दो ध्रूवों को प्रयोगशाला🏹 To Pole Laboratory

अफ्रीका, एक ऐसा खूबसूरत महादीप जिसे प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है लेकिन यह यूरोप,एशिया और अमेरिका की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं पाया।

अफ्रीका एक सनातन परंपरा वाला महाद्वीप है जो अपनी मान्यताओं के साथ प्रकृति पर विश्वास करता था।

समय के साथ रोमन साम्राज्य का विस्तार अफीका तक पहुँचा। चौथी सदी में एक्शन साम्राज्य के समय यहाँ ईसाई धर्म और सातवीं सदी में मुस्लिम धर्म लाया गया। आज के अफ्रीकी डेमोग्राफ में 45 फीसदी मुस्लिम, 40 फीसदी ईसाई और 15 फीसदी में हिंदु सहित अन्य धर्म हैं।

लिखित इतिहास में मनुष्य की उत्पत्ति होमो सीपियंस और होमो इरेक्ट्स यही से माने जाते हैं जो बाद में विकसित हो कर मानव बन गये।

यह विकास अंग्रेजों का दिया है। वास्तविकता के धरातल पर बन्दर से मनुष्य का विकास संभव नहीं है। यही विकास क्रम रहता तो आज भी संभव होता, जैसा कि नहीं है।

अफ्रीका महाद्वीप बताने का तात्पर्य यह है कि किस प्रकार से यह ध्रुवों की प्रयोगशाला के रूप इस्तेमाल होता रहा है। वह कैसे अंधकार महादीप बन गया। उसकी मौलिकता को अपहृत किया गया।

प्राकृतिक रूप से जीने वालों को लूटने के लिये ईसाइयों और मुस्लिमों ने यहाँ अपने-अपने टेंट गाड़े और फिर यह खेमा बंदी में बदल गया। इस्लाम के पूर्व अफ्रीका की व्यापारिक चौकी यमन था किंतु इस्लाम के साथ ही अफ्रीका की सीमा सीमित कर दी गयी।

दूसरी तरफ से ईसाई पहले ही वह प्रयास शुरू कर चुके थे।विदेशी पंथ अफ्रीका की धरती पर उगाये गये। अफ्रीका को निचोड़ने का काम विदेशी सत्तायें करती रहीं।

मध्यकाल में मोरक्को का यात्री इब्नबतूता मुहम्मद बिन तुगलक के समय 14 वीं सदी में भारत आया । उसने भारत के समाज, मौसम और फलों विशेषकर आम का विशद वर्णन अपनी पुस्तक “रेहला” में किया है।

समय के साथ पुर्तगाली और डचों ने अपनी कालोनियां बना ली। फिर आया ब्रिटिश और फ्रांसीसी दौर। कार्य वही था गुलाम बनाना, प्राकृतिक संसाधनों की चोरी।

आज अफ्रीका में यूरोपीय शासन का अंत हो चुका है और सभी 53 देश स्वतंत्र है । गरीबी जारी है। दो धुवों की जगह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और रूस ने संभाल ली।

शीत युद्ध के खत्म होने के साथ सोवियत यूनियन का पराभव हो गया। अमेरिका का एक छत्र राज हो गया। वही ब्रिटिश और फ्रांसीसी प्रभाव कायम रहा। यह पूरा क्ष्रेत्र मिशनरियों के लिए सैरगाह की तरह रहा।

नयी सदी एक नये खिलाड़ी चीन को लेकर आया। चीन ने अपने आर्थिक मुनाफे को अफ्रीका में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम से प्रचारित कर प्राकृतिक संसाधनों की चोरी शुरू की। गरीब देश विरोध नहीं कर पा रहे हैं।

अफ्रीका यूरोप, अमेरिका, चीन का प्रैक्टिकल फील्ड है दवा, नशा या नया प्रयोग जैसी मर्जी हो करिये। मनुष्य जीवन की कीमत एक बकरी और दो जून की रोटी से अधिक नहीं है।

अफ्रीका में खुशहाली की कुछ गिनी-चुनी जगहें हैं जिनमें दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और अल्जीरिया को शामिल किया जा सकता है। बाकी देश में मिलीशिया, आतंकवादी,समुद्री लुटेरे, मानव तस्कर, छोटी लड़कियों के व्यापारी सक्रिय है। बाकी जो पाप बचता है उसे सैनिक तानाशाह पूरा कर देता है। आये दिन छोटे-छोटे देश के अंदर से लेकर सीमा तक हिंसात्मक टकराव होते रहते है।

अफ्रीका महादीप को लूटने की जद्दोजहद में शक्तिशाली देश रहे है। और इतना सब अफ्रीका के नाम पर करने.के बाद भी धरातल पर उनके जीवन के बेहतरी का कोई प्रयास नहीं है।

पेट की भूख के लिए अफ्रीकन हाथ बांधे खड़े है। उनकी कोई आवाज विश्व में नहीं है। उसके हिस्सें में दूसरे की सेवा लिखी है क्योंकि काले लोग है। उनका दोष अफ्रीका का मूल निवासी होना।

विश्व में एक देश भारत ही ऐसा है जो शोषण की जगह पोषण , मानवीय मूल्यों का तरज़ीह देता है। भारत विश्व की महाशक्ति और नेता बनता है। उससे सबसे बड़ा लग बेजुबान देशों को आवाज मिलेगी। उनकी बेहतरी लिए काम होगा। अफ्रीकी देशों को भारत पर पूरा भरोसा है।

मौर्य सम्राट विन्दुसार के समय अफ्रीका से ईसा से 300 वर्ष पूर्व सम्बन्ध स्थापित किये थे। मिस्र के नरेश टॉलमी फिलाडेल्फस ने डायनोसिस को दूत बना कर भेजा।

सीरिया के शासक एण्टियोकस ने डायमेकस नामक राजदूत बिंदुसार के दरबार में भेजा। बिंदुसार ने सीरिया से मीठी मदिरा, सूखी अंजीर के बदले भारत से वहाँ दार्शनिक भेजने के लिये पत्र लिखा था।

प्राचीन अफ्रीकी लोगों ने खनन कर प्रसंस्कृत धातुओं का निर्माण किया। सोना चांदी,तांबा, कांस्य, लोहा,मिट्टी के बने सुंदर पात्र निर्मित किये।

रोमन,भारत और अरब देशों के जहाज यहाँ से गुलामों, हाथीदांत,सोने,पन्ना,जानवरों की खाल,दरियाई घोड़े और विभिन्न जानवरों का आयात करते थे।

