है। तुम सुबह के न्यूज पेपर का इंतजार करो ,दिनभर का मसाला मिल जायेगा। यह ऐसा नशा है जो सीधे दिमाग की नशों में घुस जाता है । फिर तुम्हारें पास विचार करने का विचार कहाँ रह जाता है।
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

Happy new year😑

यह किसका नववर्ष है कौन सेलिब्रेट कर रहा है?

सनातन परंपरा में मृत्यु भी एक बड़ा महोत्सव होता है उसका कारण यह है कि लोगों का मानना है जीव को जरामरण चक्र से छुटकारा मिल गया है।

मनुष्य को देखे तो उसके जीवन से एक महत्वपूर्ण वर्ष और 31564512 सांसे कम हो गयी। जिसमें मनुष्य जीवन का उद्देश्य सदकर्म किया ही नहीं । फैशन और देहवाद में हम ऐसे फंसते गये है कि बिना उद्देश्य के उत्सव माना रहे। अरे इस उत्सव के पीछे क्या विज्ञान है उस पर शायद कभी विचार नहीं किया गया।
::::::::::::::::::::::::::

शराब और न्यू ईयर की पार्टी उसके बाद जोर जोर से बोलना हैप्पी न्यू ईयर….। लोग इसके लिए बड़ी तैयारी करके रखते है। प्रेमी- प्रेमिका का मिलन हो या दोस्त-यार का । नये वर्ष का उद्देश्य नये प्लान बना का उसपर काम करने का होता है। लेकिन भारत में दारू,पार्टी,गोवा टूर आदि जैसे बुरे कार्य करके ही नया साल मुबारक हो रहा है। नई पीढ़ी प्रचार में फँस कर नये साल को जोर जोर से मनाने के लिए बेताब है। शिक्षा प्रणाली,मीडिया,टीवी कह रहे सेलिब्रेट करो नया साल। साली ये जिंदगी न मिलेगी दुबारा। ●●●●●●●

सिनेमा ऐसा शसक्त माध्यम है कि इमोशन डाल के बुरी से बुरी चीज के लिए सैम्पेथी ले जाते है। सिनेमा पर मन,आंख,कान के साथ शरीर भी एकाग्र रहता है। इस बुरे चलचित्र का प्रभाव हमारे युवा पीढ़ी पर सर्वाधिक है। आज का सिनेमा,सीरियल अच्छे से ज्यादा बुरे की पैरोकारी करता दिख रहा है। “बिगबॉस” कार्यक्रम का उद्देश्य बनाने वाला और देखने वाला दोनों नहीं जानता। फिर इसके दर्शक की संख्या बहुत है।
••••••••••••••••••••••••••

सनातन धर्म में नववर्ष की शुरुआत चैत्र प्रतिपदा से होती है। यह चैत्र प्रतिपदा हर वर्ष मार्च-अप्रैल के बीच पड़ती है। जिसकी शुरुआत देवी-देवता के पूजन से होती है। शराब या पार्टी की नौबत नहीं आती बल्कि नवरात्र का व्रत रखना होता है। बड़ा आसान है कुछ बुरा करना,नशा करना, पार्टी करना या नंगे-पुंगे को देखने की अभिलाषा लेकर गोवा आदि जाना। लवर बन कर किसी होटल में रूम खोजना।

वायरल जो हो रहा है

अंग्रेजी शिक्षा तुम्हें क्या से क्या बना रही है आपके पास इस पर विचार करने का टाइम नहीं है न ही अपने बच्चों के लिये ही है की वह न्यू ईयर के नाम पर क्या कर रहा/रही है। आपका बच्चा बड़े का सम्मान भूल गया,आपसे बात-बात झगड़ पड़ता है। लेकिन समय ऐसा है जब माता-पिता ही अपने लाडले/लाडली का जीवन पंगु और नष्ट कर दे रहे है।
°°°°°°°°°°°°°°°°°

बच्चे को नौकरी की शिक्षा देने से बेहतर है कि उसे भला इंसान बनने की शिक्षा दे। जिससें उसका रह-रह कर मूड न ऑफ हो। जीवन को कैसे आगे बढ़ाना है यह उसका विषय है। जिसतरह गाड़ी सीख लेने के बाद आप कही भी लेकर उसे जा सकते है। उसी प्रकार बच्चें में संस्कार डाल देने से वह अपने जीवन को कही भी लेकर जा सकता है।

दोष अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था से ज्यादा हमारा स्वयं का है जो अपने सनातनी संस्कार ,सनातन धर्म को भूल कर खिचड़ी सेकुलिरिज्म में फँस गया है। कैलेंडर की जगह कब संस्कृति बदल दी पता ही नहीं चला।हमें अपने मूल को जानना होगा जिसके जानने में विश्व का कल्याण छुपा है।

@धनञ्जय गांगेय

विरोध के पीछे का विरोध

पेप्सी,कोक,बेसलेरी,एक्वाफिना,नैस्ले,कैडबरी जहर खिलाये-पिलाये क्या मजाल कोई विरोध कर दे।
इंग्लिश मीडियम के स्कूल का विरोध नहीं क्योंकि आधुनिक बनाया जा रहा है। भले बच्चे आधुनिक शिक्षा लेकर माता-पिता से मारपीट करें।

विरोध वैदिक बोर्ड का करेंगे,अम्बानी,अडानी,पतंजलि
,टाटा और संस्कृत शिक्षा पद्धति का होगा। गीता विश्व के स्कूलों में पढ़ाई जा सकती है लेकिन भारत में सेकुलिरिज्म विधवा हो जाती है। वैदिक शांति पाठ से अमेरिकी सीनेट, न्यूजीलैंड और बिट्रेन के संसद सत्र की शुरुआत हो सकती है भारत में अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत हो जाती है।

वोट बैंक के नाम पर अल्पसंख्यक का अर्थ मुस्लिम से कही कही ईसाई भर से है । भारत में विरोध के नाम पर भारत का विरोध हो रहा है। भारत तोड़ने वाले के लिये कसीदाकारी होगी।

मुस्लिम,ईसाई अपने धर्म की शिक्षा सरकारी इमदाद से ले सकता है । हिन्दू शिक्षा और हिन्दू शिक्षा पद्धति का विरोध सरकारी खर्चे पर होगा। हिन्दू धर्म परिवर्तन करें तो गंगा जमुनी संस्कृति या प्रताड़ित था सम्मान नहीं था। मुस्लिम धर्म परिवर्तन करें तो संविधान खतरे में।

सती प्रथा ,देवदासी प्रथा ,बहुविवाह प्रथा और पर्दाप्रथा हिंदुओं में है ऐसा हमें पढ़ाया जाता है। बुर्का, खतना,हलाला,मुता यह मुस्लिम धर्म की जरूरी चीजें है इसे अन्य धर्मावलंबियों को नहीं जानना चाहिये।

विदेशी कम्पनी का विरोध नहीं किया जायेगा यदि स्वदेशी कम्पनियों का विरोध करना है दिल्ली नेक्सस तैयार है जिसमें कुछ मीडिया घराने भी भाग लेते है।

बड़े चाव से हिंदू धर्म पर नैरेटिव विकसित करने का कार्य, साहित्य , सिनेमा,न्यूजपेपर आदि से किया जाता है । कश्मीरित के नाम लेकर पत्थरबाजी जायज है। नशे में उड़ता पंजाब हो सकता है।

यह सारा विरोध सत्ता बनाने और पाने के लिए किया जा रहा है।