अक्सुमाइट साम्राज्य अफ्रीका में दसरी शताब्दी में स्थापित हुआ। जिसमें अरब देशों के हिस्से भी शामिल था। एक्सुमाइट राजदूत मिश्र,अरब और भारत गये।

12 वीं सदी में माली जो पूर्व में घाना का सामन्त राज्य था, में एक बड़े साम्राज्य की स्थापना हुई जिसकी राजधानी टिम्बकटू थी। इसके सुल्तान विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति शासक मनसा मूसा थे जिनकी कुल सम्पत्ति 4 लाख मिलियन अमेरिकी डॉलर थी। भारत के संदर्भ में 40 लाख डॉलर मुकेश अम्बानी से लगभग 300 गुना ज्यादा।

अरियो और हाइलैंड्स का साम्राज्य इथियोपिया में सोंगई पूर्वी अफ्रीका में। मेडागास्कर में इमेरिन। स्वाहिली साम्राज्य युगांडा क्षेत्र में । नूबिया और कार्थेज राज्य। एक्सम शासन में 330 ईसवी में ईसाई धर्म का प्रवेश हुआ था।

पशुपालन में गाय, बकरी,भेड़ आदि का किया जाता था कृषि में बाजरा,गेंहू,कपास आदि होती थी। फल में अंजीर,जामुन,नींबू,आबनूस होते थे।

अफ्रीकी लोग प्राकृति प्रेमी और मस्त थे किंतु ईसाई और मुस्लिम की ललचाई शातिर व्यवस्था ने अंधकार दीप और कालों का देश बना दिया। नील नदी

अफ्रीका में धर्म देखें तो 85 फीसदी लोग मुस्लिम या ईसाई है फिर भी अशांति का कारण है। ये दोनों धर्म के स्तर पर असफल विचार धाराएँ हैं। इन दोनों के लिए खुशहाली का मतलब यूरोप के चंद देश और अरब है।

मध्यकाल में मुस्लिमों की लूट से ये उबर न पाये। आधुनिक काल में यूरोपीय ईसाइयों की लूट से इच्छापूर्ति नहीं हुई। ये चालाक थे और उपनिवेश के साथ वहाँ व्यापार विकसित कर दिए जिससे शोषण आज भी बना हुआ है।

धर्म का सहारा लेकर अफ्रीकी सम्पदा की लगातार चोरी होती रही और मूलवासियों को यातनाएँ मिलती रही है । भारत के देर से पहुँचने से ये लूट,बर्बरता अभी तक चालू है। भारत पूरे अफ्रीका को सनातन संस्कृति से रोशन करे। इन प्राकृतिक लोगों को खुशहाल जीवन जीने की ओर ले चले।

अफ्रीका शब्द बर्बर भाषा के इफ्री से हुआ है जिसका अर्थ है गुफा । इसीलिए इसे गुफा में रहने वालों का देश कहा गया।
डेंसमण्ड टूटू ने अंग्रेजों के लिए कहा था- उनके पास बाइबिल थी हमारे पास जमीन। जब उन्होंने बाइबिल की कहानी सुनाई तो आंख बंद हो गई। आंख खुली तो बबइबिल हाथ में थी जमीन उनके पास।

अलबरूनी गजनवी के लिए कहता है कि अल्लाह रहमत बक्से गजनवी को जिसने भारत की हँसती- खेलती संस्कृति को उजाड़ दिया।

अफ्रीका की प्राकृतिक सुंदरता मनोहर है।नदियों में नील जिसे अफ्रीका की जीवन रेखा कहा जाता है, बहुत सुंदर है। और कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ हैं– जैम्बेजी,जूना,रुबका, लिंपोपो तथा शिबेली। कुछ प्यारी बड़ी झीलें हैं- चाड,विक्टोरिया,वोल्टा आदि। पर्वतों में एटलस,किलमिंजारो, ड्रैकेन्सवर्ग,कैमरून और काला हारी महत्वपूर्ण हैं। कालाहारी,सहारा जैसे रेगिस्तान तो वहीं सवाना जैसे वन। और उष्णकटिबंधीय सदाबहार जलवायु जैसे भारत ही लगता है। कर्क, विषुवत तथा मकर तीनों रेखा यहाँ से गुजरती है।

मैंने कब ऐसा सोचा कि मुझें तुम खुशियां दो।

मैं सिर्फ जुड़ना चाहता था मैं एक होने की अनुभूति चाहता था

मेरी पीर तुम्हारें में तुम्हारी मेरे में होने लगे।

मनुष्य चालक और शातिर भी वह साथ ही सहज और सरल भी हो सकता है।

तुम सिर्फ अपने मन का देखती हो मेरे मन क्या!

तुम दुनियावी दुःख का कारण मुझे कैसे मानती हो।

मैंने कभी किसी को तकलीफ देने के विषय में नहीं सोचा।
क्या तुम्हें मेरा मेरा प्यार नहीं दिखता।

उम्र भले बढ़ती गयी हो हम जिसे प्यार करते है उसके लिए बच्चों से मासूम हो है।

प्यार के मामले में उससे माँ वाली फीलिंग चाहते है।

तुम इतना क्यों सोचती हो। मेरे पुरुष होने का तुम्हें इतना सुबा है।

मेरे में भी एक कोमल मन है जैसा तुम रखती हो तुम जिस तरह अपने लिए चाहती हो उसी तरह मैं भी चाहता हूँ।

एक होने का मतलब है मेरे तुम्हारे अहम का चला जाना।

जीवन एक बार का मिला है हम जीते कैसे यह ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाय हम मरते कैसे है?

तुम चाहों तो सब बदल सकता है लेकिन तुम्हारा तुम मेरे मैं आना नहीं चाहता है।

बड़ा आसान मैं और तुम चलो हम बन जाते है।

मेरे राम तेरे राम….

तुम किसको राम कहते हो- राम का मतलब भारत से है अरे मुकुट और धनुष लिए ही नहीं बल्कि मैली सी धोती पहना किसान ,कुर्ता पहना मास्टर या कहे टिफिन लिए ऑफिस जाता वह आदमी जिसे लौटते समय माँ चश्मे,पत्नी की दवाई और बच्चों की किताबें लाना है। इन सबमें राम है।

वैसे तो बहुत से लोगों के मन में राम का जिक्र होते ही भगवा कपड़ा पहने कुछ दिखने लगता है बहुतों को चिढ़ मचती है इसी राम की वजह से उसकी बनी बनाई सत्ता चली गयी। जिस सत्ता रूपी मुर्गी से कुल जमां तीन पीढ़ी निकल गयी थी। ये ससुरा राम को कुदा दिया..।अब लौंडा कौन सा रोजगार ढूढे उसे कुछ आता नहीं सिवा चूतिया बना के कुर्सी पाने के। अरे भाई वह खून से जो पाया है। राम के नाम पर दुकानें चलाने वाले भी हो गये है। ऐसा कुछ नेता जी टाइप के लोग कहते है।

खैर हमें राजनीति से क्या? हम बताते है राम क्या है मेरे लिए…मैं बहुत छोटा था अभी स्कूल जाना शुरू किया था कि बड़े भाई के साथ हनुमान चालीसा गाते-गाते याद हो गई थी । हनुमान जैसे कि हर बच्चे के हीरों बचपन में रहते है,उम्र इतनी थी कि दोनों भाई मिलकर शर्त लगाते थे कि किसका मूत्र आगे जायेगा🙃

राम पर थे ये कहा चले गये। बचपन में ही घर में सुंदरकांडका पाठ शनिवार को घर में होता था। स्कूल से एक दिन आया तो बाबरी टूट गयी ऐसा दादी ने बताया। यह भी कहा कि वहाँ भव्य राम मन्दिर बनेगा। मैंने दादी से पूछा राम को भगवान जी क्यों कहते है। दादी- उन्होंने धर्म की रक्षा की पापी और दुष्टों को दण्ड दिया। मैंने कहा क्या इतने से कोई भगवान हो जायेगा?

दादी- वह भक्तों पर बहुत कृपा करते है वह करुणा के सागर है। मैं- वह कहाँ रहते है क्यों नहीं दिखते है? दादी भक्तों के ह्रदय और सबको ऐसे ही दिखते रहेंगे तो यह बहुत चालक मानव है उन्हें अपने को भगवान सिद्ध करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और मानव नित्य एक सबूत मांगेगा आज के नेता की तरह।

दादी जैसे मुझे मिलना हो राम भगवान से तब क्या करें
दादी-अच्छे काम करो,भगवान को स्मरण करते रहो, दीन दुःखियों की सेवा करों। मैंने कहा कि इसे हम कर सकते है। राम मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है तुम्हारे लिए राजनीति हो सकती है।

विवेकानंद जी ने राम के बारे में शिकागो में कहा था कि जब तक भारत में एक पुरुष और एक महिला जीवित है तब तक राम और सीता जीवित है। सीता-राम सदैव सनातनियों के आदर्श है और रहेंगे।

कुछ उच्चश्रृंखल लोगों की वाचालता से राम पर कोई आंच आने वाली नहीं है। इस धरती पर राम पर प्रश्न अब तक सबसे ज्यादा उठे है फिर भी वह हम सबके आदर्श है। गांधी जी ने लोकतंत्र की नहीं रामराज्य की बात की थी। जहाँ सब सुखी रहे मनुष्य तो मनुष्य, कुत्ता भी न्याय पा सके। शेर और बकरी एक घाट पानी पिये।

राम जिसमें रमन और मरण समाहित है सृष्टि का आदि अंत निरन्तर चलता रहता है । वैसे ये तुम्हारी समझ में नहीं आयेगा क्योंकि तुम उदारवादी पंथी हो। राम सहजता और प्रेम का विषय है जो तुम्हारे बस का नहीं है।

मानव की खोपडिया भागती बहुत है वह दानी की जगह ग्राही सिस्टम को जोर से एक्टिवेट किया है उसे सबमें लाभ चाहिए,इसमें क्या फायदा पहला प्रश्न होता है? कुछ कम ऐसे है जिन्हें तुम बिना लाभ के करते हो जैसे नशा,बकैती,सोसल मीडिया इत्यादि। एक बार राम में प्रीति करके देखों ये तुम्हें एक्टिवेट कर देगा। राजनीति करो उसकी पूछ पकड़ के लटके न रहो। तुम्हारे में कुछ जीवित है जो तुम्हे ढूढ़ रहा है तुम हो कि कुछ बाहर ढूढ़ रहे है।

जब अंदर बाहर एक बराबर जब हो जायेगा उस समय तुम्हें समानता,स्वतंत्रता और न्याय के लिए संग्राम की आवश्कता नहीं पड़ेगी।

बिना कारण कुछ नहीं होता इसकी सिद्धि विज्ञान से चाहो तो कर लो।यह विश्वास की तुम हो यह जगत भी है तुम्हें बनाने वाले तुम्हारें माता पिता है तो इस जगत का भी कोई माता पिता भी होगा । उसे ही हम राम कहते है तुम क्या कहते हो?

मानव और सत्ता का बाजार●◆★

तुम परेशान सत्ता और विपक्ष के लिए हो वह तुम्हें कोरोना दे दिया। परिवार को तोड़ दिया चार रोटी के लिए तुम रेस्तरां पर निर्भर हो गये। हजारों मिठाइयों के बावजूद तुम चाकलेट खा रहे हो। स्नेक के नाम पर तुम जहर और जंक फूड खाकर बीमार पड़ रहे हो…।

तुम लाई,चने,घी चुपड़ी रोटी और तरह-तरह के अनाज भुने,भिगोये और अंकुरित सब भूल गये। ब्रेड,चाउमीन,मैगी आदि पर निर्भर हो गये। तुम्हारे पौष्टिक खाने को कब का रिप्लेस कर दिया गया है तुम्हें खबर नहीं हो पायी। तुम्हें जल्द ही फैक्ट्री वाला चावल,गेंहू,मक्का और आलू खाने को मिलेगा।

खराब खाने का दो फायदा पहला प्रचार के दम पर फूड इंडस्ट्री बना लेना। दूसरा बीमार पड़ने पर मेडिकल इंडस्ट्री विकसित कर लेना । लोकतंत्र के नाम पर चुनाव में हजारों करोड़ खर्च होता है जिसमें सारे हथकंडे प्रयोग होते है फिर भी इसे सबसे अच्छा विचार कहते है क्योंकि इस पर पश्चिम की मुहर लगी है। अरे भाई ये हजार करोड़ किसकी जेब से आता है? तुम वास्तव में मानव का कल्याण चाहते हो तो इस लोकतंत्र को खत्म करो।

जाति, आरक्षण,संरक्षण और नौकरी के नाम तुम सड़को पर लड़ रहे हो क्योंकि लोकतंत्र जिंदा है। एक निरपराध दण्डित नहीं होने का सिद्धांत विष्णु तिवारी के मामले में क्या हुआ।

तुम जातिवाद दूर करने का वादा करके जाति को संवैधानिक बना दिये है ये तुमको खूब फबता है हम आपस में नहीं लड़ेंगे तो नेता की चौधराहट की जरूरत नहीं पड़ेगी।

अमेरिका और यूरोप विश्व के खाद्य व्यापार पर कब्जा करना चाहता है वह नया वर्ग वीगन फूड लाया गया है शाकाहार का जिसमें मिल्क प्रोडक्ट भी नहीं रहेगा अरे भैया जानवर काट खाने वाले में इतनी दया कहा से आ गयी व्यापार समझिये।

कुछ दिन पहले मांस की जगह एगटेरियन( अण्डा) का प्रयास हुआ था। अब “वीगन प्रोडक्ट” मार्केट में लांच हो रहे है। आर्गेनिक फूड और हाइजेनिक फूड की तरह। इससे नया बाजार मिलेगा कुछ नये अरबपति बनेंगे। तब विचार है तुम रासायनिक उर्वरक को बाजार में क्यों बिकने देते हो। आगे कृत्रिम मांस और अण्डे ,कृत्रिम दूध और पनीर की तरह मिलेंगे।

तुम बाजार और व्यापार को क्या जानोगे मानुष बाबू😶

एक तरफ कल्याणकारी राज्य दूसरी तरफ शराब को लाइसेंस । यदि तुम समझना चाहोगे तो संविधान के दो तीन अनुच्छेद मिला कर साथ पढ़के जज साहब कहेंगे इसका मतलब यह निकलता है।

परिवार टूटने से तुम्हारा समाज टूटा है व्यापार नहीं, वह तो तेजी से बढ़ा है एक चूल्हे से 30 लोगो का कहना उपले-लकड़ी पर बन जाता था अब एक सिलेंडर से एक लोग का खाना चल रहा है चूल्हा,वर्तन,तेल,मसाला आदि आदि अलावा ऊपर से होटल में खाने का चलन । दोस्त इन सबसे तुम कितना खुश हो कभी शायद सोचा नहीं! क्योकि तुम कहते हो समय नहीं है कभी विचार किया आखिर तुम्हारे समय का क्या हो गया? फेमिनिज्म के कारण चार रोटी ,पति-पत्नी के प्रेम का निर्धारक कोई और हो गया। वही बाजार पौरुषवर्धक गोली बेच रहा। तुम अब भी नहीं समझे।

तुम्हारे विचार को कौन बना रहा है? न्यूजपेपर,न्यूजचैलन,फ़िल्म वाले या कुछ राजनेता! इसमें तुम्हारा क्या फायदा है? युद्ध संस्कृतियों का सदा चल रहा है कभी बाजार के नाम पर कभी साम्यवाद के नाम पर । भारतीय तो एक आर्थिक ईकाई या ज्यादा से ज्यादा दर्शक है खेला कोई और खेल रहा है।

हाँ एक चीज शोर मचाने वाला है कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र है अमेरिका ,यूरोप आदि इसकी शाबाशी तुम्हे दे रहे है। तुम्हारी मान्यताएं,संस्कृति, धर्म और भाषा सब गुलामी में सनी है क्योंकि उन्होंने लोचा तुम्हारें माइंड में कर दिया है।

तुमने क्या खोया ? परिवार,स्वास्थ्य,रिश्ते,धर्म,संस्कृति
,प्रेम बदले में तुम्हें आधुनिकता और विकास का झुनझुना पकड़ा दिया गया। कम से कम 1000 स्क्वायर फीट में रहने वाले को अब 100 स्क्वायर फिट में 50 मंजिले वाले कबूतर खाने में रखकर आगे एक पार्क बना दिया। नाम दिया “कालोनी”,क्या तुम जानते हो अंग्रेज कालोनी ,उपनिवेश को कहता था। जिसे आज तुम सीना चौड़ा करके अपने को कालोनी वासी ,पॉस कालोनी में रहने वाला बता रहे हो।

ये जो उदारवाद,मानवतावाद,समाजवाद मार्क्सवाद,राष्ट्रवाद आदि देख रहे हो यह सब शासन प्राप्त करने का जुगाड़ है तुम्हारी उन्नति सनातन व्यवस्था में थी जिसे दफन कर दिया गया।

स्वतंत्रता, समानता,न्याय,व्यक्तिवाद के गुब्बारे फोड़े जाते है लेकिन फिर भी तुम दलित,वंचित,पिछड़ा और सवर्ण ही रहते हो । यह डिक्रमिनेशन से बहुत लाभ उन सत्ताधीशों को है। उनके बाद उनका लौड़ा आ जायेगा। तुम्हारे लड़के का खून चूसने। तुम इनके-उनके राजनीतिक विचार को लेकर सिर फुटऔउल करना।

तुम एक चीज सोचों तुम क्या हो ,तुम्हारी उन्नति किसमें है
तुम एक भैतिक ईकाई से जैविक ईकाई बन पाओगे ,क्या तुम खुशियां परिवार के साथ बाट पाओगे या चिप्स,कोलड्रिंक और शराब की पार्टी ही तुम्हारी हकीकत बन गई है। समझ आये तो बताइयेगा तुम कैसा समाज चाहते हो?

श्रीराम मंदिर समर्पण निधि…..

इस समय भारत भर में समर्पण निधि संचित करने का कार्यक्रम चल रहा है। मन्दिर को पुनः बनाने का कार्यक्रम जो निकट आया इसके लिए ३.५ लाख हिन्दू वीर ३६ युद्धों में यज्ञ की समिधा बन गये। श्री राम मंदिर सिर्फ एक मंदिर ही नहीं बल्कि यह भारतीय संस्कृति का वह बिंदु है जहाँ भारत अपने को तलाश रहा है। मन्दिर नहीं होना यह कहता रहा है कि जो देश ने अपने सूर्य के कांति मंडल से दूर है उसका उत्थान कैसे होगा?

भारत को विदेशी ताने बाने के तिमिर में लपेट कर कहा गया कि धर्म से इसका कुछ नहीं हो सकता… तब पुनः प्रश्न है कि जब धर्म महत्वपूर्ण नहीं है तो वैटिकन और काबा की क्या जरूरत है।

आतंकवाद जो कौम की इजाजत लेकर विश्व को लहूलुहान करता है यह रुकता क्यों नहीं है। विश्व के गरीब और पिछड़े क्षेत्र में अमेरिका आदि देशों की ईसाई मिशनरियां क्या कर रही है? धर्म से हीन किसी मनुष्य की कल्पना उस आकाश कुसुम और बध्यापुत्र कि तरह होगी।

भारत में मन्दिर समर्पण निधि को जो चन्दा कह रहे है वह गर्त में जायेगे। राजनीति में तुष्टिकरण अब सत्ताजीविता नहीं हो सकती है। सोई हुई कौम में जागृति लेकर आयेगा श्रीराम मंदिर। विकास के नये पैमाने गढ़ना शुरू कर दिया भारत ने, मन्दिर के आरम्भ में प्रारम्भ है। इसके आयोजन में राम का कुछ न कुछ प्रयोजन निहित है।

यह समस्या नास्तिक सेकुलर के साथ हो सकती है कि राम की मर्यादा क्या है उन्हें किस सीमा तक सीमित करें।
यदि आप आस्तिक है तब राम पर कोई प्रश्न नहीं है। जनमानस निधि के लिए समर्पण करते समय उसके मन में अपने प्रभु राम के प्रति समर्पण रहता है। कई माता-बहने तो निधि संचित करने वाले को ही प्रणाम करती है उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है चलिये इस जीवन में मेरा कुछ श्रीराम के काम आया। उस समय उसके चेहरे की प्रसन्नता देखते बनती है।

यदि आपको श्रीराम में राजनीति दिख रही है तो श्रीमन आपभी राजनीति में जुट जाये। किसी राजनीतिक पार्टी
विचार देह से निकाल दे। इस शरीर को श्रीराम के कार्य से धन्य बनाएं। देश के मूड को समझे , वह अपनी संस्कृति के साथ खड़ा है आपकि ओछी हरकत को वह बर्दास्त नहीं करेगा।

श्रीराम मंदिर अनुकृति

विदेशियों के संस्कृति द्वीप भारत भूमि अब नहीं रह सकते। यह सच है आप ने जिस शिक्षा व्यवस्था में हमारे नौनिहालों को डाल दिया,वह भ्रमित करता है किंतु सत्य अनंत: उभर कर आता है। उसके साथ विदेशी मानसिक बेड़िया स्वत: टूटती जाएगी। आयोध्या गवाह बन रही है और तुम…..

भारत का इतिहास @INDIAN HITORY

भारत का सम्बंध अपने पड़ोसी और अन्य विदेशी शासकों से रहा है इसका प्रमाण हमें मिलता रहा है। पश्चात में कोई बौद्ध,ईसाई और मुस्लिम बन गये। आज भी विश्व में पुरात्विक साक्ष्य मिलते है जिनमें भारतीय सम्बन्धों की पुष्टि होती है। सबसे महत्वपूर्ण है कि उन मिले प्रमाणों के विवेचन हमने कैसे किया है।

रोमन बस्ती का अरिकामेडु से मिलना ,शैलेन्द्र वंशी राजाओं की समुद्र गुप्त से अपील बोधिगया में बौद्ध मंदिर बनवाने को लेकर रही हो। दिलमुन,माकन, मेलुहा ,फारस के विषय मे वर्णन मिलता है।

एशिया माइनर (तुर्की) बोगजकोई अभिलेख से संस्कृत में इंद्र,मित्र,वरुण,नासात्स के विवरण को गलत तरीके से अंग्रेजी इतिहासकारों ने व्यख्यायित किया।

बोगजकोई का अभिलेख बताता है कि भारतीय संस्कृति का विस्तार सीरिया और तुर्की तक प्रत्यक्ष रूप से था। आज भी तुर्की में यत्र तत्र शिवलिंग प्रतिकृति दिखाई पड़ जाती है। चीन का शिजियांग प्रान्त कभी खोतान देश हुआ करता था जिस पर भारतीय वंशज कुमारजीव ने शासन किया था।

इसी प्रकार थाईलैंड,कम्बोडिया,लाओस,वियतनाम,
मलेशिया,इंडोनेशिया ,मैक्सिको,होंडुरास ,जापान और कोरिया तक में भारतीय संस्कृति और भारतीय शासन का विस्तार हुआ ।

यूरोप के रोमा समुदाय जिनका निकट का सम्बंध भारत से है। यह बताता है कि एक समय यूरोप के बड़े भू भाग पर भारत का शासन था। भारत के महान सम्राट विक्रमादित्य अपने शासनकाल 57 ईसा पूर्व में रोमन शासक जूलियस सीजर को रोम से गिरफ्तार करके दंडित किया था।

भारत का वर्णन मेगस्थनीज की इंडिका,टॉलमी की ज्योग्राफी, प्लिनी के नेचुरल हिस्टीरिका और पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रियन सी में भी मिलता है। भारत इतना कौतूहल का विषय विश्व समुदाय के लिए क्यों रहा है?
निश्चित रूप से इसका कारण भारत का व्यापार,शिक्षा प्रणाली,सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था थी।

ग्रीक,रोमन,मिश्र से हमारे सम्बन्ध प्राचीन समय में सुदृढ़ रहे है। जो भारत की विज्ञान तकनीकी को भी परिलक्षित करता है। भारत में प्राचीन काल में समुद्री जहाज और समुद्री यात्रा यंत्र विकसित किये थे। किंतु अंग्रेज इतिहासकारों ने जो भी भारत के लिए कहा उसे हमने आंख बंद कर मान लिया। बिना समुद्री जहाज के भारत का इतने दूर देशों में पहुँचना आसान कैसे होता।

अंग्रेजों के साथ एक दिक्कत थी उनका पूरा विकास ईसा के बाद संभव हुआ है और इसी चश्मे से वह विश्व को उलट-पलट के देखता है और वर्णित करता है ईसा के पूर्व धरती पर कोई विकसित सभ्यता नहीं रही है। भारत के वामपंथी इतिहासकार अंग्रेजी इतिहासकारों को चुनौती देने की जगह उनके ही कथनों की पुष्टि कर दी।

भारत की संभावनाओं को अंग्रेजी संदूक में भरकर उसे यूरोप से आयातित कह दिया गया। “आर्यन थियरी” के माध्यम से भारतीय मूल आर्य को ही विदेशी ठहराया गया बोगजकोई अभिलेख के आधार पर। स्मिथ आदि अपने इतिहास लेखन में माना कि भारत सदा से विदेशियों द्वारा शासित होते रहे है।

बागपत के सिनौली की खोज, जो इतिहासकारों और तकनीकी के माध्यम से हमें 4000 साल पूर्व ले जाती है अभी और खोजें होनी बाकी है। यहाँ से रथ, मूठ लगी तलवार,स्त्री योद्धा का प्रमाण मिला है। रथ जो घोड़े से खींचे जाने वाले है। भारत में हड़प्पा की खोज में अंग्रेजों ने घोड़े के प्रमाण को नहीं माना था जबकि सिनौली भारत में घोड़े नहीं होने के मिथकीय प्रमाण पर विराम लगाता है। यह भारत की प्राचीन सभ्यता में शुमार की जा सकती है।

एकबात जो गौरतलब है कि बागपत जिला पांडवों द्वारा दुर्योधन से मांगे गये पांच गांवों में से एक था। आगे की खोजें भारत के औपनिवेशिक इतिहास के स्वरूप को बदल देगी। क्योंकि भारत के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का कारण एक राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति कराना रहा है । योद्धाओं और वीरांगनाओं की भूमि को सत्ता की पिपासा ने नपुंसक के रूप में पेश किया।

MSP घोटाला ●

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घोटाले का तंत्र
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Msp घोटाले में मार्केट इंस्पेक्टर,स्थानीय कर्मचारी,
लोकल नेता और दलाल मिल कर सरकार की योजना पर पानी फेर दे रहे है। किसान के रजिस्ट्रेशन के बाद कई तरह मीन-मेख निकाल देते है दूसरे उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में इसबार क्रय केंद्रों पर मंसूरी धान की खरीद हो रही थी अन्य धान की पहुँच MSP से दूर थी।

खंड स्तर से शुरू होकर यह MSP राज्यों के स्तर पर आसन्न भ्रस्टाचार में लिप्त होगयी है देश स्तर पर इसका घोटाला लाखों करोड़ का होगा। जनता के पैसे को अधिकारी,दलाल और नेता पानी कर दे रहे है।

सरकार ने Msp 1868 ₹ सामान्य धान के लिए घोषित किया है । जिस किसान ने पिछले बार क्रय केंद्र पर धान बेचे है लेकिन इस पर बार वह “मंसूरी धान” न होने की वजह नहीं बेच पाया। उसके खाते का भी रजिस्ट्रेशन मिली भगत से करके धान बेच लिया जाता है। धान की खरीद सरकार क्षमता से अधिक करती है लेकिन उसका लाभ किसान को नहीं मिल पा रहा है।

दूसरी तरफ किसान के खाते में कोई समस्या दिखा कर किसान के धान नहीं है या धान की गुणवत्ता में कमी,धान में धूल आदि कह कर भी कम दाम में लिया जाता है। एक जुगाड़ और चलता है कि आप का इतना कुन्तल है आप इतना पैसा एडवान्स दे दीजिए आपकी खरीद हो जायेगी।

उसी जगह पर मील वाले और व्यापारी का धान धड़ल्ले से ले लिया जाता है। घपले बाज बाकायदा एक टीम बनाये है जो किसानों के यहाँ जाकर उनका धन घर से तौल कर कम कीमत पर लेकर लेवी पहुँचा देते है।

भ्रष्ट्राचार का एक पूरा तंत्र विकसित है जो सरकारी व्यवस्था को पंगु कर देता है कोटरदार,प्रधान,ग्राम सचिव तक हाल बहुत बुरा है। सरकारी लाभ जो जनता तक पहुँच सके वह सब बीच में इनके घर भर रहे है।

सार्वजिनक वितरण प्रणाली (PDS) में जितना खाद्यान सरकार से तय है उसमें वजन कम जरूर देगा। पूछने पर कोटेदार कहता है कि घर से नहीं देगें हमें भी ऊपर तक देना रहता है।

यह धंधा मौन स्वीकृति पर चल रहा है किसी शिकायत पर एक मैनेज करने वाला मैकेनिज्म रहता है जो शिकायती पर दबाव डालकर उसे शिकायत लेने पर मजबूर करता है।

प्रधान,कोटेदार,सचिव,लेखपाल,थाने, लोकल नेता सबकी मिलीभगत से जुगाड़ चल रहा है। आम जनता कहा तक और किससे- किससे शिकायत करें।
सब जगह दलाल और सरकारी गिद्ध सक्रिय है।

लौटते है MSP घोटाले पर सरकार को चाहिए कि किसानों का जितना भी कोटा है उस पर बायोमेट्रिक व्यवस्था को लागू किया जाय। जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि खरीद सही व्यक्ति से हो रही है। साथ ही जिस किसान की फसल क्रय नहीं कि गयी उस पर रिपोर्ट लगायी जाय उसके साथ किसान का सहमति पत्र भी रहे जिसमें स्पष्ट कारण हो किसकी वजह से किसान की फसल खरीद नहीं हो सकी है।

-किसान पोर्टल पर किसान अपने बोए गए फसल क्षेत्र के अनुसार धान/गेहूं का रजिस्ट्रेशन करवाता है।

किसान के खतौनी नंबर का प्रयोग करके कोई भी व्यक्ति बटाईदार या कांट्रैक्ट फाॅर्मिंग के विकल्प द्वारा फर्जी रजिस्ट्रेशन कर सकता है।

  • खरीद केन्द्र पर केन्द्र प्रभारी को घूस देकर आराम से फर्जी रजिस्ट्रेशन पर धान बेंच सकता है।

-बिचौलिए उपरोक्त प्रक्रियाओं को अपनाकर ही पहले किसान से MSP से आधे मूल्य पर फसल खरीद लेते हैं और केन्द्र प्रभारी को रिश्वत देकर आराम से अच्छा मुनाफा कमाते हैं

-देखने में ये भी आया है कि केन्द्र प्रभारी जो कि सरकारी नौकर(SMI) होता है, वह किसानों के गतवर्ष के कागजातों को सहेजकर इस वर्ष घोटाला करता है। यानी किसानों के खाते का फर्जी बटाईदार बनकर।

अब इस घोटाले से निपटने का सबसे सरल उपाय जो सरकार को लागू करना चाहिए वह निम्नलिखित है….

किसान रजिस्ट्रेशन में किसानका बायोमेट्रिक(अंगूठे का)सत्यापन अनिवार्यकिया जाए।

बटाईदार और कांट्रैक्ट फार्मिंग के विकल्प को किसान द्वारा ही भरा जाए। यानी बटाईदार का भी रजिस्ट्रेशन भी किसान द्वारा ही हो और प्रपत्र में बटाईदार और कांट्रैक्टर का विकल्प चुनने का अधिकार केवल किसान को ही हो। क्योंकिकिसान को ही पतावहै कि वास्तविक बटाईदार/कांट्रैक्टर कौन है।

रजिस्ट्रेशन का सबसे घातक विकल्प यही है जिसके द्वारा बड़े पैमाने पर घोटाला हो रहा है। इस प्रकार किसान की खतौनी का इस्तेमाल करके कांट्रैक्टर या बटाईदार न तो रजिस्ट्रेशन कर पाएंगे और न ही धान विक्रय कर पाएंगे।

  • रजिस्ट्रेशन प्रपत्र में बटाईदार/कांट्रैक्टर का विकल्प चुनने के बाद उसका आधार व बैंक ब्यौरा भी किसान द्वारा ही भरा जाए और बटाईदार/कांट्रैक्टर का भी बायोमेट्रिक सत्यापन किया जाए।
  • अंत में सरकारी खरीद केन्द्रों पर तौल के समय भी किसान/बटाईदार/कांट्रैक्टर का बायोमेट्रिक सत्यापन किया जाय।

जनता का पैसा जनता की भलाई के लिए प्रयोग न होकर अधिकारी और दलाल की कमाई का साधन बन गया है?

दिल्ली में चल रहा किसान आंदोलन का एक मुख्य विषय MSP है और MSP की व्यवस्था ऐसी बना दी जा रही है। किसान की मजबूरी है कि तैयार फसल को कितने दिन तक अपने पास रखे जबकि फसल मूल्य से उसके काफी काम होने बाकी रहते है।

MSP क्या है…
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न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP) सरकार की ओर से किसान के उपज की गारंटी है। देश में पहली बार MSP की जरूरत लालबहादुर शास्त्री जी के समय में 1966-67 में गेहूँ के लिए ऐलान किया गया। फिलहाल यह रवि और खरीफ मिलाकर 20 से अधिक फ़सलों पर दिया जाता है।

MSP का निर्धारण कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा किया जाता है। अगर मंडी में किसान को MSP से ज्यादा पैसे नहीं मिलते तो सरकार किसान की तय मूल्य पर खरीद कर उसका भंडारण फूड कारपोरेशन आफ इंडिया (FCI) और नफेड के पास करती है। इन्ही स्टोरों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के जरिये गरीबों तक सस्ते दामों में अनाज पहुँचाया जाता है। यह 20 से ज्यादा फसलों पर दिया जाता है जबकि सरकार आधिकांशत: गेंहू-चावल का क्रय करती है।

बड़ी से बड़ी व्यवस्था यदि भ्रष्टाचार के चपेट में आ गयी तो वह मूल उद्देश्यों के पूरा होने के पहले ही दम तोड़ देती है। किसान की आय 2022 तक दुगुनी कैसे होगी जब वह इन गिद्धों के चंगुल में रहेगी। सरकार को एक सुदृढ़ मोनिटरिंग व्यवस्था रोपित करनी चाहिये जिससे किसान और आम जनता के हितों का संवर्द्धन हो सके।

सत्ता संघर्ष बनाम भारत ••

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कुछ चीजें हमें नये सामाजिक सुधार में अभी से ध्यान में रख कर करनी होगी जिससें हमारा सामाजिक ढांचा प्रभावित हुये बिना गतिशील निरन्तरता को प्राप्त कर सके।

भारत में कई तरह के समूह बन चुके है ज्यादातर समूह राजनीतिक खेमें में विभाजित है वह एक पार्टी विशेष की विचारधारा के इर्द गिर्द चीजों को बुनते है। उसका फायदा उन्हें कई तरह से राजनीतिक पार्टियों से मिलता है।

भारत में कुछ वर्ष पूर्व तक एक घोषित विचार था सेकुलरिज्म जिसके कई स्वरूप है वामपंथी सेकुलरिज्म मुस्लिम सेकुलरिज्म , राजनीतिक सेकुलरिज्म और छुपा सेकुलरिज्म यह सब सत्ता को स्थायी रखने का राजनीतिक उपाय था।

माबलिंचिंग का सूरतेहाल यह है कि यह भी सेकुलरिज्म का चोला ओढ़े है। जब हिन्दू द्वारा किसी मुस्लिम को चोरी करने के लिए हिंदुओं द्वारा मार दिया जाता है। तब यह माबलिचिंग की श्रेणी में डाल कर हो हल्ला मचाया जायेगा । “वही किसी हिंदु को मुस्लिम भीड़, धर्म के नाम पर उसके घर में घुस का चाकू मारे वह मॉबलिचिंग की श्रेणी में नहीं आयेगा”। क्योंकि इससे बहुत से राजनीतिक विचार को खाद नहीं मिलती है। तो मौन और सन्नाटे से काम चलाया जाता है।

देखने का ढंग बन गया है कि दलित,पिछड़ा और मुस्लिम होगा तब चक्का जाम किया जायेगा। डिस्क्रमिनेशन एक समान घटना पर अलग-अलग है। बात यह भी सही है जहाँ मांस दिखेगा गिद्ध वही मंडरायेगा….

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कितनी लम्बी है इसे संविधान नहीं बता सकता है। हिन्दूधर्म के विरुद्ध,देश के विरुद्ध असीम आजादी है।

भारतरत्न सचिन,लतामंगेशकर देश की संप्रभुता की बात करते है, विदेशियों को दखल न देने की नसीहत दे। तब केरल से दिल्ली तक हाय तौबा । दिल्ली नेक्सस जो कल देश का नैरेटिव सेट करते थे वह क्रोनोलॉजी गढ़ने लगते है। जिसको न पता वह न बोले।

भारत के मामले में विदेशी को अधिकार है बोलने का! किन्तु देश हित में भारतरत्न को बोलने ज्ञान नहीं है😊

भारत को कोई मुगल,अफगान,तुर्क या अंग्रेज कभी गुलाम नहीं बना सकता था जब तक यही के लोग आस्तीन के सांप न बनते। आज के राजनीतिक परिदृश्य में देखा जा सकता है।

हिन्दू को मुस्लिम धर्म के नाम पर मारे तो यह ला एन्ड आर्डर वही मुस्लिम चोर और गो तश्कर को गांव मारे तो माबलिचिंग ।

राजधानी में राष्ट्रध्वज के अपमान की जहग फेक आंदोलन की कसीदाकारी की जा रही है। पुरानी पार्टी सत्ता के लिए कभी खालिस्तान को खड़ा किया कभी 370 ,कभी वेल्लू प्रभाकर को। बस कैसे करके सत्ता बनी रहनी चाहिए।

कश्मीरी पंडित के नरसंहार पर करेजा नहीं पसीजा, न ही महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों के नरसंहार पर। किन्तु राष्ट्रद्रोहियों के लिए छाती में दूध उफान मारने लगता है। जब कोई राष्ट्रविरुद्ध काम हो ,सेना से सबूत मांगने हो।

विपक्ष दिशाहीन हो चला है उसके पास न नेता है न ही नीति। वह आव-बाव के सहारे सत्ता सुख उठाना चाहती है। ढंग के विषय उसे राजनीति में नहीं मिल पा रहे है जो मुद्दा लेकर चलना चाहता है जनता छोड़िये, कोर्ट में भी मुंह की खा जा रहा है।

दरबारी पत्रकार और दरबारी इतिहासकार पिछले 70 सालों से भारतीयों में भारत के खिलाफ नकारात्मक विचार भर रहे है। टुकड़े टुकड़े में सत्ता का गणित जो छिपा है। उसके लिए वह डिजिटल षडयंत्र भी करने से बाज नहीं आ रहा है।

सबसे बड़ी समस्या इनके लिए क्या है?

आत्मनिर्भर भारत ! भारत क्यों विश्व महाशक्ति बन रहा है? भारत की शक्ति अंतरराष्ट्रीय पटल तक क्यों हो गयी।
कितना मेहनत के बाद धूल,गन्दगी,नट और सपेरों का देश का तगमा प्राप्त किया था।

राजनीतिक जातिवाद ,दलित,शोषित,वंचित,पिछड़ा,
अल्पसंख्यक कहने से सत्ता मिल जाती थी। धर्मांतरण का खेल बहुत अच्छे से भारत भूमि पर चलता था।

तुमने “राजनीति की वह बगिया उजाड़ दी जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता मिलती थी”। लौंडे जो मुख्यमंत्री बनते वो अब बेरोजगार है। विपक्ष की बिलबिलाहट समझिये,किसी और तकलीफ से कही ज्यादा है सत्ता छिन जाने और दूर तक मिलने के आसार भी नजर नहीं आ रहे है । इसी लिये तो बात-बात लोकतंत्र अपमान और संविधान उल्लघंन के साथ फासिस्ट की बात की जा रही है।

ये जो रोज धरना और आंदोलन चल रहा है उसके पीछे भी पूरा तंत्र है सत्य की लड़ाई की जगह झूठ की बाँह मरोड़ने का करतब इसलिए है कि शायद इससे ही काठ की हाड़ी दुबारा चढ़ जाय। लेकिन ये स्थिति को और खराब करेगा।

कोरोना की दवा भारत में क्यों बन इस बात की गहरी तकलीफ है पुरानी पार्टी सोच रही है कि काश कि वह सत्ता में होते तो चीन वाली वैक्सीन का आयात कर लेते जिससें परिवारों को स्विस बैंक में डारेक्ट अरबों डॉलर मिल जाते।

विदेशी प्रोपेगैंडा भारत मे चलता रहे लोग गुलामी की मानसिकता से न निकले गधे को नेता इस लिए मान ले क्योंकि उसकी नानी घोड़ी की नस्ल की थी। भारत और उसकी संस्कृति की जगह इन्हें सत्ता की जुगत है उसके लिए वह किसी स्तर तक जा सकते है।

नेता की नियत के क्या कहने ,ये उसके पूर्वजों के खून की जद्दोजहद है लेकिन विचारक तो एक विशेष विदेशी विचार के लिए भारत से संघर्ष करने को आतुर है। उसकी संकल्पना भारत जले,दंगे हो ठीक है किंतु विचार खत्म नहीं हो पाये।

प्रश्न सत्ताजीवियों से है कि जिन्होंने 70 वर्ष के शासन में असमानता, जातिवाद,स्त्री शोषण, धार्मिक विद्वेष और किसान की हालत में कितना सुधार किया था ? यदि किया गया था आंदोलन की शाखा क्यों चलायी जा रही है स्वयं को शोषित प्रदर्शित करने से कुछ मिल सकता है।

प्रेम की फैशनपरस्ती और असलियत💐💐

भारत में फैशनपरस्ती नकल बहुत जबरदस्त है प्रेम भी वैलेंटाइन से सीख रहे है मदर, फादर,फ़्रेंडशिप डे अनाप शनाप मानते है दुःख इसका है की मेरे देश का युवान अपनी संस्कृति नहीं जानता,विदेशियों की मानसिक गुलामी को विवश है।

भारत में प्रेम के लिए किसी विशेष दिन का चयन नहीं किया गया था प्रेम स्वाभाविक मानसिक पक्ष है जिसके लिए आप 14 फरवरी के इंतजार कर रहे है उसे 364 दिन में कभी अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता थी। यह भी सच है भारत के प्रेम में व्यवसायीकरण नहीं निहित था। ग्रीटिंग,कार्ड,खिलौने,बुके,होटल आदि आदि। उसे हम आंखों से बया कर देते है जिसको समझना है वह आंखों से ही उत्तर दे देता है।

जहाँ प्रेम तह नेम नहि तह न बुधि व्यवहार ।
प्रेम मगन जब मन भया कौन गिने तिथिवार।।

भारत जैसे देश प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए हमें वैलेंटाइन जैसे प्रेत की आवश्कता पड़ रही है तब आप समझिये की जड़ो से कितना छिटक गये है। कब हमारे युवा अपनी संस्कृति की खूबसूरती को जानेंगे?

बंधु भावनाओं का व्यापार नहीं किया जाता है नहीं तो जिसे आप प्यार का नाम दे रहे हो वह खुमारी की उत्तेजना उतरते ही प्रेमी और प्रेयसी एक दूसरे के लिए कुत्ता-बिल्ली साबित होते है।

प्रेम मन का उद्वेग है जिसे मन ही समझ सकता है

“प्रेम न बाड़ी उपजय प्रेम न हॉट बिकाय”…

“छिन हँसे छिन रोये यह प्रेम न होये”…

Love

प्रेम समर्पण का नाम है जिसमें किसी प्रकार की वासना समाहित नहीं है वह निर्मूल और पूर्ण है प्रेम को जितना तुम शब्दों में बांधना चाहते वह शब्दों से मुखरित होकर मन की गलियों में गुंजायमान होने लगता है। प्रेम में द्वि का भाव खत्म हो जाता है। जब एक बार हो गया तब इस जीवन में दूजा रंग नहीं चढ़ता। वास्तव प्रेम रूपी समुद्र का जिसने रसास्वादन ले लिया उसे बाकी खारा लगने लगता है।

भुक्ति और मुक्ति दोनों नोन सी खारी लागे

प्रेम को लव और इश्क केचुल चढ़ा दिया तुमने। अब हमें दूर तलक प्रेम नहीं दिखता सिर्फ भावनाओं के बांध टूट रहे है मेरा भी एक पार्टनर कुछ दिन हो सिर्फ यही सोच कर हम भी गुलाब लिए गली गली भटकते फिरते है।

लेकिन प्रेमी फिर भी न मिला@ क्या तुम्हें प्रेम अभी तक नहीं मिला ..😜 धिक्कार है ऐसे जीवन का!!